UPSC Darpan

5. पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी (Environment & Ecology)GS322 September 2026

शिमला में बंदरों के हमले से मौत ने उजागर की वह खाई, जो 2022 के संशोधन में रीसस बंदर को अनुसूची से हटाने पर बनी

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ख़बर

शिमला, हिमाचल प्रदेश। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार शिमला में 63 वर्षीय एक महिला पर 30 अगस्त को उनके घर की छत पर रीसस बंदरों (rhesus macaque) के झुंड ने हमला किया; रीढ़ की चोट समेत गंभीर घावों के बाद 5 सितंबर को उनकी मृत्यु हो गई। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में यह प्रजाति अनुसूची II के भाग I में संरक्षित थी, पर वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 ने इसे हटा दिया। “अनुसूची” अधिनियम के साथ जुड़ी एक सूची है; उसमें शामिल प्रजाति को अधिनियम का संरक्षण और वन विभाग का ध्यान मिलता है। हिमाचल के मुख्य वन्यजीव वार्डन आलोक प्रेम नागर ने अखबार से कहा कि बंदरों के उत्पात के लिए राज्य के वन विभाग “अब ज़िम्मेदार नहीं” हैं और बंदर “अब आवारा पशु जैसा है, जो नागरिक निकायों के दायरे में आता है”। भारतीय वन सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि शिमला नगर निगम जैसे शहरी स्थानीय निकाय इस काम के लिए “पूरी तरह सक्षम नहीं” हैं, क्योंकि उनके पास बंदर पकड़ने और उनकी नसबंदी करने के लिए न पैसा है, न प्रशिक्षित कर्मचारी; साथ ही वन विभागों को अब बंदर-नियंत्रण के लिए वह केंद्रीय धन नहीं मिलता जो पहले मिलता था। नगर आयुक्त सचिन कंवल ने बताया कि कर्मचारियों को बंदर पकड़ने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। उप वन संरक्षक (वन्यजीव) शाहनवाज़ अहमद भट ने कहा कि विभाग अब भी दखल देता है, ज़्यादातर वन क्षेत्रों के आसपास, पर इसका शुल्क नागरिक निकायों से लेता है; एक बंदर की नसबंदी पर ₹700 खर्च होते हैं। नगर निगम अधिकारियों के अनुसार शिमला में हर महीने बंदरों के 50 से 55 हमले दर्ज होते हैं। अखबार द्वारा उद्धृत सरकारी आँकड़ों के अनुसार हिमाचल में बंदरों की अनुमानित संख्या 2004 में 3,17,512 से घटकर 2013 में 2,26,086 और 2019-20 में 1,36,443 रह गई; वन विभाग इसका श्रेय मुख्यतः नसबंदी को देता है — 2006 से मार्च 2024 के बीच 1,86,448 बंदरों की नसबंदी हुई। वन्यजीव विशेषज्ञ शमिंदर बोपाराय ने कहा कि इस पर राय बँटी हुई है कि बंदरों को पीड़क जंतु (vermin) — यानी ऐसे जीव जिन्हें कीट मानकर मारा जा सकता है — माना जाए या संरक्षित रखा जाए; उन्होंने लोगों द्वारा बंदरों को खिलाने को उन्हें जंगलों से बाहर खींच लाने का कारण बताया। शिमला की एक गैर-सरकारी संस्था ने पिछले सप्ताह प्रदर्शन कर परिवार के लिए ₹5 लाख मुआवज़े और बंदरों को खिलाने वालों पर कार्रवाई की माँग की। राज्य की वन्यजीव मुआवज़ा नीति में गंभीर चोट पर ₹75,000, स्थायी विकलांगता पर ₹1 लाख और मृत्यु पर ₹4 लाख का प्रावधान है, पर अधिकारियों ने संकेत दिया कि परिवार के पात्र होने की संभावना कम है, क्योंकि यह प्रजाति अब अधिनियम के दायरे में नहीं है। पाठ्यक्रम से जुड़ाव: मानव–वन्यजीव संघर्ष, और विभागों तथा स्थानीय निकायों के बीच कार्यों का बँटवारा।

कड़ी — एक पंक्ति में: 1972 के अधिनियम की अनुसूची II में रीसस बंदर संरक्षित, संघर्ष से निपटने का ज़िम्मा वन विभागों और केंद्रीय धन पर → 2006 से नसबंदी के बल पर हिमाचल में अनुमानित संख्या आधी से भी कम → 2022 के संशोधन में अनुसूचियों का पुनर्गठन, बंदर सूची से बाहर → ज़िम्मेदारी अनौपचारिक रूप से ऐसे नगर निकायों पर, जिनके पास न पैसा है न प्रशिक्षित कर्मचारी → एक घातक हमले के बाद पीड़ित परिवार वन्यजीव मुआवज़ा नीति के दायरे से बाहर

स्थैतिक पाठ्यक्रम से जुड़ाव

  1. 2022 के संशोधन ने अधिनियम की अनुसूचियाँ छह से घटाकर चार कर दीं. वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 ने अनुसूचियों को नए सिरे से गढ़ा: अनुसूची I में सर्वोच्च संरक्षण वाली प्रजातियाँ, अनुसूची II में कम संरक्षण वाली प्रजातियाँ, अनुसूची III में संरक्षित पौधे, और अनुसूची IV में वन्यजीवों और वनस्पतियों की संकटग्रस्त प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अभिसमय (CITES) के परिशिष्टों में सूचीबद्ध नमूने। पीड़क जंतुओं वाली पुरानी अनुसूची V समाप्त कर दी गई। संशोधन ने अधिनियम को CITES के तहत भारत के दायित्वों के अनुरूप भी बनाया। चूँकि अधिनियम वन्य पशु की परिभाषा अनुसूचियों के हवाले से करता है, इसलिए अनुसूची से हटी प्रजाति काफ़ी हद तक अधिनियम की संरक्षण-व्यवस्था से बाहर हो जाती है।
  2. धारा 62 केंद्र को किसी पशु को तय क्षेत्र और अवधि के लिए पीड़क घोषित करने की शक्ति देती है. 2022 के बाद भी धारा 62 केंद्र सरकार को अधिसूचना द्वारा अनुसूची I के अलावा किसी भी वन्य पशु को तय क्षेत्र और अवधि के लिए पीड़क घोषित करने की अनुमति देती है, जिससे वहाँ उसका शिकार किया जा सकता है। धारा 11 अलग से मुख्य वन्यजीव वार्डन को ऐसे पशु के शिकार की अनुमति देने का अधिकार देती है जो मानव जीवन के लिए ख़तरनाक हो गया हो। संघर्ष से निपटने के लिए ये अधिनियम के पारंपरिक औज़ार हैं, और दोनों यह मानकर चलते हैं कि पशु पहले से अधिनियम के दायरे में है। हिमाचल प्रदेश ने पिछले दशक में राज्य के कुछ हिस्सों में बंदर के लिए केंद्र से पीड़क अधिसूचनाएँ ली थीं, हालाँकि वे सीमित क्षेत्रों और अवधियों के लिए थीं।
  3. वन्यजीव समवर्ती विषय है, और पशु-क्रूरता की रोकथाम नगर निकायों का भी काम है. 1976 के 42वें संशोधन ने वन तथा वन्य पशुओं और पक्षियों के संरक्षण को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में प्रविष्टि 17क और 17ख के रूप में रखा। अनुच्छेद 48क राज्य को पर्यावरण की रक्षा करने और वनों तथा वन्यजीवों को सुरक्षित रखने का निर्देश देता है, और अनुच्छेद 51क(छ) प्राणिमात्र के प्रति दया भाव रखना नागरिकों का मूल कर्तव्य बनाता है। 74वें संशोधन से जुड़ी बारहवीं अनुसूची में “कांजी हाउस; पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण” उन कार्यों में है जो नगरपालिकाओं को सौंपे जा सकते हैं। पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम, 1960 बंदरों पर लागू रहता है, भले वन्यजीव कानून में उनकी स्थिति कुछ भी हो।
  4. मनुष्यों के साथ रहने वाले प्राइमेट के लिए नसबंदी मानक अहिंसक उपाय है. सहभोजी (commensal) पशु वे हैं जो मनुष्यों के साथ रहते हैं और मनुष्यों के भोजन व कचरे पर पलते हैं, जैसे शहरी बंदर। नसबंदी से आबादी वर्षों में घटती है और मारने जैसा सार्वजनिक विवाद भी नहीं होता, पर इसके लिए प्रशिक्षित पकड़ने वाले दल, पशु-चिकित्सा सुविधाएँ और लगातार धन चाहिए। इसके नतीजे धीमे आते हैं और प्रजनन-योग्य मादाओं के बड़े हिस्से तक पहुँचने पर निर्भर करते हैं; इसीलिए धन या संस्थागत ज़िम्मेदारी में एक चूक दस साल के काम पर पानी फेर सकती है।

UPSC इसे क्यों पूछता है

  1. मानव–वन्यजीव संघर्ष मुख्य परीक्षा का बार-बार लौटने वाला विषय है. GS3 पाठ्यक्रम में संरक्षण और आपदा प्रबंधन शामिल हैं, और मानव–वन्यजीव संघर्ष पर प्रश्नों में कारणों और समाधानों की चर्चा माँगी गई है। शिमला का मामला इसमें शासन का आयाम जोड़ता है — संघर्ष जंगल में नहीं, शहर की छत पर है, और सवाल यह है कि इसका ज़िम्मा किस विभाग का है।
  2. प्रारंभिक परीक्षा अधिनियम की अनुसूचियों और धाराओं को परखती है. 2022 के संशोधन के बाद अनुसूचियों की संख्या, पीड़क जंतु वाली अनुसूची का क्या हुआ और धारा 62 की शक्ति पर कथन-आधारित प्रश्न स्वाभाविक निशाने हैं। 1976 में जोड़ी गई समवर्ती सूची की प्रविष्टियाँ 17क और 17ख राजव्यवस्था के प्रश्नों में भी पुरानी पसंद रही हैं।
  3. स्थानीय शासन के कार्य GS2 पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं. GS2 में स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त के हस्तांतरण का स्पष्ट उल्लेख है। पैसा या कर्मचारी दिए बिना नगर निगम को सौंपा गया कार्य बिना-धन-के-दायित्व (unfunded mandate) की समस्या का पाठ्यपुस्तकीय उदाहरण है, जिसे परीक्षक किसी वास्तविक मामले से समझाते देखना पसंद करते हैं।

प्रीलिम्स तथ्य

  • वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 ने अधिनियम की अनुसूचियाँ घटाकर चार कर दीं; अनुसूची IV में CITES के परिशिष्टों में सूचीबद्ध नमूने हैं।
  • पीड़क जंतुओं की अलग अनुसूची 2022 के संशोधन से हटा दी गई, पर धारा 62 अब भी केंद्र सरकार को अनुसूची I के अलावा किसी वन्य पशु को तय क्षेत्र और अवधि के लिए पीड़क घोषित करने की अनुमति देती है।
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 11 मुख्य वन्यजीव वार्डन को ऐसे वन्य पशु के शिकार की अनुमति देने का अधिकार देती है जो मानव जीवन के लिए ख़तरनाक हो गया हो।
  • 1976 के 42वें संविधान संशोधन ने वन तथा वन्य पशुओं और पक्षियों के संरक्षण को समवर्ती सूची में प्रविष्टि 17क और 17ख के रूप में रखा।
  • अनुच्छेद 51क(छ) के अनुसार वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करना तथा प्राणिमात्र के प्रति दया भाव रखना मूल कर्तव्य है।
  • संविधान की बारहवीं अनुसूची में नगरपालिका के कार्यों में “कांजी हाउस; पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण” शामिल है।

विश्लेषण

  1. अनुसूची से हटाने के साथ एक सफल कार्यक्रम का पैसा भी चला गया. आबादी के आँकड़े बताते हैं कि 2004 से 2019-20 के बीच नसबंदी ने हिमाचल में बंदरों की अनुमानित संख्या लगभग आधी कर दी थी। कानूनी बदलाव से समस्या ख़त्म नहीं हुई; ख़त्म हुआ वन विभाग का कर्तव्य और वह केंद्रीय धन जिससे समाधान का खर्च चलता था। जिस नीति में कार्य तो सौंप दिया जाए पर उसका बजट गायब हो जाए, वह हस्तांतरण नहीं, परित्याग है। तर्कसंगत सुधार यह होता कि ज़िम्मेदारी के साथ पैसा भी जाता, या प्रजाति की अनुसूची चाहे जो हो, नसबंदी को वित्तपोषित वन्यजीव-प्रबंधन गतिविधि के रूप में जारी रखा जाता।
  2. नगर निकायों से प्रति बंदर ₹700 वसूलना विशेषज्ञता के तर्क को उलट देता है. प्रशिक्षित पकड़ने वाले दल और पशु-चिकित्सा का अनुभव वन विभाग के पास है, और अब वह इन्हें ऐसे नागरिक निकाय को बेच रहा है जिसके पास दोनों नहीं हैं। इससे सरकार के भीतर ही एक बाज़ार बन जाता है, जहाँ गरीब संस्था बेहतर साधनों वाली संस्था को भुगतान करती है, और अंतर-विभागीय बिलिंग पर खर्च हुआ हर रुपया बंदर पकड़ने पर खर्च नहीं होता। प्रतिपक्ष यह है कि वन कर्मचारी पहले से दबाव में हैं और उन्हें जंगलों पर ध्यान देना चाहिए, और यह बात उचित है। पर तब राज्य को किसी मौत के बाद नहीं, पहले ही एक नगरपालिका इकाई को धन और प्रशिक्षण देना चाहिए।
  3. कानूनी स्थिति से बँधा मुआवज़ा एक जैसी क्षति के साथ असमान बर्ताव करता है. राज्य नीति के तहत तेंदुए के हमले में जान गँवाने वाले के परिवार को ₹4 लाख मिलते हैं, जबकि बंदरों के हमले में जान गँवाने वाले के परिवार को शायद कुछ न मिले, सिर्फ़ इसलिए कि अनुसूची में संशोधन हो गया। पीड़ित की ओर से देखें तो क्षति एक जैसी है और किसी भी परिवार ने यह जोखिम ख़ुद नहीं चुना। मुआवज़ा चोट की प्रकृति और ख़तरे के सार्वजनिक स्वरूप पर आधारित होना चाहिए, वर्गिकी की सूची पर नहीं। कोई राज्य संसद का इंतज़ार किए बिना कार्यकारी आदेश से इसे ठीक कर सकता है।
  4. जड़ में बंदरों को खिलाना है, और यह ऐसा व्यवहार है जिस तक कानून पहुँच सकता है. श्री बोपाराय का यह कहना कि लोगों द्वारा खिलाया जाना बंदरों को जंगलों से बाहर खींचता है, कस्बों, मंदिरों और राजमार्गों पर हमलों के पैटर्न से पुष्ट होता है। नगरपालिका उपविधियाँ (bye-laws) बंदरों को खिलाने पर रोक लगाकर दंड तय कर सकती हैं, और गैर-सरकारी संस्था की कड़ी कार्रवाई की माँग बताती है कि जनता प्रवर्तन चाहती है। प्रवर्तन राजनीतिक रूप से नाज़ुक है, क्योंकि बहुत से निवासियों के लिए बंदरों को खिलाने से धार्मिक भावनाएँ जुड़ी हैं; यही कारण है कि धारा 62 के तहत मारना कभी लोकप्रिय उपाय नहीं रहा।
  5. बहस को ‘संरक्षित बनाम पीड़क’ के संकरे दायरे में बाँध दिया गया है. विकल्प केवल संरक्षित पशु और कीट के बीच नहीं है। कई देश बहुतायत वाली प्रजातियों को एक तीसरी श्रेणी — प्रबंधित वन्यजीव — के तहत संभालते हैं, जिसमें पशु संकटग्रस्त नहीं होता, पर आबादी-नियंत्रण, संघर्ष से निपटने और मुआवज़े की ज़िम्मेदारी राज्य के पास रहती है। भारत के 2022 के पुनर्गठन में ऐसी कोई श्रेणी नहीं रखी गई, इसलिए कोई प्रजाति या तो वन विभाग के संरक्षण में है या व्यवहार में किसी की नहीं। शिमला की मौत इसी गायब बीच की श्रेणी की कीमत है।

संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“किसी प्रजाति को कानूनी संरक्षण से हटा देने से उसके कारण होने वाला संघर्ष समाप्त नहीं होता; केवल यह बदल जाता है कि ज़िम्मेदार कौन है।” वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 के बाद रीसस बंदर के संदर्भ में चर्चा कीजिए तथा शहरी क्षेत्रों में बहुतायत वाले वन्यजीवों से होने वाले संघर्ष के प्रबंधन हेतु एक संस्थागत ढाँचा सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

उत्तर की रूपरेखा

  1. भूमिका. शिमला के मामले से शुरू करें: 30 अगस्त को अपनी छत पर बंदरों के हमले की शिकार 63 वर्षीय महिला की 5 सितंबर को मृत्यु हो गई, और परिवार को मुआवज़ा मिलने की संभावना कम है क्योंकि 2022 में यह प्रजाति अधिनियम से हटा दी गई थी।
  2. मुख्य भाग — कानूनी बदलाव. 2022 के बाद की चार अनुसूचियों वाली संरचना, पीड़क जंतु वाली अनुसूची का हटना, धारा 62 और धारा 11 की बनी हुई शक्तियाँ और वन्यजीव का समवर्ती सूची वाला दर्जा समझाएँ। दिखाएँ कि अनुसूची से हटी प्रजाति वन विभाग के दायित्व-क्षेत्र से बाहर हो जाती है।
  3. मुख्य भाग — संस्थागत खाई. प्रमाणों का प्रयोग करें: धन और प्रशिक्षित कर्मचारियों से वंचित नगर निकाय, प्रति नसबंदी ₹700 वसूलते वन विभाग, केंद्रीय धन का बंद होना, शिमला में हर महीने 50 से 55 हमले, और मुआवज़ा नीति का कानूनी स्थिति पर निर्भर होना। इसकी तुलना 2004 से 2019-20 के बीच नसबंदी से आई आबादी में गिरावट से करें।
  4. मुख्य भाग — एक ढाँचा. वित्तपोषित आबादी-नियंत्रण के साथ प्रबंधित वन्यजीव की श्रेणी; स्पष्ट मानक संचालन प्रक्रियाओं वाला संयुक्त नगर–वन प्रकोष्ठ; अनुसूची के बजाय क्षति पर आधारित मुआवज़ा; बंदरों को खिलाने के विरुद्ध लागू करने योग्य उपविधियाँ और कचरा प्रबंधन; तथा मंदिरों और पर्यटन स्थलों पर जागरूकता अभियान सुझाएँ।
  5. निष्कर्ष. निष्कर्ष दें कि संरक्षण कानून के साथ संघर्ष-शासन की व्यवस्था भी होनी चाहिए, और बहुतायत वाली प्रजाति को उपेक्षा नहीं, प्रबंधन चाहिए।

प्रशासक की दृष्टि

आप शिमला के नगर आयुक्त हैं। इस मौत के बाद निवासी एक सप्ताह के भीतर कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। आप क्या करेंगे?

मैं तुरंत वन विभाग के साथ एक संयुक्त प्रतिक्रिया दल बनाऊँगा, जिसमें लिखित व्यवस्था के तहत उसके प्रशिक्षित पकड़ने वाले कर्मचारियों का उपयोग हो, और हमलों तथा बंदर दिखने की सूचना के लिए हेल्पलाइन जारी करूँगा। सार्वजनिक स्थानों पर बंदरों को खिलाने पर रोक अधिसूचित कर उसे लागू करूँगा, और उन कूड़ेदानों तथा कचरा स्थलों को ठीक कराऊँगा जो उन्हें आकर्षित करते हैं। राज्य सरकार से नसबंदी के लिए समर्पित बजट और परिवार के लिए अंतरिम अनुग्रह राशि (ex gratia) माँगूँगा, और हर पखवाड़े प्रगति की सार्वजनिक जानकारी दूँगा।

प्रधान मुख्य वन संरक्षक के रूप में क्या आप बंदर को फिर से अनुसूची में डालने की वकालत करेंगे?

फिर से सूची में डालने से धन और ज़िम्मेदारी तो लौट आएगी, पर वे कानूनी प्रतिबंध भी लौटेंगे जिनसे संघर्ष से निपटना धीमा हो जाता था। मेरी प्राथमिकता बहुतायत वाले वन्यजीवों के प्रबंधन के लिए एक वित्तपोषित राज्य योजना होगी, जिसमें प्रजाति की अनुसूची चाहे जो हो, आबादी-नियंत्रण का तकनीकी नेतृत्व वन विभाग के पास रहे। इसके समर्थन में मैं आबादी और नसबंदी के आँकड़े रखूँगा, जो दिखाते हैं कि धन मिलने पर कार्यक्रम सफल रहा।

साक्षात्कार बोर्ड पूछता है: क्या सिर्फ़ इसलिए किसी परिवार को मुआवज़ा न देना नैतिक है कि एक पशु की कानूनी स्थिति बदल गई?

यह कानूनसम्मत है, पर नैतिक रूप से इसका बचाव कठिन है, क्योंकि परिवार की क्षति वही है और जोखिम एक सार्वजनिक ख़तरे से पैदा हुआ, परिवार के चुनाव से नहीं। न्याय की माँग है कि एक जैसे मामलों के साथ एक जैसा बर्ताव हो, और बंदर के हमले से हुई मौत किसी भी दूसरे पशु के हमले से हुई मौत जैसी ही है। राज्य अभी अपनी विवेकाधीन राहत शक्तियों का प्रयोग कर सकता है और अपनी नीति में संशोधन करके मुआवज़े को क्षति पर आधारित कर सकता है; यह मानवीय भी है और सस्ता भी।