UPSC Darpan

4. अंतरराष्ट्रीय संबंध (International Relations)GS222 September 2026

हूतियों की बढ़त ने बिना अनुसमर्थन वाले मक्का रक्षा समझौते की पोल खोली, पाकिस्तान और तुर्किये ने लड़ने से मना किया

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ख़बर

दुबई और नई दिल्ली। ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन की सहयोगी शोधकर्ता सबीन अमीर द इंडियन एक्सप्रेस में लिखती हैं कि सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच 7 अगस्त को हस्ताक्षरित मक्का संयुक्त रक्षा समझौते (Mecca Joint Defence Agreement — MJDA) ने सामूहिक प्रतिरोध का एक ढांचा बनाया और कहा कि तीनों में से किसी पर भी सशस्त्र हमला सब पर हमला माना जाएगा। यह सामूहिक आत्मरक्षा (collective self-defence) है — राज्यों का पहले से यह तय कर लेना कि वे एक-दूसरे की रक्षा करेंगे — और समझौता इसका आधार संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 को बताता है। हस्ताक्षर के कुछ ही घंटों में इसे “इस्लामी नाटो” कहा जाने लगा, पर अमीर का तर्क है कि इसमें नाटो जैसी संस्थागत संरचना, कमान व्यवस्था और नौकरशाही नहीं है, और इसीलिए यह सऊदी अरब को जारी हूती हमलों से बचाने में विफल रहा है। वे तीन कारण बताती हैं: समझौते का आधिकारिक अनुसमर्थन — हर राज्य की अपनी संवैधानिक प्रक्रिया से औपचारिक स्वीकृति — नहीं हुआ है; इसकी पारस्परिक रक्षा की शर्तें अभी कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं; और तुर्किये तथा पाकिस्तान को इसे अपनी संसदों से पारित कराना है, जबकि सऊदी अरब को शाही फरमान से मंजूरी देनी है। वे लिखती हैं कि अमेरिका से ठंडी प्रतिक्रिया मिलने के बाद रियाद ने यूरोप का रुख किया है, पर यूरोपीय संघ ने यमन में अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि के कथित उल्लंघनों के कारण सऊदी अरब को सैन्य सहायता पर आंतरिक प्रतिबंध लगा रखा है; सऊदी अरब ने मार्च 2015 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थन में यमन में हस्तक्षेप किया था। अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) के अनुसार यमन में 1,04,796 से अधिक लोग विस्थापित हैं। द इकोनॉमिक टाइम्स में इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व अधिकारी अविनाश मोहनानी कहते हैं कि 31 अगस्त को समझौते का नाम बदलकर मक्का रक्षा गठबंधन (Mecca Defence Alliance) कर दिया गया, पाकिस्तान और तुर्किये हूतियों के विरुद्ध सऊदी युद्ध में लड़ाके बनने से इनकार कर रहे हैं, और तुर्किये केवल “तकनीकी सहायता” पर सहमत हुआ है। हूतियों ने चेतावनी दी है: “अगर तुर्किये और पाकिस्तान इसमें शामिल हुए, तो हम उन पर लोहे की मुट्ठी से प्रहार करेंगे।” मोहनानी को उम्मीद है कि इस गठबंधन का हश्र भी बोर्ड ऑफ पीस और अब्राहम समझौतों जैसा होगा। द इंडियन एक्सप्रेस ने रॉयटर्स और द न्यूयॉर्क टाइम्स के हवाले से बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की गुहार के बावजूद रविवार को हूतियों पर प्रस्तावित अमेरिकी हवाई हमले आखिरी क्षण में रद्द कर दिए, और हूती लड़ाके ताइज़ और लहज प्रांतों में कहबूब पहाड़ियों पर कब्जे के लिए जोर लगा रहे हैं, ताकि लाल सागर तट को सरकार-नियंत्रित क्षेत्रों से काट दिया जाए। पाठ्यक्रम से जुड़ाव: सामान्य अध्ययन-2, खाड़ी में भारत के हित, जहां बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय रहते हैं, और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्थाएं।

कड़ी — एक पंक्ति में: मार्च 2015 में सऊदी नेतृत्व वाला गठबंधन यमन में हस्तक्षेप करता है → हूती टिके रहते हैं और ईरान के समर्थन से 2026 के पश्चिम एशिया युद्ध के दौरान फैलते हैं → सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये 7 अगस्त को मक्का समझौते पर हस्ताक्षर करते हैं और 31 अगस्त को उसका नाम बदलते हैं → हूतियों की बिजली-सी बढ़त बाब-अल-मंदेब पर कब्जा कर लेती है और सऊदी तेल ढांचे पर हमले करती है → पाकिस्तान और तुर्किये लड़ने से मना करते हैं, अमेरिका हमले रद्द करता है, और बिना अनुसमर्थन वाले समझौते की पोल खुल जाती है

स्थैतिक पाठ्यक्रम से जुड़ाव

  1. सामूहिक आत्मरक्षा वैध है, पर संधि कोई सेना नहीं होती. संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 51 सशस्त्र हमला होने पर, सुरक्षा परिषद के कार्रवाई करने तक, व्यक्तिगत या सामूहिक आत्मरक्षा के अंतर्निहित अधिकार को मान्यता देता है। अनुच्छेद 52 शांति बनाए रखने के लिए क्षेत्रीय व्यवस्थाओं की अनुमति देता है, बशर्ते वे चार्टर के उद्देश्यों के अनुरूप हों। 1949 की वॉशिंगटन संधि से बना नाटो इसका मॉडल है: उसका अनुच्छेद 5 कहता है कि यूरोप या उत्तरी अमेरिका में किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला सब पर हमला है, पर हर सदस्य “ऐसी कार्रवाई करता है जिसे वह आवश्यक समझे”। नाटो की ताकत अनुच्छेद 5 में कम, और उसकी एकीकृत कमान, साझा योजना तथा स्थायी नौकरशाही में अधिक है — और यही सब मक्का समझौते में नहीं है।
  2. अनुसमर्थन ही हस्ताक्षर को बाध्यकारी दायित्व में बदलता है. संधि विधि पर वियना अभिसमय (Vienna Convention on the Law of Treaties), 1969 के तहत कोई राज्य, संधि में जो कहा गया हो उसके अनुसार, हस्ताक्षर, अनुसमर्थन, स्वीकृति या अधिमिलन (accession) से बाध्य होने की सहमति व्यक्त कर सकता है। जब संधि में अनुसमर्थन आवश्यक हो, तो केवल हस्ताक्षर से पूरे दायित्व नहीं, बल्कि बस यह दायित्व बनता है कि राज्य संधि के उद्देश्य और प्रयोजन को विफल न करे। भारत में संधि करने और उसके अनुसमर्थन की शक्ति संघ की कार्यपालिका के पास है, और संविधान के अनुच्छेद 253 के तहत संसद उन्हें लागू करने के लिए कानून बनाती है। मक्का समझौते को संसदीय और शाही मंजूरी की जरूरत होने का अर्थ है कि उसके वादे अभी कानूनी रूप से लागू करवाए नहीं जा सकते।
  3. यमन का युद्ध क्षेत्रीय प्रायोजकों वाला गृहयुद्ध है. हूती, जिनका औपचारिक नाम अंसार अल्लाह है, उत्तरी यमन का एक ज़ैदी शिया आंदोलन है जिसने 2014 में सना पर कब्जा किया, और इसी के बाद मार्च 2015 में सऊदी नेतृत्व वाला हस्तक्षेप हुआ। 2015 के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 2216 ने हूती नेताओं पर हथियार प्रतिबंध लगाया और कब्जाए गए इलाकों से उनकी वापसी की मांग की। हूतियों को ईरान का समर्थन है और वे लेबनान के हिज़्बुल्लाह के साथ उस गठजोड़ का हिस्सा हैं जिसे तेहरान “प्रतिरोध की धुरी” (axis of resistance) कहता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार अदन में है, और उसकी प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल के प्रमुख रशाद अल-अलीमी हैं।
  4. खाड़ी में भारत के हित हैं — लोग, ऊर्जा और प्रेषण. प्रवासी भारतीयों का सबसे बड़ा जमावड़ा खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों में है, और इस क्षेत्र से आने वाला धन भारत के आवक प्रेषण (remittances) का बड़ा हिस्सा है, जिसके बल पर भारत दुनिया में प्रेषण का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता है। सऊदी अरब भारत को कच्चा तेल और LPG देने वाले शीर्ष देशों में है, और भारत तथा सऊदी अरब ने 2019 में सामरिक साझेदारी परिषद (Strategic Partnership Council) बनाई। भारत ने 2015 में ऑपरेशन राहत के तहत यमन से अपने नागरिकों को निकाला था, जो इस क्षेत्र में संकट प्रबंधन का एक मॉडल है।

UPSC इसे क्यों पूछता है

  1. पश्चिम एशिया और प्रवासी भारतीय सामान्य अध्ययन-2 के स्थायी विषय हैं. पाठ्यक्रम में “विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों व राजनीति का भारत के हितों पर प्रभाव” और “प्रवासी भारतीय” शामिल हैं। UPSC खाड़ी के साथ भारत के संबंधों, अब्राहम समझौतों, और ईरान, सऊदी अरब तथा इज़राइल के बीच भारत के संतुलन पर प्रश्न पूछ चुका है। सऊदी अरब–पाकिस्तान–तुर्किये सुरक्षा समझौता उस संतुलन में एक नया कारक है।
  2. संधि विधि और सामूहिक सुरक्षा प्रारंभिक परीक्षा में काम आते हैं. हस्ताक्षर और अनुसमर्थन के अंतर, वियना अभिसमय और नाटो के अनुच्छेद 5 पर प्रश्न सामान्य हैं। कोई समझौता कानूनी रूप से बाध्यकारी है या नहीं, यह ठीक उसी तरह का वैचारिक जाल है जो परीक्षक बिछाते हैं।
  3. पाकिस्तान के गठबंधन हमेशा भारत की सुरक्षा का प्रश्न होते हैं. पाकिस्तान से जुड़ा कोई भी रक्षा समझौता इस ओर ध्यान खींचता है कि क्या उसका इस्तेमाल भारत के विरुद्ध हो सकता है। मौजूदा हूती परीक्षा व्यवहार में ऐसे समझौतों की सीमाएं दिखाती है, जो मुख्य परीक्षा के संतुलित उत्तर के लिए उपयोगी है।

प्रीलिम्स तथ्य

  • उत्तरी अटलांटिक संधि (वॉशिंगटन संधि, 1949) का अनुच्छेद 5 कहता है कि एक या अधिक सदस्यों पर सशस्त्र हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा।
  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 52 संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए क्षेत्रीय व्यवस्थाओं या एजेंसियों की अनुमति देता है।
  • संधि विधि पर वियना अभिसमय, 1969 के तहत जहां संधि के लिए अनुसमर्थन आवश्यक हो, वहां केवल हस्ताक्षर करने वाला राज्य ऐसे कार्यों से बचने के लिए बाध्य है जो संधि के उद्देश्य और प्रयोजन को विफल करें।
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 2216 (2015) ने यमन में हूती नेताओं और बलों पर हथियार प्रतिबंध लगाया।
  • संविधान के अनुच्छेद 253 के तहत संसद किसी अन्य देश के साथ की गई किसी संधि, करार या अभिसमय को लागू करने के लिए भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बना सकती है।
  • ऑपरेशन राहत (2015) युद्धग्रस्त यमन से भारतीय नागरिकों और विदेशी नागरिकों को निकालने का भारत का अभियान था।
  • 7 अगस्त 2026 को हस्ताक्षरित मक्का संयुक्त रक्षा समझौता सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच है।

विश्लेषण

  1. समझौता अपनी पहली परीक्षा में इसलिए विफल हुआ कि हर सदस्य ने अलग शत्रु को ध्यान में रखकर हस्ताक्षर किए थे. अमीर का यह अवलोकन कि इस्लामाबाद की मुख्य सुरक्षा चिंता भारत है, जबकि अंकारा की चिंता सीरिया, इराक, पूर्वी भूमध्यसागर और कॉकेशस तक फैली है, इस विफलता को अनुसमर्थन के अभाव से बेहतर समझाता है। सऊदी अरब को ईरान और उसके छद्म गुटों (proxies) के विरुद्ध मदद चाहिए थी; पाकिस्तान को सऊदी पैसा और प्रतिष्ठा; तुर्किये को इस्लामी दुनिया में बड़ी भूमिका। जब पहला हमला हूतियों की ओर से हुआ, तो खतरा केवल रियाद पर था। जिस गठबंधन के सदस्यों के शत्रु अलग-अलग हों, वह तभी काम करता है जब शत्रु साझा हो, और यहां ऐसा नहीं था।
  2. पाकिस्तान का इनकार केवल उसकी सेना की नहीं, उसके समाज की मजबूरी है. मोहनानी का तर्क है कि पाकिस्तान में ईरान और उसके छद्म गुटों के प्रति समर्थन शिया–सुन्नी विभाजन के आर-पार है, इसलिए हूतियों से लड़ने के लिए सैनिक भेजना घरेलू स्तर पर खतरनाक होगा। पाकिस्तान में बड़ा शिया अल्पसंख्यक समुदाय है, ईरान से उसकी लंबी सीमा है, और वह पहले से खैबर पख्तूनख्वा में TTP और बलूचिस्तान में अलगाववादियों से लड़ रहा है। इसमें आश्चर्य नहीं कि वह सऊदी सुरक्षा के समर्थन में बयान तो देता है, पर जमीन पर सैनिक नहीं। विपरीत मत यह है कि सऊदी वित्त पर पाकिस्तान की निर्भरता अंततः उसे मजबूर कर सकती है, और मोहनानी भी इस ओर इशारा करते हैं।
  3. “इस्लामी नाटो” भारत के लिए चिंता का विषय होता; कागजी गठबंधन नहीं है. भारतीय विश्लेषकों को आशंका थी कि सऊदी अरब–पाकिस्तान–तुर्किये समझौता भारत के साथ पाकिस्तान की प्रतिद्वंद्विता में सऊदी पैसा और तुर्की तकनीक ला सकता है। मोहनानी का तर्क है कि ये आशंकाएं बढ़ा-चढ़ाकर आंकी गई थीं, और अब तक समझौते का व्यवहार उनके पक्ष में जाता है। पर भारत के लिए बड़ा खतरा यह गठबंधन नहीं, बल्कि वह युद्ध है जिसे यह रोक नहीं पाया: सऊदी रिफाइनरियों पर हमले, बाब-अल-मंदेब का हाथ से निकलना, और उस क्षेत्र में अस्थिरता जहां लाखों भारतीय काम करते हैं। भारत का हित खाड़ी की स्थिरता में है, और एक विफल गठबंधन वह नहीं दे सकता।
  4. सऊदी अरब का यूरोप की ओर मुड़ना अमेरिकी सुरक्षा छतरी की सीमाएं दिखाता है. सैनिकों के बम लादने के बाद आखिरी क्षण में ट्रंप का हमले रद्द करना खाड़ी देशों को बताता है कि अमेरिकी सुरक्षा अब अपने-आप नहीं मिलती। रियाद का यूरोप की ओर मुड़ना भी यमन के मानवीय रिकॉर्ड से जुड़े सैन्य सहायता पर यूरोपीय संघ के अपने प्रतिबंध से सीमित है। इस तरह खाड़ी एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रही है जिसमें क्षेत्रीय देशों को संरक्षकों के बीच जोखिम बांटकर चलना (hedging) होगा। यह वही बहुध्रुवीय बदलाव है जिसका अनुमान भारत लंबे समय से लगाता रहा है, और यह भारत को सऊदी–हूती युद्ध में पक्ष लिए बिना समुद्री सुरक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में खाड़ी के साथ अपने सुरक्षा संबंध गहरे करने की गुंजाइश देता है।

संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“सामूहिक रक्षा पर हस्ताक्षर करना उसके लिए लड़ने से आसान है।” हूती आक्रमण के आलोक में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच मक्का संयुक्त रक्षा समझौते की सीमाओं का परीक्षण कीजिए तथा खाड़ी में भारत के हितों पर इसके निहितार्थों का आकलन कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

उत्तर की रूपरेखा

  1. भूमिका. समझौते की मूल बातें बताइए: 7 अगस्त को हस्ताक्षर, 31 अगस्त को नाम बदलकर मक्का रक्षा गठबंधन, अनुच्छेद 51 पर आधारित, और एक पर हमला सब पर हमला माना जाना।
  2. मुख्य भाग — अब तक यह विफल क्यों रहा. IE के लेख में दिए गए तीन कानूनी कारण — अनुसमर्थन का अभाव, गैर-बाध्यकारी शर्तें, लंबित संसदीय और शाही मंजूरी — और राजनीतिक कारण बताइए: खतरे की अलग-अलग धारणाएं, पाकिस्तान का घरेलू जनमत, तुर्किये की सीमित “तकनीकी सहायता”, और नाटो जैसी संरचना का अभाव।
  3. मुख्य भाग — क्षेत्रीय संदर्भ. 2015 से चल रहे यमन युद्ध, हूतियों की बढ़त और बाब-अल-मंदेब के हाथ से निकलने, अमेरिका द्वारा हमले रद्द करने, और सैन्य सहायता पर यूरोपीय संघ के प्रतिबंध को समझाइए।
  4. मुख्य भाग — भारत के लिए निहितार्थ. ऊर्जा आपूर्ति, प्रवासी भारतीय और प्रेषण, पाकिस्तान से जुड़े किसी भी समझौते के सुरक्षा निहितार्थ, और ऑपरेशन राहत को मिसाल मानते हुए समुद्री तथा निकासी तैयारी की भारत की गुंजाइश को शामिल कीजिए।
  5. निष्कर्ष. निष्कर्ष दीजिए कि भारत को मुख्यतः कागज पर मौजूद गठबंधनों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय खाड़ी देशों के साथ अपने द्विपक्षीय संबंध और अपनी समुद्री क्षमता मजबूत करनी चाहिए।

प्रशासक की दृष्टि

आप रियाद में भारत के राजदूत हैं। हूती मिसाइलें उन इलाकों के पास तेल प्रतिष्ठानों पर गिरती हैं जहां भारतीय कामगार रहते हैं। पहले 48 घंटों में आप क्या करेंगे?

मैं मिशन का आपातकालीन प्रकोष्ठ और हेल्पलाइन सक्रिय करूंगा, और प्रभावित इलाकों में भारतीय कामगारों की जानकारी जुटाने के लिए सामुदायिक संगठनों और नियोक्ताओं की मदद लूंगा। मैं सुरक्षित क्षेत्रों और चिकित्सा सुविधा के लिए सऊदी अधिकारियों से समन्वय करूंगा, और ऑपरेशन राहत के अनुभव के आधार पर नौसेना और एयर इंडिया के साथ निकासी की आकस्मिक योजनाएं तैयार करूंगा। नियमित सार्वजनिक परामर्श भारत में परिवारों को जानकारी देते रहेंगे और अफवाहें रोकेंगे। संकट में किसी मिशन का पहला कर्तव्य अपने नागरिकों की सुरक्षा है।

आप विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव हैं। आपसे पूछा जाता है कि क्या भारत को मक्का समझौते पर चिंता व्यक्त करनी चाहिए। आपकी सलाह क्या है?

मैं सार्वजनिक बयान न देने की सलाह दूंगा, क्योंकि समझौते का अनुसमर्थन नहीं हुआ है, इसे भारत के विरुद्ध लागू नहीं किया गया है, और यह अपनी पहली परीक्षा में ही साफ तौर पर लड़खड़ा रहा है। बयान इसे उससे ज्यादा महत्व दे देगा जितना इसका है, और ऊर्जा व प्रवासी भारतीयों के मामले में प्रमुख साझेदार सऊदी अरब को नाराज कर सकता है। इसके बजाय भारत को इसके विकास पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए और कोई चिंता हो तो रियाद और अंकारा के साथ अपने सामरिक संवादों में निजी तौर पर उठानी चाहिए। जो खतरा अभी काल्पनिक है, उसके लिए शांत कूटनीति ही उपयुक्त है।

साक्षात्कार बोर्ड पूछता है: क्या खाड़ी में अपने हित सुरक्षित करने के लिए भारत को सैन्य गठबंधनों में शामिल होना या उन्हें बनाना चाहिए?

भारत की सामरिक स्वायत्तता की परंपरा बाध्यकारी सैन्य गठबंधनों के विरुद्ध है, क्योंकि वे उसे ऐसे युद्धों में खींच सकते हैं जो उसने नहीं चुने, खासकर उस क्षेत्र में जहां ईरान, सऊदी अरब और इज़राइल के हित आपस में टकराते हैं। भारत को क्षमता और साझेदारियों की जरूरत है: जहाजरानी की सुरक्षा के लिए नौसैनिक उपस्थिति, खाड़ी देशों के साथ रक्षा सहयोग और प्रशिक्षण, और निकासी की तैयारी। मक्का समझौते का हश्र दिखाता है कि साझा हितों के बिना गठबंधन सुरक्षा नहीं दे पाते। औपचारिक गठबंधनों की तुलना में लचीली साझेदारियां भारत के लिए बेहतर हैं।