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1. राजव्यवस्था एवं शासन (Polity & Governance)GS222 September 2026

द हिंदू का संपादकीय: पश्चिम बंगाल एसआईआर की निपटाई गई अपीलों में 93% मामलों में गलत तरीके से हटाए गए मतदाता बहाल

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ख़बर

नई दिल्ली / कोलकाता। “Presumed ineligible” (पहले से अपात्र मान लिए गए) शीर्षक वाले संपादकीय में द हिंदू का तर्क है कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को निर्वाचक नामावली के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision, SIR) में “पहले नाम काटो, बाद में जाँचो” वाली पद्धति बंद करनी चाहिए। एसआईआर मतदाता सूची को घर-घर जाकर नए सिरे से तैयार करने की प्रक्रिया है, जिसमें मतदाताओं को गणना प्रपत्र (enumeration form) और माँगे जाने पर दस्तावेज़ जमा करने होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय में दायर निर्वाचन आयोग के प्रति-शपथपत्र का हवाला देते हुए अख़बार बताता है कि सितंबर 2026 की शुरुआत तक पश्चिम बंगाल में एसआईआर अपीलीय अधिकरणों के सामने दायर 38 लाख से अधिक अपीलों में से केवल 1,22,000 से कुछ अधिक का निपटारा हुआ था, यानी निपटान दर 3.2%। इनमें से 1,13,943 मतदाताओं को फिर से नामावली में जोड़ा गया, यानी समावेशन दर लगभग 93%। इससे पहले दावे और आपत्तियों के चरण में सत्यापन के लिए तैनात न्यायिक अधिकारियों ने “तार्किक विसंगतियों” (logical discrepancies) के लिए चिह्नित 60 लाख मतदाताओं में से 27 लाख को अपात्र माना था, और इनमें से 22 लाख से अधिक ने अपील की है। संपादकीय 38 लाख और 22 लाख के आँकड़ों का आपसी मेल नहीं बैठाता। अख़बार का तर्क है कि यदि ये दरें बनी रहीं, तो 27 लाख में से अधिकांश को कभी अपात्र घोषित ही नहीं किया जाना चाहिए था, और “पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले बड़े पैमाने पर मताधिकार छीना गया”; नगरपालिका चुनाव निकट हैं, इसलिए आयोग को अपीलों का निपटारा तेज़ करना होगा। दिल्ली के तीसरे चरण के एसआईआर पर द हिंदू के विश्लेषण में पाया गया कि 70 में से 24 निर्वाचन क्षेत्रों की मसौदा नामावली में उतने मतदाता भी दर्ज नहीं हैं जितनों ने फ़रवरी 2025 के विधानसभा चुनाव में मतदान किया था। “मैपिंग” (mapping), यानी हर मतदाता को 2000 के दशक की शुरुआत की नामावलियों से जोड़ने की प्रक्रिया ने दिल्ली के 13.79 लाख मतदाताओं को नोटिस के दायरे में ला दिया है, और 19.33 लाख अन्य अपरिभाषित आधारों पर “तार्किक विसंगतियों” के लिए चिह्नित हैं। अख़बार कहता है कि पात्रता सिद्ध करने का भार मतदाता पर डाल दिया गया है, और बिहार एसआईआर में कड़ा हस्तक्षेप करने वाला न्यायालय तब से उदार रुख़ अपनाए हुए है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी आर.एस. गोपालन के अनुसार सोमवार को प्रकाशित ओडिशा की अंतिम नामावली में 3,16,32,754 मतदाता हैं, जो 17 जुलाई के 3,33,99,591 से 17,66,837 कम हैं। मसौदे से हटाए गए नामों में 8,32,544 मृत, 8,08,205 स्थानांतरित और 1,58,118 दोहरी प्रविष्टियाँ थीं। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार नागालैंड में अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी आवा लोरिन ने बताया कि 9.33% मतदाताओं को 2005 की नामावली से नहीं जोड़ा जा सका और 27.31% में मैपिंग संबंधी विसंगतियाँ दिखीं, कुल मिलाकर 36.64%, और लगभग पाँच लाख मतदाताओं को नोटिस मिलने की संभावना है। पाठ्यक्रम से जुड़ाव: चुनाव सुधार और मताधिकार।

कड़ी — एक पंक्ति में: निर्वाचन आयोग विशेष गहन पुनरीक्षण का आदेश देता है, जिसमें नई गणना और 2000 के दशक की शुरुआत की नामावलियों से जुड़ाव अनिवार्य है → मैपिंग की कमियाँ और “तार्किक विसंगतियाँ” लाखों मतदाताओं को चिह्नित कर देती हैं → अपीलें सुने जाने से पहले ही सत्यापन अधिकारी बहुतों को अपात्र घोषित कर देते हैं → पश्चिम बंगाल के अपीलीय अधिकरण जिन मामलों का निर्णय करते हैं उनमें लगभग 93% को बहाल करते हैं, पर निर्णय केवल 3.2% का हो पाता है → सर्वोच्च न्यायालय में दिल्ली और बंगाल की याचिकाओं की सुनवाई के बीच द हिंदू आयोग से नाम काटने से पहले जाँच करने की माँग करता है

स्थैतिक पाठ्यक्रम से जुड़ाव

  1. संविधान मताधिकार को सार्वभौमिक और नामावली को निर्वाचन आयोग का दायित्व बनाता है. अनुच्छेद 324 निर्वाचक नामावली तैयार करने और चुनाव कराने का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित करता है। अनुच्छेद 325 हर निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक साधारण निर्वाचक नामावली का उपबंध करता है और केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या इनमें से किसी के आधार पर किसी को इससे बाहर करने पर रोक लगाता है। अनुच्छेद 326 के अनुसार चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे, और 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का हर नागरिक, जो अन्यथा निरर्हित न हो, पंजीकृत होने का हक़दार है। 61वें संशोधन, 1988 ने मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष की।
  2. नामावली में कौन रहेगा, यह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 तय करता है. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (RP Act) की धारा 16 उस व्यक्ति को पंजीकरण के लिए निरर्हित करती है जो नागरिक न हो, जिसे सक्षम न्यायालय ने विकृतचित्त घोषित किया हो, या जो भ्रष्ट आचरण संबंधी किसी कानून के अंतर्गत निरर्हित हो। धारा 19 के अनुसार व्यक्ति अर्हता तिथि पर 18 वर्ष का हो और उस निर्वाचन क्षेत्र का मामूली तौर पर निवासी हो, और धारा 20 मामूली निवास (ordinary residence) को स्पष्ट करती है। धारा 21 नामावली तैयार करने और पुनरीक्षण का उपबंध करती है, और धारा 21(3) निर्वाचन आयोग को किसी भी समय, लेखबद्ध कारणों से, विशेष पुनरीक्षण का निर्देश देने की शक्ति देती है। धारा 22 निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी को प्रविष्टियाँ सुधारने या हटाने देती है, पर केवल संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद, और धारा 24 अपील का उपबंध करती है।
  3. प्रपत्र और अर्हता तिथियाँ रोज़मर्रा के पुनरीक्षण की मशीनरी हैं. निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के अंतर्गत नाम जोड़ने के लिए प्रपत्र 6, किसी प्रविष्टि पर आपत्ति या उसे हटाने के लिए प्रपत्र 7, और सुधार या स्थानांतरण के लिए प्रपत्र 8 का उपयोग होता है। निर्वाचन विधि (संशोधन) अधिनियम, 2021 ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 14 में संशोधन कर एक वर्ष में चार अर्हता तिथियाँ तय कीं — 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर — ताकि युवा मतदाताओं को पूरा एक वर्ष प्रतीक्षा न करनी पड़े। धारा 13B के अंतर्गत नियुक्त निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी प्रायः राजस्व अधिकारी होता है, और बूथ स्तरीय अधिकारी (BLO) क्षेत्र-स्तर का कर्मचारी होता है।
  4. न्यायालय लंबे समय से नाम हटाने से पहले सुनवाई पर ज़ोर देते रहे हैं. लाल बाबू हुसैन बनाम निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (1995) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जिस व्यक्ति का नाम नामावली में है, उसे केवल नागरिक न होने के संदेह पर, नोटिस और निष्पक्ष जाँच के बिना, हटाया नहीं जा सकता, और प्रविष्टि का अपना महत्व है। मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त (1978) में न्यायालय ने अनुच्छेद 324 को शक्ति का भंडार कहा, पर ऐसा भंडार जिसका प्रयोग निष्पक्ष रूप से और विधि के अनुरूप होना चाहिए। इन्हीं निर्णयों के कारण संपादकीय की मुख्य शिकायत क्रम को लेकर है: सत्यापन नाम हटाने से पहले होना चाहिए, बाद में नहीं।

UPSC इसे क्यों पूछता है

  1. चुनाव सुधार जीएस-2 का स्थायी विषय है. पाठ्यक्रम में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम और संवैधानिक निकायों की शक्तियों तथा कार्यों का स्पष्ट उल्लेख है। यूपीएससी ने निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और चुनाव सुधार पर प्रश्न पूछे हैं, और एसआईआर की विशाल संख्याएँ समावेशन, प्रशासनिक क्षमता और न्यायिक निगरानी पर प्रश्नों के लिए ठोस उदाहरण देती हैं।
  2. संपादकीय कार्ड तथ्य ही नहीं, तर्क गढ़ना भी सिखाता है. द हिंदू का संपादकीय साक्ष्य-आधारित आलोचना का नमूना है: यह निर्वाचन आयोग के अपने शपथपत्र के आँकड़ों का उपयोग करता है। मुख्य परीक्षा के जो उत्तर निपटान दर और समावेशन दर उद्धृत करके उनसे निष्कर्ष निकालते हैं, वे उन उत्तरों से अधिक अंक पाते हैं जो केवल इतना कहते हैं कि बहिष्करण बुरा है।

प्रीलिम्स तथ्य

  • अनुच्छेद 324 संसद और राज्य विधानमंडलों के चुनावों के लिए निर्वाचक नामावली तैयार करने और चुनाव कराने का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण निर्वाचन आयोग में निहित करता है।
  • अनुच्छेद 325 के अनुसार कोई भी व्यक्ति केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या इनमें से किसी के आधार पर निर्वाचक नामावली में शामिल होने के लिए अपात्र नहीं होगा।
  • अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव का उपबंध करता है; 61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 ने मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष की।
  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के अंतर्गत निर्वाचन आयोग लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से किसी भी समय निर्वाचक नामावली के विशेष पुनरीक्षण का निर्देश दे सकता है।
  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16 भारत का नागरिक न होने वाले व्यक्ति को निर्वाचक नामावली में पंजीकरण के लिए निरर्हित करती है।
  • निर्वाचन विधि (संशोधन) अधिनियम, 2021 ने मतदाताओं के पंजीकरण के लिए एक वर्ष में चार अर्हता तिथियाँ तय कीं — 1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर।
  • निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के अंतर्गत निर्वाचक नामावली में नाम जोड़ने के लिए प्रपत्र 6 और नाम शामिल करने पर आपत्ति या नाम हटाने के लिए प्रपत्र 7 का उपयोग होता है।

विश्लेषण

  1. 93% की उलट-दर पहले निर्णय का लेखा-परीक्षण है, निष्पक्ष व्यवस्था का प्रमाण नहीं. जब दस में से नौ अपीलें बहाली पर समाप्त हों, तो अपीलीय अधिकरण कभी-कभार की गलतियाँ नहीं सुधार रहा होता; वह यह उजागर कर रहा होता है कि मूल निर्णय-प्रक्रिया ही अविश्वसनीय थी। किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था में इतनी ऊँची उलट-दर पहले स्तर की प्रक्रिया की समीक्षा का कारण बनती। आयोग तर्क दे सकता है कि शुरू में निपटाए गए मामले आसान थे और कठिन मामलों की सुनवाई के साथ यह दर घटेगी। यह संभव है, पर इससे यही तर्क और मज़बूत होता है कि जब तक इतनी गलतियों के कारण पता न चलें, नाम हटाना रोका जाए।
  2. असली मताधिकार-हरण निपटान दर में छिपा है. जिस अपील का निर्णय चुनाव के बाद हो, वह उस चुनाव के लिए कोई अधिकार नहीं है। केवल 3.2% अपीलें निपटने के कारण पश्चिम बंगाल में गलत तरीके से हटाए गए अधिकांश मतदाता विधानसभा चुनाव में वोट नहीं डाल सके, और बहुत-से नगरपालिका चुनाव से भी वंचित रह सकते हैं। मतदान समयबद्ध अधिकार है: दिसंबर में बहाल हुआ नाम वसंत में छूटा वोट नहीं लौटाता। इसलिए आयोग को या तो कहीं अधिक अधिकरण चाहिए या ऐसा नियम कि अपील के निर्णय तक विवादित नाम नामावली में बने रहें।
  3. पुरानी नामावलियों से मैपिंग काग़ज़ी कमी को पात्रता का प्रश्न बना देती है. दिल्ली और नागालैंड दिखाते हैं कि हर मतदाता को 2000 के दशक की शुरुआत की नामावलियों से जोड़ना उन लोगों को दंडित करता है जो उन वर्षों में घर बदल चुके, विवाह करके चले गए, काम के लिए पलायन कर गए या छूट गए थे। यह समूह असमान रूप से गरीब, महिला और प्रवासी है, और नागालैंड में दूरदराज़ का। नागालैंड का 36.64% बिना मैपिंग या विसंगति वाला आँकड़ा दिखाता है कि यह बेमेल पुराने अभिलेखों की कमज़ोरी दर्शाता है, मतदाताओं की अपात्रता नहीं। मैपिंग विफल होने पर क्षेत्र-भ्रमण होना चाहिए, न कि ऐसा नोटिस जो नागरिक से अपना अस्तित्व सिद्ध करने को कहे।
  4. विरोधी मत: साफ़-सुथरी नामावली भी मत की रक्षा करती है. ओडिशा के आँकड़े दिखाते हैं कि एसआईआर वास्तविक त्रुटियाँ भी हटाता है: आठ लाख से अधिक मृत मतदाता और डेढ़ लाख से अधिक दोहरी प्रविष्टियाँ। फूली हुई नामावलियाँ प्रतिरूपण (impersonation) को आसान बनाती हैं और परिणामों पर भरोसा घटाती हैं, और अनुच्छेद 324 के अंतर्गत इन्हें सुधारना आयोग का कर्तव्य है। द हिंदू का तर्क पुनरीक्षण के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसके क्रम और भार के विरुद्ध है। क्षेत्र-सत्यापन और मृत्यु अभिलेखों से नामावली को मृत और दोहरी प्रविष्टियों से मुक्त किया जा सकता है, बिना हर जीवित मतदाता से पात्रता सिद्ध कराए।
  5. जब अधिकार समयबद्ध हो, तो न्यायिक संयम की कीमत चुकानी पड़ती है. संपादकीय बिहार में शुरुआती हस्तक्षेप के बाद सर्वोच्च न्यायालय के उदार रुख़ की आलोचना करता है। न्यायालय प्रायः चल रही चुनावी प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप से बचते हैं, इस सिद्धांत पर कि चुनाव रुकने नहीं चाहिए। पर जब प्रक्रिया ही बहिष्करण का स्रोत हो, तो न्यायालय की देरी बहिष्करण के पक्ष में लिया गया निर्णय बन जाती है। कोई सीमित अंतरिम निर्देश, जैसे सुनवाई से पहले कोई अंतिम विलोपन नहीं, आयोग के क्षेत्राधिकार का सम्मान करते हुए भी मताधिकार की रक्षा करेगा।

संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“मत देने का अधिकार उतना ही सुरक्षित है जितनी सुरक्षित निर्वाचक नामावली में बने रहने की प्रक्रिया है।” अपीलों और विलोपन के हालिया आँकड़ों के आलोक में निर्वाचक नामावली के विशेष गहन पुनरीक्षण का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। सटीक नामावली और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के बीच सामंजस्य बिठाने वाले सुरक्षा उपाय सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

उत्तर की रूपरेखा

  1. भूमिका. द हिंदू द्वारा बताए गए निर्वाचन आयोग के शपथपत्र के आँकड़े उद्धृत कीजिए: पश्चिम बंगाल में 38 लाख से अधिक अपीलों में से केवल 1.22 लाख से कुछ अधिक का निर्णय हुआ, और उनमें से लगभग 93% में मतदाता बहाल हुए। प्रश्न को क्रम और सबूत के भार के प्रश्न के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
  2. मुख्य भाग — संवैधानिक और विधिक ढाँचा. अनुच्छेद 324, 325 और 326, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 16, 19, 21 और 22, और लाल बाबू हुसैन (1995) का हवाला देते हुए नाम हटाने से पहले सुनवाई की अनिवार्यता समझाइए।
  3. मुख्य भाग — ‘पहले हटाओ’ की समस्या. बंगाल के अपीलीय आँकड़े, दिल्ली के वे 24 निर्वाचन क्षेत्र जहाँ 2025 के मतदाताओं से कम निर्वाचक दर्ज हैं और 33 लाख नोटिस, तथा नागालैंड का 36.64% मैपिंग अंतर प्रयोग कीजिए। समझाइए कि प्रवासी, महिलाएँ और दूरदराज़ के जनजातीय मतदाता सबसे अधिक प्रभावित क्यों होते हैं।
  4. मुख्य भाग — पुनरीक्षण का पक्ष और सुरक्षा उपाय. ओडिशा में मृत और दोहरी प्रविष्टियाँ हटाए जाने को स्वीकार कीजिए। सुझाव दीजिए: अपील तक विवादित नाम नामावली में बने रहें, अधिकरणों के लिए निश्चित समय-सीमा, नोटिस से पहले बीएलओ द्वारा क्षेत्र-सत्यापन, मृत्यु पंजीकरण आँकड़ों का उपयोग, विलोपन के कारणों का प्रकाशन, और उलट-दरों का स्वतंत्र लेखा-परीक्षण।
  5. निष्कर्ष. निष्कर्ष दीजिए कि “कोई पात्र मतदाता न छूटे” का लक्ष्य स्वयं सबूत के भार में झलकना चाहिए, क्योंकि अभिलेख और मशीनरी नागरिक के नहीं, राज्य के पास हैं।

प्रशासक की दृष्टि

आप निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी हैं। आपकी टीम ने 40,000 मतदाताओं को “तार्किक विसंगतियों” के लिए चिह्नित किया है, पर आपके पास दो सप्ताह हैं। आप क्या करेंगे?

धारा 22 की अपेक्षा के अनुसार मैं सुनवाई के बिना किसी का नाम नहीं हटाऊँगा। मैं सूची को विसंगति के प्रकार के अनुसार छाँटूँगा, वर्तनी के अंतर जैसे स्पष्ट लिपिकीय मामलों को कार्यालय में जाँच के बाद एक साथ निपटा दूँगा, और शेष के लिए बीएलओ को क्षेत्र-भ्रमण पर भेजूँगा। मैं सप्ताहांत में हर वार्ड में शिविर-सुनवाई करूँगा और कोई भी उचित दस्तावेज़ स्वीकार करूँगा। समय कम पड़ा तो मैं ऐसी नामावली अंतिम करने के बजाय, जिसका बचाव मैं न कर सकूँ, मुख्य निर्वाचन अधिकारी से समय-वृद्धि माँगूँगा।

साक्षात्कार बोर्ड पूछता है: क्या नागरिक से यह सिद्ध करने को कहना उचित है कि वह नामावली में रहने का हक़दार है?

नागरिक से प्रपत्र भरने और कोई सामान्य दस्तावेज़ दिखाने की अपेक्षा उचित है, पर जन्म, मृत्यु और निवास के अभिलेख राज्य के पास हैं और उसे पहले उनका उपयोग करना चाहिए। पूरा भार मतदाता पर डालने से कमज़ोर काग़ज़ात वाले लोग, जो प्रायः गरीब होते हैं, नुकसान में रहते हैं। उचित तरीका यह है कि नागरिक से प्रमाण माँगने से पहले राज्य संदेह का कारण दिखाए। बंगाल में 93% बहाली दर बताती है कि ऐसे कारण प्रायः थे ही नहीं।

मुख्य निर्वाचन अधिकारी के रूप में आप अपीलीय स्तर पर 93% उलट-दर देखते हैं। आप क्या बदलेंगे?

मैं इसे पहले चरण की विफलता मानूँगा और पलटे गए निर्णयों की नमूना-समीक्षा का आदेश दूँगा, ताकि साझा त्रुटियाँ पहचानी जा सकें। मैं “तार्किक विसंगति” के लिए स्पष्ट लिखित मानदंड जारी करूँगा, जिन्हें संपादकीय अपरिभाषित बताता है, और अधिकारियों को उन पर प्रशिक्षण दूँगा। मैं और अपीलीय पीठें जोड़ूँगा तथा हर सप्ताह निपटान के आँकड़े प्रकाशित करूँगा। त्रुटियों के बारे में पारदर्शिता प्रक्रिया के बचाव की तुलना में कहीं तेज़ी से भरोसा लौटाएगी।