UPSC Darpan

1. राजव्यवस्था एवं शासन (Polity & Governance)GS222 September 2026

सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र के मेथनॉल रंजक नियमों को अनुपातहीन मानकर रद्द किया, ज़हरीली शराब रोकने के दिशानिर्देश जारी किए

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ख़बर

नई दिल्ली। द हिंदू के व्याख्यात्मक लेख के अनुसार 18 सितंबर को न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन सहित एक पीठ ने महाराष्ट्र विष नियम, 1972 (Maharashtra Poisons Rules) के नियम 18A और 18B को रद्द कर दिया। मेथनॉल या मिथाइल अल्कोहल अत्यंत विषैला पदार्थ है, जिसका फ़ॉर्मेल्डिहाइड, पैराफ़ॉर्मेल्डिहाइड, पेंट, रेज़िन और अन्य रसायनों के लिए औद्योगिक कच्चे माल के रूप में व्यापक उपयोग होता है; अवैध शराब में मिलाए जाने पर यह जान ले लेता है या अंधा कर देता है। 1991 में मुंबई की ज़हरीली शराब त्रासदी में लगभग 93 लोगों की मृत्यु के बाद, तत्कालीन अपर पुलिस महानिदेशक पी.आर. पार्थसारथी की अध्यक्षता वाली समिति की सिफ़ारिश पर, महाराष्ट्र ने कड़े नियंत्रण लागू किए। 2011 में उसने नियम 18A और 18B जोड़े। नियम 18A(1) के अनुसार विक्रेता को मेथनॉल बेचने से पहले ख़रीदार के फ़ॉर्म A लाइसेंस की जाँच करनी थी; नियम 18A(2) के अनुसार औषधि-निर्माताओं के अलावा अन्य को बेचे जाने वाले मेथनॉल को “विकृत” (denatured) करना था, यानी उसमें एक रंजक (colourant) और एक कड़वाहट लाने वाला पदार्थ (bitterant) मिलाना था; और नियम 18B के अनुसार फ़ॉर्म A लाइसेंस के बिना कब्ज़े पर माल ज़ब्त किया जा सकता था। निर्माताओं का तर्क था कि रंग मिलाने से उनके उत्पाद पेंट और दवा उद्योग के ख़रीदारों के लिए अस्वीकार्य हो जाएँगे और मिलावटी पदार्थ उत्प्रेरकों (catalysts) को प्रभावित कर सकते हैं। राज्य का तर्क था कि मेथनॉल को दिखने योग्य और कड़वा बनाने से शराब में उसका दुरुपयोग रुकेगा। न्यायालय ने माना कि विष अधिनियम, 1919 (Poisons Act) राज्यों को विषों के कब्ज़े और बिक्री के विनियमन की शक्ति देता है, पर इन नियमों को अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) का उल्लंघन माना। के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) की आनुपातिकता कसौटी (proportionality test) लागू करते हुए उसने पाया कि मौतें रोकना वैध उद्देश्य है, पर ये नियम न तो उपयुक्त थे और न आवश्यक। लाइसेंस की जाँच से यह पता नहीं चलता कि ख़रीदार मेथनॉल का उपयोग कैसे करेगा, और राज्य यह नहीं दिखा सका कि मिलावटी पदार्थ इसके विचलन (diversion) को रोकेंगे। न्यायालय ने कहा, “पूर्ण अनुपालन की सबसे अच्छी स्थिति में भी यह उप-नियम उस दुरुपयोग को नहीं रोक सकता जिसे रोकना इसका लक्ष्य है,” और जोड़ा कि यह “एक बुराई को संबोधित तो करता है, पर वास्तव में उसका निवारण नहीं करता, जबकि उद्योगों पर निरंतर बोझ डालता है।” न्यायालय के अनुसार नियम 18B फ़ॉर्म B परमिट के अंतर्गत वैध कब्ज़े से टकरा सकता था। इसके बाद न्यायालय ने दिशानिर्देश जारी किए: राज्य मद्यनिषेध, आबकारी, पुलिस, परिवहन, उद्योग और स्वास्थ्य विभागों का गैर-सरकारी संगठनों के साथ समन्वय करें; सीमाओं और अवैध परिवहन की जाँच करें; अवैध शराब बनाने के ठिकानों की पहचान करें; मेथनॉल लाइसेंस केवल सत्यापन के बाद दें और उनकी नियमित समीक्षा करें; औद्योगिक उपयोगकर्ताओं से अतिरिक्त मेथनॉल लौटवाएँ और भंडार का अभिलेख रखवाएँ; और मेथनॉल को आबकारी की निगरानी में समर्पित, सीलबंद टैंकरों में ले जाया जाए। न्यायालय ने अधिक नशामुक्ति केंद्रों की भी माँग की। पाठ्यक्रम से जुड़ाव: मौलिक अधिकार, विनियमन और सार्वजनिक स्वास्थ्य।

कड़ी — एक पंक्ति में: मेथनॉल सस्ता है, औद्योगिक है, और अवैध शराब में मिलाए जाने पर घातक है → 1991 की मुंबई ज़हरीली शराब त्रासदी में लगभग 93 लोग मरते हैं → महाराष्ट्र 2011 में अपने विष नियमों में संशोधन कर लाइसेंस-जाँच और रंजक-कड़वाहट मिलाकर विकृतीकरण अनिवार्य करता है → निर्माता वैध उद्योग पर पड़ने वाले बोझ को चुनौती देते हैं → सर्वोच्च न्यायालय को ज़हरीली शराब रोकने से कोई सिद्ध संबंध नहीं मिलता; वह 18 सितंबर को नियम रद्द करता है और उनकी जगह आपूर्ति-शृंखला संबंधी दिशानिर्देश देता है

स्थैतिक पाठ्यक्रम से जुड़ाव

  1. मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंधों की कसौटी अब आनुपातिकता है. के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मौलिक अधिकार पर प्रतिबंध को वैधता, वैध उद्देश्य और आनुपातिकता की शर्तें पूरी करनी होंगी, यानी उपाय और उद्देश्य के बीच तार्किक संबंध हो और उपाय आवश्यक हो। इससे पहले मॉडर्न डेंटल कॉलेज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2016) में न्यायालय ने चार-चरणीय आनुपातिकता कसौटी अपनाई थी: वैध लक्ष्य, उपयुक्त साधन, कोई कम प्रतिबंधात्मक विकल्प न होना, और लाभ तथा हानि के बीच उचित संतुलन। मेथनॉल निर्णय में नियम उपयुक्तता और आवश्यकता के चरणों पर विफल हुए। राज्य को यह साक्ष्य देना होगा कि उसका उपाय कारगर है, केवल यह नहीं कि उसका उद्देश्य अच्छा है।
  2. अनुच्छेद 14 असमान वर्गीकरण के साथ-साथ मनमानेपन को भी निषिद्ध करता है. अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता और विधियों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। ई.पी. रोयप्पा बनाम तमिलनाडु राज्य (1974) और मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) के बाद से न्यायालय मानता आया है कि मनमानापन अपने आप में समता का विलोम है। शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) में उसने कहा कि स्पष्ट रूप से मनमाना होने पर विधायन को भी रद्द किया जा सकता है। महाराष्ट्र विष नियम जैसा अधीनस्थ विधान (subordinate legislation) ऐसी समीक्षा के लिए और अधिक खुला है, क्योंकि उसे अपने मूल अधिनियम की सीमा में भी रहना होता है।
  3. अनुच्छेद 19(1)(g) व्यापार की रक्षा करता है, अनुच्छेद 19(6) के युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन. अनुच्छेद 19(1)(g) नागरिकों को कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 19(6) राज्य को आम जनता के हित में युक्तियुक्त निर्बंधन लगाने, और वृत्तिक योग्यताएँ निर्धारित करने या स्वयं कोई व्यापार चलाने की अनुमति देता है। कोई निर्बंधन तभी युक्तियुक्त है जब उसका अपने उद्देश्य से निकट संबंध हो और वह अत्यधिक न हो। न्यायालय ने पाया कि मेथनॉल का विकृतीकरण अवैध शराब रोकने के उद्देश्य से इस “युक्तियुक्त और निकट संबंध” (reasonable and proximate nexus) की कसौटी पर विफल रहा।
  4. शराब और औद्योगिक अल्कोहल राज्य सूची में हैं, और अनुच्छेद 47 नीति का लक्ष्य तय करता है. राज्य सूची की प्रविष्टि 8 मादक लिकर, उसके उत्पादन, विनिर्माण, कब्ज़े, परिवहन, क्रय और विक्रय को समेटती है, और प्रविष्टि 51 मानव उपभोग के लिए ऐल्कोहॉली लिकर पर उत्पाद-शुल्क को। उत्तर प्रदेश राज्य बनाम ललता प्रसाद वैश्य (2024) में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने बहुमत से माना कि “मादक लिकर” में औद्योगिक अल्कोहल भी शामिल है, और सिंथेटिक्स एंड केमिकल्स (1990) को पलटते हुए इसके विनियमन की राज्यों की शक्ति की पुष्टि की। राज्य के नीति निदेशक तत्वों में शामिल अनुच्छेद 47 राज्य को सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधारने और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेयों तथा औषधियों के, औषधीय प्रयोजनों को छोड़कर, सेवन पर प्रतिषेध लाने का निर्देश देता है।

UPSC इसे क्यों पूछता है

  1. जीएस-2 पूछता है कि अधिकारों और राज्य-शक्ति के बीच संतुलन कैसे बनता है. युक्तियुक्त निर्बंधन, प्रत्यायोजित विधान का न्यायिक पुनर्विलोकन और आनुपातिकता का सिद्धांत जीएस-2 और विधि वैकल्पिक विषय में अक्सर आते हैं। यह मामला अच्छा उदाहरण है, क्योंकि उद्देश्य, यानी मौतें रोकना, अत्यंत प्रबल है, फिर भी न्यायालय ने यह साक्ष्य माँगा कि नियम कारगर है।
  2. ज़हरीली शराब की त्रासदियाँ शासन और जीएस-4 का बार-बार आने वाला मामला हैं. नकली शराब से मौतें मद्यनिषेध वाले और बिना मद्यनिषेध वाले, दोनों प्रकार के राज्यों में होती रहती हैं। ये प्रवर्तन, अंतर-विभागीय समन्वय और मद्यनिषेध नीति की नैतिकता के प्रश्न उठाती हैं, जो सभी जीएस-2 के शासन और जीएस-4 की केस स्टडी के अनुकूल हैं।

प्रीलिम्स तथ्य

  • अनुच्छेद 19(1)(g) सभी नागरिकों को कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार देता है, जो अनुच्छेद 19(6) के अंतर्गत युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन है।
  • राज्य के नीति निदेशक तत्वों में शामिल अनुच्छेद 47 राज्य को निर्देश देता है कि वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेयों और औषधियों के, औषधीय प्रयोजनों को छोड़कर, उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करे।
  • सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 8 मादक लिकर, जिसमें उसका उत्पादन, विनिर्माण, कब्ज़ा, परिवहन, क्रय और विक्रय शामिल है, से संबंधित है।
  • उत्तर प्रदेश राज्य बनाम ललता प्रसाद वैश्य (2024) में सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की पीठ ने माना कि राज्य मादक लिकर वाली प्रविष्टि के अंतर्गत औद्योगिक अल्कोहल का विनियमन कर सकते हैं।
  • विष अधिनियम, 1919 राज्य सरकारों को विषों के कब्ज़े और बिक्री का विनियमन करने वाले नियम बनाने की शक्ति देता है।
  • आनुपातिकता की कसौटी के अनुसार किसी अधिकार पर प्रतिबंध का उद्देश्य वैध हो, वह उसे प्राप्त करने के लिए उपयुक्त हो, न्यूनतम प्रतिबंधात्मक साधन के रूप में आवश्यक हो, और उचित संतुलन बनाए।
  • शरीर में मेथनॉल का चयापचय होकर फ़ॉर्मेल्डिहाइड और फ़ॉर्मिक अम्ल बनते हैं, जो चयापचयी अम्लरक्तता (metabolic acidosis) और दृक् तंत्रिका (optic nerve) को क्षति पहुँचाते हैं।

विश्लेषण

  1. न्यायालय ने राज्य से अपने नियम की कारगरता सिद्ध करने को कहा, यह स्वस्थ मानक है. वर्षों तक न्यायालय सुरक्षा संबंधी विनियमों को तब तक मान लेते थे जब तक उनका उद्देश्य अच्छा लगता था। यह पूछकर कि क्या विकृतीकरण वास्तव में ज़हरीली शराब रोकता है, न्यायालय ने साक्ष्य-आधारित समीक्षा की, और महाराष्ट्र यह नहीं दिखा सका कि रंग और कड़वाहट किसी को रोकते हैं। अवैध शराब बनाने वाले चोरी किया हुआ या विचलित मेथनॉल इस्तेमाल करते हैं, और देसी शराब का गहरा रंग मिलाए गए रंग को छिपा सकता है। जो नियम हर ईमानदार उपयोगकर्ता पर बोझ डाले और अपराधी को अछूता छोड़ दे, वह दक्षता और निष्पक्षता, दोनों पर विफल है।
  2. निर्णय लड़ाई को उत्पाद से हटाकर आपूर्ति-शृंखला पर ले जाता है. दिशानिर्देश बताते हैं कि असली रिसाव कहाँ होता है: परिवहन में, अतिरिक्त भंडार में और अनियमित भंडारण में। सीलबंद समर्पित टैंकर, आबकारी की निगरानी, अप्रयुक्त मेथनॉल की वापसी और भंडार अभिलेख विचलन को निशाना बनाते हैं, जहाँ से मेथनॉल वैध अर्थव्यवस्था से बाहर निकलता है। यह बेहतर रचना है, क्योंकि यह लागत को जोखिम वाले बिंदुओं पर केंद्रित करती है। इसकी कमज़ोरी यह है कि ऐसे नियंत्रणों के लिए सक्षम आबकारी विभाग चाहिए, जो कई राज्यों के पास नहीं हैं।
  3. विरोधी मत: अन्यत्र विकृतीकरण सामान्य प्रथा है. विकृत अल्कोहल (denatured alcohol), जिसमें कोई योजक एथनॉल को पीने योग्य नहीं रहने देता, औद्योगिक अल्कोहल के लिए व्यापक रूप से प्रचलित है, और महाराष्ट्र तर्क दे सकता था कि उसने बस यही तर्क मेथनॉल तक बढ़ाया। पर एथनॉल पिया जाता है, इसलिए उसे अपेय बनाना सीधे दुरुपयोग को रोकता है, जबकि मेथनॉल पहले से ही विषैला है और उसे वे अपराधी मिलाते हैं जिन्हें उसके स्वाद की परवाह नहीं। इसलिए यह सादृश्य तथ्यों पर टिकता नहीं। न्यायालय ने विनियमन को अस्वीकार नहीं किया; उसने ऐसे विनियमन को अस्वीकार किया जो अपने लक्ष्य पर सटीक नहीं बैठता था।
  4. ज़हरीली शराब माँग-पक्ष की समस्या है, जिसे केवल रसायनों के नियम हल नहीं कर सकते. गरीब पीने वाले अवैध शराब इसलिए ख़रीदते हैं क्योंकि वह वैध शराब से सस्ती होती है, प्रायः ऊँचे उत्पाद-शुल्क या मद्यनिषेध के कारण। नशामुक्ति और परामर्श केंद्रों की न्यायालय की माँग यह स्वीकार करती है कि माँग मायने रखती है। जो राज्य राजस्व के लिए शराब पर कर तेज़ी से बढ़ाते हैं या प्रवर्तन क्षमता के बिना मद्यनिषेध लागू करते हैं, वे वही बाज़ार बना देते हैं जिसे ज़हरीली शराब भरती है। किसी भी गंभीर नीति को वैध और अवैध शराब के बीच कीमत के अंतर पर ध्यान देना होगा, जिसे ये दिशानिर्देश नहीं छूते।
  5. औद्योगिक उपयोगकर्ता भी अधिकार-धारक हैं, और निर्णय यह स्पष्ट कहता है. पेंट, रेज़िन और दवा कंपनियाँ विनिर्माण आधार का हिस्सा हैं, और जो नियम उनके कच्चे माल को बेकार बना दे, वह रोज़गार और निर्यात को प्रभावित करता है। निर्णय पुष्टि करता है कि अनुच्छेद 19(1)(g) कोई कमतर अधिकार नहीं जिसे सुरक्षा के नाम पर यूँ ही छोड़ा जा सके। यह व्यापार सुगमता (ease of doing business) के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी त्रासदी के बाद बनाए गए अधीनस्थ नियम प्रायः अपनी उपयोगिता से अधिक समय तक चलते रहते हैं। जिस आवधिक समीक्षा की सिफ़ारिश न्यायालय लाइसेंसों के लिए करता है, वह स्वयं नियमों पर भी लागू होनी चाहिए।

संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“वैध उद्देश्य किसी अनुपयुक्त साधन को नहीं बचा सकता।” महाराष्ट्र के मेथनॉल नियमों पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के आलोक में भारत में आर्थिक विनियमन पर आनुपातिकता के सिद्धांत के प्रयोग की चर्चा कीजिए। ज़हरीली शराब की त्रासदियों के विरुद्ध एक प्रभावी रणनीति में क्या-क्या शामिल होना चाहिए? (15 अंक, 250 शब्द)

उत्तर की रूपरेखा

  1. भूमिका. निर्णय बताइए: 18 सितंबर को महाराष्ट्र विष नियम, 1972 के नियम 18A और 18B को अनुच्छेद 14 और 19(1)(g) का उल्लंघन मानकर रद्द किया गया, क्योंकि रंजक-कड़वाहट और लाइसेंस संबंधी नियम ज़हरीली शराब को नहीं रोकते थे।
  2. मुख्य भाग — सिद्धांत. मॉडर्न डेंटल कॉलेज (2016) और पुट्टस्वामी (2017) की आनुपातिकता कसौटी, अनुच्छेद 19(6) और अनुच्छेद 14 के अंतर्गत मनमानेपन के निषेध का सिद्धांत समझाइए। दिखाइए कि नियम उपयुक्तता और आवश्यकता के चरणों पर कैसे विफल हुए।
  3. मुख्य भाग — विनियमन और संघीय शक्ति. समझाइए कि राज्यों को विष अधिनियम, 1919 और राज्य सूची की प्रविष्टि 8 के अंतर्गत शक्ति है, जिसकी औद्योगिक अल्कोहल के लिए पुष्टि ललता प्रसाद वैश्य (2024) में हुई, और अनुच्छेद 47 नीति का मार्गदर्शन करता है। विवाद शक्ति का नहीं, नियम की रचना का था।
  4. मुख्य भाग — प्रभावी रणनीति. न्यायालय के दिशानिर्देशों का उपयोग कीजिए: अंतर-विभागीय समन्वय, लाइसेंस का सत्यापन और समीक्षा, भंडार अभिलेख और अतिरिक्त की वापसी, आबकारी निगरानी में सीलबंद टैंकर, सीमा-जाँच और नशामुक्ति केंद्र। कीमत के अंतर पर माँग-पक्ष का बिंदु और ज़िला अस्पतालों में प्रतिविष (antidote) के साथ त्वरित चिकित्सा प्रतिक्रिया जोड़िए।
  5. निष्कर्ष. निष्कर्ष दीजिए कि अच्छा विनियमन हानि के बिंदु को निशाना बनाता है और साक्ष्य पर आधारित होता है, और यह निर्णय जीवन तथा वैध आजीविका, दोनों की रक्षा करता है।

प्रशासक की दृष्टि

आप ज़िलाधिकारी हैं और ज़हरीली शराब की एक त्रासदी में बारह लोगों की मृत्यु हो गई है। आपके पहले 48 घंटे कैसे होंगे?

सबसे पहले मैं जानें बचाऊँगा: सभी अस्पतालों को सतर्क करूँगा, प्रतिविष और डायलिसिस की व्यवस्था करूँगा, और लक्षणों की सार्वजनिक घोषणा करूँगा ताकि जिन्होंने भी यह शराब पी हो वे सामने आएँ। मैं स्रोत पर छापों का आदेश दूँगा, आपूर्ति सील करूँगा और पता लगाऊँगा कि मेथनॉल कहाँ से आया, क्योंकि न्यायालय के दिशानिर्देश औद्योगिक उपयोगकर्ताओं से विचलन की ओर संकेत करते हैं। मैं एक नियंत्रण कक्ष के माध्यम से आबकारी, पुलिस और स्वास्थ्य विभागों का समन्वय करूँगा और परिवारों के लिए राहत की घोषणा करूँगा। शिकायतों की अनदेखी करने वाले स्थानीय अधिकारियों की जवाबदेही एक त्वरित जाँच के बाद तय होनी चाहिए।

आबकारी आयुक्त के रूप में आप उद्योग को नुकसान पहुँचाए बिना सर्वोच्च न्यायालय के मेथनॉल दिशानिर्देश कैसे लागू करेंगे?

मैं हर मेथनॉल लाइसेंसधारी का डिजिटल रजिस्टर बनाऊँगा, जिसमें भंडार और खपत का मासिक विवरण और समर्पित टैंकरों की जीपीएस ट्रैकिंग हो। आकस्मिक लेखा-परीक्षण उन उपयोगकर्ताओं पर केंद्रित होंगे जिनकी खपत उनके उत्पादन से मेल नहीं खाती। मैं अतिरिक्त मेथनॉल की वापसी की व्यवस्था बनाऊँगा और नियमों का पालन करने वाली फ़र्मों के लिए लाइसेंस नवीनीकरण सरल करूँगा। उद्योग पूर्वानुमेय और लक्षित नियंत्रण स्वीकार करता है; वह उन व्यापक नियमों का विरोध करता है जो उसके उत्पादों को बेकार बना दें।

साक्षात्कार बोर्ड पूछता है: क्या किसी त्रासदी के बाद सरकार को जल्दी नियम बनाने चाहिए?

त्रासदी के बाद सरकार को तेज़ी से प्रतिक्रिया देनी ही चाहिए, पर साक्ष्य के बिना जल्दबाज़ी में बने नियम निर्दोषों पर बोझ डाल सकते हैं और दोषियों तक नहीं पहुँचते, जैसा मेथनॉल मामला दिखाता है। बेहतर तरीका यह है कि मौजूदा कानून के अंतर्गत तुरंत प्रवर्तन हो, और उसके बाद परामर्श तथा विफलता की समीक्षा करके नियम बनाए जाएँ। नियमों में समीक्षा खंड होना चाहिए ताकि परिणामों पर उनकी परख हो सके। जनाक्रोश कार्रवाई का कारण है, सोच-विचार छोड़ने का नहीं।