UPSC Darpan

2. अर्थव्यवस्था (Economy)GS324 September 2026

भारत–EU मुक्त व्यापार समझौते पर 16 दिसंबर को ब्रसेल्स में हस्ताक्षर होंगे, सदस्य देशों के अनुसमर्थन की ज़रूरत नहीं

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ख़बर

नई दिल्ली। दो राजनयिक सूत्रों ने अलग-अलग द हिंदू से पुष्टि की है कि भारत और यूरोपीय संघ (European Union — EU) के बीच मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement — FTA) पर 16 दिसंबर को हस्ताक्षर होंगे; एक सूत्र के अनुसार हस्ताक्षर ब्रसेल्स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में होंगे। आज की नई बात तारीख़ और अनुसमर्थन का रास्ता है; यह पत्रिका इस समझौते के तहत EU इस्पात कोटा और कॉपीराइट से जुड़े एक मसौदा अध्याय पर पहले लिख चुकी है। दोनों पक्षों के नेताओं ने जिस समझौते को “सभी समझौतों की जननी” (mother of all deals) कहा, उस पर वार्ता लंबे अंतराल के बाद जून 2022 में फिर शुरू हुई और जनवरी 2026 में पूरी हुई। EU भारत से आने वाली 99.5% निर्यात मदों पर शुल्क घटाएगा, और इनमें से अधिकांश पर समझौता लागू होते ही शुल्क शून्य हो जाएगा, जबकि भारत ने दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापार-मूल्य के 97.5% हिस्से पर शुल्क रियायतें दी हैं। चूँकि यूरोप में इस समझौते को “बहुमत का समर्थन” प्राप्त है, इसलिए यूरोपीय परिषद (European Council) की हरी झंडी मिलने के बाद हर EU देश को इसका अलग से अनुसमर्थन (ratification) — यानी वह औपचारिक कृत्य जिससे हस्ताक्षरित संधि बाध्यकारी बनती है — नहीं करना होगा; द हिंदू इस समर्थन का श्रेय दोनों पक्षों के उस निर्णय को देता है जिसके तहत विवादित मुद्दों को बाहर रखा गया और “सर्वश्रेष्ठ को अच्छे का शत्रु” नहीं बनने दिया गया। हस्ताक्षर के बाद यूरोपीय संसद को समझौता पारित करना होगा, जिसमें एक से दो महीने और लगेंगे, और इसके बाद “2027 की शुरुआत” में इसके लागू होने का रास्ता खुलेगा। यह यात्रा दिसंबर में श्री मोदी की कनाडा, अमेरिका और बेल्जियम की लगातार यात्राओं का हिस्सा है, जहाँ तीन अलग-अलग FTA पर या तो बातचीत चल रही है या वे मंज़ूरी की प्रतीक्षा में हैं; मियामी में होने वाले G-20 शिखर सम्मेलन से पहले उनके लगभग 12 दिसंबर को कनाडा पहुँचने की संभावना है, और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा है कि व्यापार वार्ता में “अच्छी प्रगति” हुई है। 29 जनवरी के PIB के एक FAQ के अनुसार 2024-25 में भारत–EU व्यापार 136.54 अरब डॉलर रहा, जिसमें भारतीय निर्यात 75.85 अरब डॉलर का था। एक संपादकीय में द हिंदू तर्क देता है कि 20 अक्टूबर से लागू भारत–न्यूज़ीलैंड FTA दिखाता है कि छोटे समझौते बड़े समझौतों के पूरक क्यों होते हैं: 1.1 अरब डॉलर का द्विपक्षीय वस्तु व्यापार भारत के कुल व्यापार के 1% से भी कम है, फिर भी भारत ने अपने 100% निर्यात के लिए शुल्क-मुक्त पहुँच हासिल की, डेयरी और अपनी लगभग 30% आयात मदों (import lines) को शुल्क रियायतों से बाहर रखा, और 15 वर्षों में 20 अरब डॉलर के निवेश को सुगम बनाने की प्रतिबद्धता भी प्राप्त की। पाठ्यक्रम से जुड़ाव: GS3 (व्यापार और उदारीकरण) तथा GS2 (भारत के हितों को प्रभावित करने वाले समझौते)।

कड़ी — एक पंक्ति में: 2007 में शुरू हुई भारत–EU व्यापक आधार वाले व्यापार एवं निवेश समझौते (Broad-based Trade and Investment Agreement — BTIA) की वार्ता 2013 तक ठप हो जाती है → भारत 2019 में RCEP से बाहर निकलता है और संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षा-घेरे में रखते हुए द्विपक्षीय समझौतों की ओर मुड़ता है → जून 2022 में वार्ता फिर शुरू होती है और विवादित मुद्दों को बाहर रखकर जनवरी 2026 में पूरी होती है → सीमित दायरे के कारण यूरोप में बहुमत का समर्थन मिलता है, इसलिए किसी सदस्य देश को अलग से अनुसमर्थन नहीं करना पड़ता → 16 दिसंबर को ब्रसेल्स में हस्ताक्षर, एक से दो महीने में यूरोपीय संसद की स्वीकृति और 2027 की शुरुआत में क्रियान्वयन

स्थैतिक पाठ्यक्रम से जुड़ाव

  1. व्यापार EU की अनन्य क्षमता है, और यही ‘केवल-EU’ समझौते को संभव बनाता है. यूरोपीय संघ की कार्यप्रणाली संबंधी संधि (Treaty on the Functioning of the European Union — TFEU) का अनुच्छेद 3(1)(e) साझा वाणिज्यिक नीति (common commercial policy) को ऐसा क्षेत्र बनाता है जिसमें केवल संघ ही कार्य कर सकता है, और अनुच्छेद 207 इसका विस्तार वस्तुओं, सेवाओं, बौद्धिक संपदा के वाणिज्यिक पहलुओं और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश तक करता है। अनुच्छेद 218 के तहत वार्ता यूरोपीय आयोग (European Commission) करता है; यूरोपीय संघ की परिषद (Council of the EU) — जिसमें सदस्य देशों के मंत्री होते हैं — हस्ताक्षर को अधिकृत करती है और समझौते को संपन्न करती है, सामान्यतः योग्य बहुमत (qualified majority) से, यानी ऐसे 55% सदस्य देशों की सहमति से जो EU की कम से कम 65% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हों; और यूरोपीय संसद की सहमति भी अनिवार्य है। इन्हीं क्षेत्रों तक सीमित समझौता सभी 27 सदस्य देशों पर बाध्यकारी होता है, भले ही किसी भी राष्ट्रीय संसद ने उस पर मतदान न किया हो। द हिंदू के सूत्र यूरोपीय परिषद की बात करते हैं, जो राष्ट्राध्यक्षों या शासनाध्यक्षों का वह मंच है जो राजनीतिक दिशा तय करता है; औपचारिक निर्णय यूरोपीय संघ की परिषद लेती है।
  2. मिश्रित समझौतों के लिए हर सदस्य देश का अनुसमर्थन चाहिए, और EU के व्यापार समझौते यहीं अटकते हैं. EU–सिंगापुर FTA पर मई 2017 की अपनी राय 2/15 (Opinion 2/15) में यूरोपीय संघ के न्यायालय (Court of Justice of the EU) ने माना कि लगभग पूरा समझौता संघ अकेले संपन्न कर सकता है, पर गैर-प्रत्यक्ष (पोर्टफ़ोलियो) निवेश और निवेशक–राज्य विवाद निपटान (investor–state dispute settlement) ऐसी क्षमताएँ हैं जो सदस्य देशों के साथ साझा हैं। ऐसे साझा तत्वों वाला समझौता ‘मिश्रित समझौता’ (mixed agreement) कहलाता है, जिसका अनुसमर्थन हर सदस्य देश को भी करना पड़ता है, और कुछ मामलों में क्षेत्रीय संसदों के ज़रिए भी। इसलिए EU अब अपने समझौतों को दो हिस्सों में बाँट देता है: EU–सिंगापुर व्यापार समझौता नवंबर 2019 में ‘केवल-EU’ समझौते के रूप में लागू हो गया, जबकि उसका निवेश संरक्षण समझौता धीमे राष्ट्रीय रास्ते से आगे बढ़ रहा है। EU–कनाडा व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (Comprehensive Economic and Trade Agreement — CETA) मिश्रित रास्ते का ख़तरा दिखाता है: अक्टूबर 2016 में वालोनिया (Wallonia) की क्षेत्रीय संसद ने कुछ समय के लिए बेल्जियम के हस्ताक्षर रोक दिए थे, और सितंबर 2017 से यह समझौता केवल अनंतिम रूप से (provisionally) लागू है।
  3. WTO क़ानून FTA की अनुमति तभी देता है जब वह ‘लगभग समस्त व्यापार’ को समेटे, भारत उसे चाहे जो नाम दे. शुल्क एवं व्यापार पर सामान्य समझौते (General Agreement on Tariffs and Trade — GATT) का अनुच्छेद XXIV मुक्त व्यापार क्षेत्रों और सीमा शुल्क संघों को सर्वाधिक अनुगृहीत राष्ट्र (most-favoured-nation) व्यवहार के अपवाद के रूप में अनुमति देता है, बशर्ते पक्षकारों के बीच “लगभग समस्त व्यापार” (substantially all the trade) पर शुल्क समाप्त कर दिए जाएँ; सेवाओं के लिए इसका समानांतर नियम सेवा व्यापार पर सामान्य समझौते (General Agreement on Trade in Services) का अनुच्छेद V है। भारतीय व्यवहार में कई नाम चलते हैं: FTA प्रायः वस्तुओं के व्यापार के लिए कहा जाता है, जबकि व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (Comprehensive Economic Cooperation Agreement — CECA) या व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (Comprehensive Economic Partnership Agreement — CEPA) इसमें सेवाएँ, निवेश और अन्य अनुशासन जोड़ता है — जैसे भारत–सिंगापुर CECA (2005), भारत–जापान CEPA (2011) और भारत–UAE CEPA (2022)। ये नाम राजनीतिक चुनाव हैं; WTO क़ानून केवल यह देखता है कि व्यापार का कितना हिस्सा दायरे में आया।
  4. CBAM, उद्गम के नियम और संवेदनशील क्षेत्रों की छूट तय करती हैं कि शुल्क कटौती वास्तव में कितनी मूल्यवान है. विनियम (EU) 2023/956 [Regulation (EU) 2023/956] से बना EU का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (Carbon Border Adjustment Mechanism — CBAM) लोहा और इस्पात, एल्युमिनियम, सीमेंट, उर्वरक, बिजली और हाइड्रोजन के उत्पादन में उत्सर्जित कार्बन के लिए आयातकों से भुगतान वसूलता है; अक्टूबर 2023 से चले केवल-रिपोर्टिंग वाले चरण के बाद, 1 जनवरी 2026 से आयात पर वित्तीय दायित्व लागू है। यह एकतरफ़ा उपाय है, सीमा शुल्क नहीं, इसलिए FTA का शून्य शुल्क इसे नहीं हटाता, जैसा कि इस पत्रिका ने 18 सितंबर को लिखा था। उद्गम के नियम (rules of origin) तय करते हैं कि किसी वस्तु को साझेदार देश में बनी माना जाए या नहीं; PIB के FAQ के अनुसार भारत–EU समझौता द्विपक्षीय संचयन (bilateral cumulation) की अनुमति देता है — यानी किसी भी साझेदार से लिया गया कच्चा माल उद्गम-योग्य माना जाता है — और विदेश व्यापार महानिदेशालय (Directorate General of Foreign Trade — DGFT) के एक प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए उद्गम की स्व-घोषणा (self-declaration) की अनुमति भी देता है। इसी FAQ के अनुसार भारत ने डेयरी, गोमांस और पोल्ट्री, मछली और समुद्री खाद्य, अनाज, फल और सब्ज़ियाँ, मेवे और खाद्य तेल को सुरक्षित रखा, जबकि EU ने मांस, डेयरी, शहद, चावल, चीनी और तंबाकू को बाहर रखा।

UPSC इसे क्यों पूछता है

  1. BTIA प्रारंभिक परीक्षा में आ चुका है; अब हस्ताक्षरित FTA की बारी है. UPSC प्रारंभिक परीक्षा 2017 में पूछा गया था कि ‘व्यापक आधार वाला व्यापार एवं निवेश समझौता (BTIA)’ शब्द किन वार्ताओं के संदर्भ में आता है; उत्तर था भारत और यूरोपीय संघ। हस्ताक्षरित समझौता, उसका ‘केवल-EU’ रास्ता और CBAM इसकी स्वाभाविक अगली कड़ियाँ हैं, और यूरोपीय परिषद बनाम यूरोपीय संघ की परिषद जैसे भेद ठीक वही जाल हैं जो UPSC बिछाता है।
  2. GS2 और GS3 दोनों इस ख़बर पर दावा करते हैं. GS2 पाठ्यक्रम में भारत से जुड़े या उसके हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह तथा समझौते शामिल हैं, और GS3 में अर्थव्यवस्था पर उदारीकरण के प्रभाव। मुख्य परीक्षा के व्यापार संबंधी प्रश्न प्रायः FTA साझेदारों के साथ व्यापार घाटे और RCEP से बाहर निकलने पर टिके होते हैं; EU समझौता दिखाता है कि भारत अब उस सुरक्षा-घेरे के साथ वार्ता कर रहा है जो उसके पहले के समझौतों में नहीं था।
  3. व्यापार और जलवायु का जुड़ाव एक उभरता विषय है. CBAM, GS3 में व्यापार को पर्यावरण से जोड़ता है; स्वाभाविक प्रश्न यह है कि क्या कार्बन सीमा कर हरे लिबास में छिपा संरक्षणवाद हैं, और संशोधित ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 (Energy Conservation Act, 2001) के तहत 2023 में अधिसूचित भारत की कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (Carbon Credit Trading Scheme) इस प्रश्न के उत्तर का घरेलू पक्ष है।

प्रीलिम्स तथ्य

  • यूरोपीय संघ की कार्यप्रणाली संबंधी संधि के अनुच्छेद 3(1)(e) के तहत साझा वाणिज्यिक नीति EU की अनन्य क्षमता का क्षेत्र है।
  • TFEU के अनुच्छेद 218 के तहत यूरोपीय संघ की परिषद अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर हस्ताक्षर करती है और उन्हें संपन्न करती है, तथा व्यापार समझौतों के लिए यूरोपीय संसद की सहमति आवश्यक है।
  • EU–सिंगापुर FTA पर राय 2/15 (2017) में यूरोपीय संघ के न्यायालय ने माना कि पोर्टफ़ोलियो निवेश और निवेशक–राज्य विवाद निपटान सदस्य देशों के साथ साझा क्षमताएँ हैं, इसलिए इन्हें शामिल करने वाले समझौते ‘मिश्रित’ समझौते होते हैं जिनके लिए सदस्य देशों का अनुसमर्थन आवश्यक है।
  • यूरोपीय परिषद में सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष या शासनाध्यक्ष, उसके अध्यक्ष और यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष शामिल होते हैं; यह यूरोपीय संघ की परिषद से भिन्न है, जिसमें राष्ट्रीय मंत्री होते हैं।
  • GATT का अनुच्छेद XXIV मुक्त व्यापार क्षेत्रों और सीमा शुल्क संघों को सर्वाधिक अनुगृहीत राष्ट्र सिद्धांत के अपवाद के रूप में अनुमति देता है, बशर्ते पक्षकारों के बीच लगभग समस्त व्यापार पर शुल्क समाप्त कर दिए जाएँ।
  • EU का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र लोहा और इस्पात, एल्युमिनियम, सीमेंट, उर्वरक, बिजली और हाइड्रोजन के आयात पर लागू होता है।

विश्लेषण

  1. समझौता जो बाहर छोड़ता है, वही उसकी गति की क़ीमत है. द हिंदू का सूत्र स्पष्ट कहता है कि बहुमत का समर्थन इसलिए मिला क्योंकि विवादित मुद्दे बाहर रखे गए, और EU क़ानून बताता है कि यह क्यों अहम है। पोर्टफ़ोलियो निवेश या निवेशक–राज्य मध्यस्थता को छूने वाला कोई भी अध्याय समझौते को ‘मिश्रित’ बना देता और उसे 27 राष्ट्रीय तथा कुछ क्षेत्रीय संसदों के सामने खड़ा कर देता। इसे ‘केवल-EU’ रखना सोच-समझकर चुनी गई संरचना है, और CETA के अनुभव के बाद एक समझदारी भरी संरचना। इसकी क़ीमत यह है कि निवेश संरक्षण — जिस पर भारत और EU ने 2022 में भौगोलिक संकेतक (geographical indications) समझौते के साथ-साथ अलग वार्ता शुरू की थी — बाहर रह जाता है और उसे धीमे मिश्रित रास्ते से गुज़रना होगा। प्रतिपक्ष यह है कि मूल्य का बड़ा हिस्सा वस्तुओं और सेवाओं में ही है, और अभी हस्ताक्षरित एक सीमित समझौता उस संपूर्ण समझौते से बेहतर है जो एक दशक तक संसदों में अटका रहे।
  2. शुल्क की विषमता काग़ज़ पर भारत के पक्ष में है, पर असली लाभ प्रतिस्पर्धियों से बराबरी है. भारत की 99.5% निर्यात मदों पर EU की कटौती और बदले में व्यापार-मूल्य के 97.5% पर भारत की रियायतें — जिनमें से कई PIB के FAQ के अनुसार पाँच, सात या दस वर्षों में चरणबद्ध हैं — स्पष्ट जीत जैसी दिखती हैं। लेकिन EU के औसत शुल्क पहले से ही कम हैं, इसलिए लाभ वस्त्र, परिधान, चमड़ा और जूते-चप्पल जैसी श्रम-प्रधान वस्तुओं में सिमट जाता है। वहाँ प्रतिद्वंद्वियों को पहले से अधिमान्य पहुँच मिली हुई है — वियतनाम को EU के साथ अपने FTA के ज़रिए, जो अगस्त 2020 से लागू है, और बांग्लादेश को अल्प-विकसित देशों के लिए EU की ‘हथियारों के अलावा सब कुछ’ (Everything But Arms) योजना के ज़रिए। इन क्षेत्रों के लिए यह समझौता कोई बढ़त नहीं बनाता, बल्कि बराबरी का मैदान लौटाता है, इसलिए लाभ इस पर निर्भर करेगा कि पैमाने और अनुपालन में प्रतिस्पर्धियों की बराबरी हो पाती है या नहीं।
  3. यूरोप की संसद उस समझौते की जाँच-परख करेगी, जिस पर भारत की संसद कभी मतदान नहीं करेगी. समझौता लागू होने से पहले यूरोपीय संसद की सहमति अनिवार्य है, और वह इस शक्ति का उपयोग साझेदारों पर श्रम, पर्यावरण और मानवाधिकार के मुद्दों पर दबाव बनाने के लिए करती रही है; एक से दो महीने का अनुमान यह मानकर चलता है कि समझौता बिना अड़चन पारित हो जाएगा। भारत में संधि करना कार्यपालिका की शक्ति है: संघ सूची की प्रविष्टि 14 संधियाँ करने और उन्हें लागू करने से संबंधित है, और अनुच्छेद 253 संसद को उन्हें लागू करने के लिए क़ानून बनाने की शक्ति देता है, पर कोई क़ानून यह अनिवार्य नहीं करता कि संसद किसी FTA को स्वीकृति दे। इस तरह यूरोपीय हितधारकों को एक औपचारिक सार्वजनिक बहस मिलती है, जो भारतीय किसानों, छोटी फ़र्मों और श्रमिक संघों को नहीं मिलती। प्रतिपक्ष यह है कि कार्यपालिका का लचीलापन भारत को तेज़ी से वार्ता करने देता है; बीच का रास्ता यह है कि हर हस्ताक्षरित FTA को प्रभाव आकलन के साथ संसद के पटल पर रखा जाए।
  4. न्यूज़ीलैंड वाला संपादकीय विविधीकरण पर सही है, पर जटिलता पर चुप है. द हिंदू का तर्क है कि जब 100% अमेरिकी शुल्कों का ख़तरा मंडरा रहा हो और अमेरिका से समझौता हाथ न आ रहा हो, तब छोटे समझौते निर्यातकों को — जिनमें लगभग आधे सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) हैं — वैकल्पिक रास्ते देते हैं। न्यूज़ीलैंड को भारत के निर्यात में लगभग 14% हिस्सा रखने वाले वस्त्र, और लगभग 5% हिस्सा रखने वाले मोती तथा अर्ध-क़ीमती पत्थर, ऐसी श्रम-प्रधान मदें हैं जिन्हें शून्य शुल्क से लाभ होता है। लेकिन EU के साथ संबंध 1.1 अरब डॉलर वाले न्यूज़ीलैंड संबंध से सौ गुना से भी बड़ा है, और छोटे समझौते उसका विकल्प नहीं बन सकते। हर समझौता अपने अलग उद्गम नियम भी लाता है, और किसी छोटे निर्यातक के लिए अनुपालन की लागत बचाए गए शुल्क से अधिक हो सकती है — यह भी एक कारण है कि भारत के FTA का उपयोग कम रहा है; विविधीकरण के लिए सरल डिजिटल प्रक्रियाएँ चाहिए, जैसे उद्गम की वह स्व-घोषणा जिसकी अनुमति EU समझौता देता है।
  5. CBAM परखेगा कि काग़ज़ पर मिली बाज़ार पहुँच व्यवहार में बदलती है या नहीं. भारतीय इस्पात और एल्युमिनियम EU में शून्य शुल्क पर प्रवेश करेंगे, पर उनमें निहित कार्बन के लिए CBAM के तहत भुगतान करेंगे, जिसे FTA छूता तक नहीं। CBAM विनियम उद्गम देश में वास्तव में चुकाई गई कार्बन क़ीमत की कटौती की अनुमति देता है, और इससे भारत की अपनी कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना को रणनीतिक महत्त्व मिल जाता है: एक विश्वसनीय घरेलू कार्बन क़ीमत यह पैसा ब्रसेल्स भेजने के बजाय भारत में ही रखेगी। प्रतिपक्ष यह है कि भारत को CBAM का विरोध एक ऐसी एकतरफ़ा बाधा के रूप में करना चाहिए जो साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व (common but differentiated responsibilities) के सिद्धांत से मेल नहीं खाती, जैसा वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तर्क देता रहा है। दोनों काम एक साथ हो सकते हैं — सिद्धांत में आपत्ति, व्यवहार में तैयारी — क्योंकि जो छोटी ढलाई इकाइयाँ (foundries) अपना उत्सर्जन माप नहीं सकतीं, वे यूरोपीय ख़रीदार सबसे पहले खोएँगी।

संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“भारत–EU मुक्त व्यापार समझौते की गति का श्रेय जितना उसमें शामिल बातों को है, उतना ही उन बातों को भी है जिन्हें उससे बाहर रखा गया।” EU की संधि प्रक्रिया, भारत द्वारा संवेदनशील क्षेत्रों के संरक्षण और EU के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

उत्तर की रूपरेखा

  1. भूमिका. जनवरी 2026 में संपन्न FTA पर 16 दिसंबर को ब्रसेल्स में हस्ताक्षर होंगे; इसमें भारत की 99.5% निर्यात मदों पर EU की शुल्क कटौती, व्यापार-मूल्य के 97.5% पर भारत की रियायतें और 2027 की शुरुआत में क्रियान्वयन शामिल हैं।
  2. मुख्य भाग — समझौता क्या बाहर छोड़ता है. TFEU के अनुच्छेद 3 और 207 के तहत EU की अनन्य क्षमता, अनुच्छेद 218 की प्रक्रिया और राय 2/15 समझाइए। दिखाइए कि विवादित मुद्दों को बाहर रखने से समझौता ‘केवल-EU’ बना रहता है और 27 राष्ट्रीय अनुसमर्थनों से बच जाता है; इसके लिए CETA के वालोनिया प्रकरण का उल्लेख कीजिए। दोनों पक्षों की छूटें बताइए: भारत की ओर से डेयरी, अनाज और खाद्य तेल; EU की ओर से मांस, डेयरी, चावल और चीनी।
  3. मुख्य भाग — क्या अनसुलझा रह गया. CBAM शुल्कों से स्वतंत्र रूप से लागू होता है; निवेश संरक्षण संधि से बाहर है; यूरोपीय संसद श्रम और पर्यावरण पर दबाव बना सकती है। उत्तर के रूप में देश में चुकाई गई कार्बन क़ीमत के लिए CBAM में मिलने वाली कटौती और भारत की कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना का सुझाव दीजिए।
  4. मुख्य भाग — भारत की व्यापक रणनीति. इस समझौते को UAE, ऑस्ट्रेलिया, EFTA, ब्रिटेन और न्यूज़ीलैंड के साथ हुए समझौतों तथा दिसंबर की कनाडा और अमेरिका यात्राओं के साथ रखकर देखिए; द हिंदू के संपादकीय के आधार पर तर्क दीजिए कि छोटे और बड़े समझौते एक-दूसरे के पूरक हैं, बशर्ते उद्गम संबंधी प्रक्रियाएँ इतनी सरल हों कि MSME उनका लाभ उठा सकें।
  5. निष्कर्ष. निष्कर्ष दीजिए कि अभी हस्ताक्षरित सीमित समझौता एक दशक तक अटके व्यापक समझौते से बेहतर है, बशर्ते भारत क्रियान्वयन से पहले के महीनों का उपयोग निर्यातकों को CBAM और उद्गम-अनुपालन के लिए तैयार करने में करे।

प्रशासक की दृष्टि

आप वाणिज्य मंत्रालय में संयुक्त सचिव हैं। यूरोपीय संसद के सदस्य संकेत देते हैं कि सहमति-मतदान से पहले वे भारतीय वस्त्र इकाइयों में श्रम स्थितियों पर सवाल उठाएँगे। आप क्या प्रतिक्रिया देंगे?

मैं इस मतदान को नाराज़गी का कारण मानने के बजाय हितधारकों से संवाद की एक प्रक्रिया मानूँगा। मैं नवंबर 2025 से लागू श्रम संहिताओं और कारख़ाना निरीक्षणों से जुड़े प्रमाण साझा करूँगा, और ब्रसेल्स स्थित दूतावास के माध्यम से नियमों का पालन करने वाले क्लस्टरों के दौरे आयोजित कराऊँगा। मैं वार्ता से तय हो चुके पाठ को दोबारा नहीं खोलूँगा, क्योंकि समझौते की गति विवादित मुद्दों को बाहर रखने पर ही टिकी है। जहाँ वास्तविक कमियाँ हैं, जैसे अनौपचारिक उप-ठेकेदारी, वहाँ मैं नई संधि-प्रतिबद्धताओं के बजाय घरेलू सुधार सामने रखूँगा।

वस्त्र और परिधान क्लस्टर के ज़िलाधिकारी के रूप में आप स्थानीय निर्यातकों को 2027 की शुरुआत से EU बाज़ार के लिए कैसे तैयार करेंगे?

मैं ज़िला निर्यात संवर्धन समिति और निर्यात संवर्धन परिषदों के माध्यम से उन इकाइयों की पहचान करूँगा जो पहले से यूरोप को निर्यात करती हैं, और उनकी भी जो कर सकती हैं। प्राथमिकता सब्सिडी नहीं, अनुपालन होगी: DGFT प्लेटफ़ॉर्म पर उद्गम की स्व-घोषणा, उत्पाद मानक, और इस्पात या एल्युमिनियम को कच्चे माल के रूप में उपयोग करने वाली इकाइयों के लिए उत्सर्जन के वे रिकॉर्ड जिनकी माँग यूरोपीय ख़रीदार बढ़ते पैमाने पर करेंगे। सफलता इस बात से नहीं आँकी जाएगी कि कितनी बैठकें हुईं, बल्कि इस बात से कि 2027 में कितने पहली बार के निर्यातकों ने अधिमान्य शुल्क का लाभ उठाया।

साक्षात्कार बोर्ड पूछता है: क्या भारत के मुक्त व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर से पहले संसद की स्वीकृति अनिवार्य होनी चाहिए?

संवैधानिक रूप से संधि करना संघ सूची की प्रविष्टि 14 के तहत कार्यपालिका का कार्य है, और संसद अनुच्छेद 253 के तहत केवल वहीं क़ानून बनाती है जहाँ क्रियान्वयन के लिए इसकी आवश्यकता हो। अनिवार्य मतदान वार्ताओं को धीमा कर सकता है और साझेदारों को हमारी घरेलू राजनीति का फ़ायदा उठाने का मौक़ा दे सकता है। लेकिन FTA किसानों और छोटी फ़र्मों की आजीविका बदल देते हैं, और हस्ताक्षर से पहले एक सार्वजनिक प्रभाव आकलन संसद के पटल पर रखने से संसद को वीटो दिए बिना ही वैधता बढ़ेगी। इसी समझौते में यूरोपीय संसद की भूमिका दिखाती है कि जाँच-परख और गति साथ-साथ चल सकती हैं।