2. अर्थव्यवस्था (Economy)GS324 September 2026
इनपुट QCO का संबंध छोटी फ़र्मों की लाभप्रदता में 47.6% गिरावट से, 600 से अधिक उत्पाद पुनर्मूल्यांकन की प्रतीक्षा में
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ख़बर
नई दिल्ली। सेंटर फ़ॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस (Centre for Social and Economic Progress — CSEP) की फ़ेलो प्रेरणा प्रभाकर और क्रॉफ़र्ड स्कूल ऑफ़ पब्लिक पॉलिसी (Crawford School of Public Policy) की विज़िटिंग फ़ेलो नैन्सी गुप्ता द हिंदू में तर्क देती हैं कि भारत की अनिवार्य उत्पाद-मानक व्यवस्था को सुधार के एक दूसरे दौर की ज़रूरत है, जिसका निशाना कच्चा माल यानी इनपुट हों। गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (Quality Control Order — QCO) सरकार का वह आदेश है जो किसी उत्पाद के लिए भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards — BIS) के मानक को अनिवार्य बना देता है, ताकि BIS प्रमाणन के बिना उसे न बनाया जा सके, न आयात किया जा सके और न बेचा जा सके। QCO के दायरे में आने वाले उत्पाद 2019 में 88 थे, जो दिसंबर 2024 के अंत तक 765 हो गए; लेकिन 2025 के अंत की ओर यह रफ़्तार काफ़ी धीमी पड़ गई, क्योंकि कई QCO — विशेषकर मध्यवर्ती वस्तुओं (intermediate goods) पर लगे आदेश — रद्द या निलंबित कर दिए गए, कारण यह था कि अनिवार्य प्रमाणन से कच्चे माल की उपलब्धता, लागत और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान को लेकर चिंताएँ पैदा हो गई थीं। जुलाई 2026 में भारत की आठवीं WTO व्यापार नीति समीक्षा (Trade Policy Review) में भारत के QCO और अन्य गैर-शुल्क बाधाओं (non-tariff barriers) पर चिंता जताई गई — केवल EU और अमेरिका ने ही नहीं, बल्कि BRICS के साथी सदस्य ब्राज़ील, चीन और इंडोनेशिया ने भी। 25 जून 2026 को उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (Department for Promotion of Industry and Internal Trade — DPIIT) ने संक्रमण सुविधा (गुणवत्ता नियंत्रण) आदेश, 2026 [Transition Facilitation (Quality Control) Order, 2026] अधिसूचित किया, जो BIS योजना-I (Scheme-I) प्रमाणन प्राप्त न कर पाने वाली पात्र फ़र्मों को खिलौने, जूते-चप्पल और एयर कंडीशनर सहित निर्दिष्ट क्षेत्रों में BIS योजना-II (Scheme-II) लाइसेंसधारी आपूर्तिकर्ताओं से अस्थायी रूप से माल लेने की अनुमति देता है — पात्रता मानदंडों और DPIIT की एक समिति की मंज़ूरी के अधीन। QCO के दायरे वाले 600 से अधिक उत्पादों का पुनर्मूल्यांकन अभी बाक़ी है, जिनमें रसायन, इस्पात, वस्त्र, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा रबर और प्लास्टिक के महत्त्वपूर्ण इनपुट शामिल हैं। लेखक रसायनों का उपयोग करने वाली फ़र्मों पर CSEP के एक अध्ययन का हवाला देते हैं: पहला रसायन QCO 2018 में आया और 2024 तक 52 रासायनिक उत्पाद इसके दायरे में आ चुके थे, जिससे इनपुट के स्तर पर विनियमन के दायरे में आने वाली रसायन-उपयोगकर्ता फ़र्मों का हिस्सा 2019 के 11.8% से बढ़कर 2024 में 56.6% हो गया। बड़ी फ़र्मों में इनपुट QCO का संबंध उत्पादन में 9.6% वृद्धि, पर सकल मूल्य वर्धन (Gross Value Added — GVA) में 37% गिरावट से है; GVA उत्पादन के मूल्य में से इनपुट की लागत घटाने पर मिलने वाला मूल्य है। छोटी फ़र्मों में उत्पादन या GVA पर इनका कोई सांख्यिकीय रूप से महत्त्वपूर्ण प्रभाव नहीं दिखता, पर लाभप्रदता में 47.6% गिरावट से इनका संबंध है। लेखक चाहते हैं कि QCO के डिज़ाइन में आपूर्ति शृंखला पर पड़ने वाले प्रभावों को शामिल किया जाए, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) को समर्पित सहायता और संक्रमण अवधि मिले, और सफलता को दायरे में आए उत्पादों की संख्या से नहीं, बल्कि गुणवत्ता में हुए सुधार से आँका जाए। पाठ्यक्रम से जुड़ाव: GS3 (औद्योगिक नीति और MSME) तथा GS2 (WTO)।
कड़ी — एक पंक्ति में: सरकार घटिया आयात पर अंकुश लगाने और घरेलू गुणवत्ता बढ़ाने के लिए अनिवार्य BIS मानकों का सहारा लेती है → QCO का दायरा 2019 के 88 उत्पादों से बढ़कर दिसंबर 2024 तक 765 हो जाता है, जिनमें से कई मध्यवर्ती इनपुट पर हैं → आगे की कड़ी के उपयोगकर्ताओं को महँगे और दुर्लभ इनपुट झेलने पड़ते हैं, और व्यापारिक साझेदार आपत्ति जताते हैं → 2025 के अंत तक कई इनपुट QCO रद्द या निलंबित होते हैं, जुलाई 2026 की WTO समीक्षा में आलोचना सामने आती है, और 25 जून 2026 को संक्रमण आदेश आता है → इस प्रमाण के बीच कि इनपुट QCO मूल्य वर्धन और छोटी फ़र्मों का मुनाफ़ा घटाते हैं, 600 से अधिक उत्पाद पुनर्मूल्यांकन की प्रतीक्षा में हैं
स्थैतिक पाठ्यक्रम से जुड़ाव
- BIS अधिनियम, 2016 की धारा 16 हर QCO की क़ानूनी जड़ है. भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 2016 (Bureau of Indian Standards Act, 2016) ने 1986 के BIS अधिनियम का स्थान लिया और BIS को भारत का राष्ट्रीय मानक निकाय (National Standards Body) बनाया, जो उपभोक्ता मामले विभाग के अधीन कार्य करता है। धारा 16 केंद्र सरकार को यह शक्ति देती है कि वह ब्यूरो से परामर्श के बाद किसी भी वस्तु, सामग्री, प्रक्रिया, प्रणाली या सेवा पर मानक चिह्न (Standard Mark) का उपयोग अनिवार्य करने का निर्देश दे — लोकहित में, मानव, पशु या पादप स्वास्थ्य की रक्षा के लिए, पर्यावरण की सुरक्षा के लिए, अनुचित व्यापार व्यवहारों की रोकथाम के लिए, या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए। ऐसा आदेश जारी होने के बाद वैध BIS लाइसेंस या प्रमाणपत्र के बिना उस उत्पाद को बनाना, आयात करना, बेचना या भंडारित करना इस अधिनियम के तहत अपराध है। QCO वह मंत्रालय या विभाग जारी करता है जो संबंधित उत्पाद का प्रशासन देखता है — DPIIT, रसायन और पेट्रो-रसायन विभाग, इस्पात और वस्त्र मंत्रालय तथा अन्य — जबकि प्रमाणन का काम BIS करता है।
- अनुरूपता मूल्यांकन वह चरण है जहाँ मानक लागत में बदल जाता है. मानक एक तकनीकी विनिर्देश है; अनुरूपता मूल्यांकन (conformity assessment) यह साबित करने की प्रक्रिया है कि कोई उत्पाद उस मानक पर खरा उतरता है। BIS (अनुरूपता मूल्यांकन) विनियम, 2018 [BIS (Conformity Assessment) Regulations, 2018] कई प्रमाणन योजनाएँ निर्धारित करते हैं, जिनमें योजना-I जाना-पहचाना ISI चिह्न लाइसेंस है, जो उत्पाद-परीक्षण और कारख़ाने के निरीक्षण के बाद दिया जाता है — विदेशी निर्माताओं के मामले में विदेश स्थित कारख़ानों का भी। जून 2026 के आदेश पर PIB विज्ञप्ति के अनुसार, योजना-II इन्हीं विनियमों के तहत एक वैकल्पिक लाइसेंसिंग योजना है, जिसे यह आदेश निर्दिष्ट क्षेत्रों में अस्थायी विकल्प के रूप में स्वीकार करता है। किसी कारख़ाने को — ख़ासकर विदेशी आपूर्तिकर्ता के कारख़ाने को — प्रमाणित करने में लगने वाला समय और ख़र्च ही वह कारण है जिससे इनपुट की कमी पैदा होती है, जब कोई QCO प्रमाणन क्षमता के बढ़ने की रफ़्तार से ज़्यादा तेज़ी से थोप दिया जाता है।
- WTO का TBT समझौता अनिवार्य मानकों को स्वीकार करता है, पर उनके व्यापारिक प्रभाव पर निगरानी रखता है. व्यापार में तकनीकी बाधाओं पर समझौता (Agreement on Technical Barriers to Trade — TBT) स्वैच्छिक मानकों और अनिवार्य तकनीकी विनियमों (technical regulations) में भेद करता है; QCO इन्हीं अनिवार्य विनियमों का उदाहरण हैं। अनुच्छेद 2.1 आयातों के लिए राष्ट्रीय व्यवहार (national treatment) और सर्वाधिक अनुगृहीत राष्ट्र (most-favoured-nation) व्यवहार की अपेक्षा करता है, और अनुच्छेद 2.2 अपेक्षा करता है कि तकनीकी विनियम किसी वैध उद्देश्य — जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा, भ्रामक व्यवहारों की रोकथाम, या मानव स्वास्थ्य, सुरक्षा अथवा पर्यावरण की रक्षा — को पूरा करने के लिए आवश्यकता से अधिक व्यापार-प्रतिबंधात्मक न हों। सदस्यों को मसौदा विनियमों की सूचना WTO को देनी होती है और टिप्पणियों के लिए समय देना होता है, और 2001 के दोहा मंत्रिस्तरीय निर्णय के अनुसार प्रकाशन और लागू होने के बीच सामान्यतः कम से कम छह महीने का अंतर होना चाहिए। अन्य सदस्य TBT समिति में ‘विशिष्ट व्यापार चिंताएँ’ (specific trade concerns) उठाते हैं; किसी औपचारिक विवाद से पहले QCO पर सवाल उठाने का यही सामान्य रास्ता है।
- व्यापार नीति समीक्षा साथी देशों की परख है, मुक़दमा नहीं. WTO की स्थापना करने वाले मराकेश समझौते (Marrakesh Agreement) के अनुबंध 3 में निर्धारित व्यापार नीति समीक्षा तंत्र (Trade Policy Review Mechanism) हर सदस्य की व्यापार नीतियों को व्यापार नीति समीक्षा निकाय (Trade Policy Review Body) द्वारा आवधिक सामूहिक समीक्षा के अधीन रखता है; यह निकाय दरअसल सामान्य परिषद (General Council) ही है, जो एक दूसरी भूमिका में बैठक करती है। हर समीक्षा दो रिपोर्टों पर आधारित होती है — एक WTO सचिवालय की और एक समीक्षाधीन सरकार की। 2019 से चार सबसे बड़े व्यापारिक देशों की समीक्षा हर तीन वर्ष में, उनके बाद के सोलह की हर पाँच वर्ष में और शेष की हर सात वर्ष में होती है। यह तंत्र स्पष्ट रूप से दायित्वों को लागू कराने या विवाद निपटान का आधार नहीं है, इसलिए जुलाई 2026 में भारत की आठवीं समीक्षा में व्यक्त आलोचना कूटनीतिक दबाव है, कोई क़ानूनी निष्कर्ष नहीं।
UPSC इसे क्यों पूछता है
- GS3 औद्योगिक नीति और MSME पर पड़ते दबाव के बारे में पूछता है. पाठ्यक्रम में औद्योगिक नीति में परिवर्तन और औद्योगिक विकास पर उनके प्रभाव शामिल हैं, और मुख्य परीक्षा बार-बार यह पूछती है कि भारतीय विनिर्माण का विस्तार क्यों नहीं हो पाया और MSME छोटे ही क्यों रह जाते हैं। QCO नेक इरादे वाले ऐसे विनियमन का ठोस, प्रमाण-समर्थित उदाहरण हैं जिसने छोटी फ़र्मों की लागत बढ़ा दी — और परीक्षक ‘व्यापार सुगमता’ (ease of doing business) पर घिसी-पिटी पंक्तियों की तुलना में ऐसे उदाहरणों को अधिक अंक देते हैं।
- प्रारंभिक परीक्षा संस्थाओं और WTO समझौतों को परखती है. BIS, उसका मूल अधिनियम, उसका मंत्रालय और उसके चिह्न प्रारंभिक परीक्षा की मानक सामग्री हैं, और इसी तरह व्यापार में तकनीकी बाधाओं तथा स्वच्छता एवं पादप-स्वच्छता उपायों (sanitary and phytosanitary measures) पर WTO के समझौते भी। व्यापार नीति समीक्षा तंत्र और शुल्क तथा गैर-शुल्क बाधाओं का अंतर स्वाभाविक प्रश्न-आधार हैं।
- व्यापार वार्ता का कोण इसे EU और अमेरिका के साथ चल रही बातचीत से जोड़ता है. FTA वार्ताओं में साझेदार भारत के QCO को गैर-शुल्क बाधा के रूप में उठाते हैं, इसलिए भारत की व्यापार रणनीति पर मुख्य परीक्षा के उत्तर में QCO के युक्तिकरण को ऐसे घरेलू सुधार के रूप में उद्धृत किया जा सकता है जो दूसरों की बाधाओं पर आपत्ति करते समय भारत का पक्ष मज़बूत करता है।
प्रीलिम्स तथ्य
- भारतीय मानक ब्यूरो भारत का राष्ट्रीय मानक निकाय है, जो भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 2016 के तहत स्थापित है और उपभोक्ता मामले विभाग के अधीन कार्य करता है।
- BIS अधिनियम, 2016 की धारा 16 केंद्र सरकार को BIS से परामर्श के बाद स्वास्थ्य, सुरक्षा, पर्यावरण, अनुचित व्यापार व्यवहारों की रोकथाम और राष्ट्रीय सुरक्षा सहित विभिन्न आधारों पर वस्तुओं के लिए मानक चिह्न का उपयोग अनिवार्य करने का अधिकार देती है।
- गुणवत्ता नियंत्रण आदेश वह मंत्रालय या विभाग जारी करता है जो संबंधित उत्पाद का प्रशासन देखता है, जबकि इनके तहत प्रमाणन BIS करता है।
- WTO के व्यापार में तकनीकी बाधाओं पर समझौते का अनुच्छेद 2.2 अपेक्षा करता है कि तकनीकी विनियम किसी वैध उद्देश्य को पूरा करने के लिए आवश्यकता से अधिक व्यापार-प्रतिबंधात्मक न हों।
- WTO का व्यापार नीति समीक्षा तंत्र मराकेश समझौते के अनुबंध 3 में निर्धारित है, और समीक्षाएँ व्यापार नीति समीक्षा निकाय करता है, जो वस्तुतः सामान्य परिषद ही है।
- सकल मूल्य वर्धन उत्पादन के मूल्य में से मध्यवर्ती उपभोग का मूल्य घटाने पर प्राप्त होता है।
- संक्रमण सुविधा (गुणवत्ता नियंत्रण) आदेश, 2026 उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग ने 25 जून 2026 को अधिसूचित किया था।
विश्लेषण
- इनपुट QCO बिना किसी शुल्क के उलटे शुल्क ढाँचे की तरह काम करता है. उलटा शुल्क ढाँचा (inverted duty structure) घरेलू निर्माताओं को तब नुक़सान पहुँचाता है जब कच्चे माल पर उससे बनी तैयार वस्तुओं की तुलना में अधिक कर लगता है। इनपुट QCO यही असर प्रमाणन के ज़रिए पैदा करता है: BIS लाइसेंस से रहित विदेशी आपूर्तिकर्ता बाहर हो जाते हैं, गिने-चुने प्रमाणित आपूर्तिकर्ता अधिक क़ीमत वसूल सकते हैं, और तैयार वस्तु के सामने शायद ऐसी कोई बाधा होती ही नहीं। CSEP का यह निष्कर्ष कि बड़ी फ़र्मों ने उत्पादन 9.6% बढ़ाया जबकि उनका GVA 37% गिरा, इसी दबाव की पहचान है — उत्पादन ज़्यादा, पर उस पर मूल्य वर्धन कम। प्रतिपक्ष यह है कि अप्रमाणित रासायनिक इनपुट वास्तव में असुरक्षित या घटिया हो सकते हैं, और ऐसे मामलों में QCO आगे के ख़रीदारों और उपभोक्ताओं की रक्षा करता है; इसलिए तर्क लक्षित उपयोग का है, समाप्ति का नहीं।
- छोटी फ़र्मों वाला निष्कर्ष अधिक ख़तरनाक है, क्योंकि यह उत्पादन में नहीं, मुनाफ़े में छिपा रहता है. छोटी फ़र्मों के लिए इनपुट QCO का उत्पादन या GVA पर कोई महत्त्वपूर्ण प्रभाव नहीं दिखा, पर लाभप्रदता में 47.6% गिरावट से इनका संबंध पाया गया। दूसरे शब्दों में, छोटी फ़र्में ख़रीदारों को बनाए रखने के लिए उत्पादन जारी रखती हैं और लागत ख़ुद झेल लेती हैं; यह औद्योगिक उत्पादन के आँकड़ों में नहीं दिखता और बाद में दबावग्रस्त ऋणों, देर से मिलने वाली मज़दूरी या चुपचाप बंद होती इकाइयों के रूप में सामने आता है। वे बड़ी फ़र्मों की तरह लागत आगे नहीं खिसका सकतीं, क्योंकि वे भीड़ भरे बाज़ारों में बेचती हैं या ऐसे बड़े ख़रीदारों को, जो क़ीमतें ख़ुद तय करते हैं। अध्ययन केवल रसायन-उपयोगकर्ता फ़र्मों को समेटता है और सिद्ध कार्य-कारण संबंध के बजाय सहसंबंध बताता है, पर इसकी दिशा उसी से मेल खाती है जो उद्योग 2025 में आदेश रद्द होने से पहले बता रहा था।
- दायरे में आए उत्पादों की गिनती ग़लत लक्ष्य थी, और लेखक सही लक्ष्य सुझाते हैं. लगभग पाँच वर्षों में 88 से 765 उत्पादों तक की छलांग संकेत देती है कि QCO विशिष्ट गुणवत्ता-विफलताओं के जवाब के रूप में नहीं, बल्कि किसी कार्यक्रम के ‘आउटपुट’ की तरह तैयार किए जा रहे थे। लेखकों की कसौटी — क्या पैमाने, दक्षता और प्रतिस्पर्धात्मकता को बाधित किए बिना गुणवत्ता सुधरती है — के लिए हर आदेश से पहले और बाद के प्रमाण चाहिए: परीक्षण में विफलता की दरें, उत्पाद-वापसी (recalls), इनपुट क़ीमतें और आपूर्ति में लगने वाला समय (lead times)। भारत में विनियामक प्रभाव आकलन (regulatory impact assessment) की कोई वैधानिक अनिवार्यता नहीं है, इसीलिए 600 से अधिक उत्पादों का पुनर्मूल्यांकन बाद में किया जा रहा है। हर नए QCO में ऐसा आकलन और समीक्षा की एक अनिवार्य तिथि जोड़ देने से यह तदर्थ सुधार एक नियमित अनुशासन में बदल जाएगा।
- WTO की आलोचना क़ानून के रूप में कम, सौदेबाज़ी के दबाव के रूप में अधिक मायने रखती है. व्यापार नीति समीक्षा भारत को किसी दायित्व के उल्लंघन का दोषी नहीं ठहरा सकती, पर EU, अमेरिका और BRICS साझेदारों ब्राज़ील, चीन तथा इंडोनेशिया द्वारा जताई गई चिंताएँ दिखाती हैं कि विदेशों में QCO को अब गैर-शुल्क बाधा के रूप में देखा जा रहा है। इसकी क़ीमत भारत को वार्ताओं में चुकानी पड़ती है, क्योंकि जब अपनी ही प्रमाणन व्यवस्था को उसी तरह बताया जा रहा हो, तब EU के कार्बन सीमा उपाय या अमेरिकी शुल्कों को छद्म संरक्षणवाद कहना कठिन हो जाता है। प्रतिपक्ष उचित है: चीन की अनिवार्य प्रमाणन प्रणाली और कई अन्य मानक व्यवस्थाएँ भी व्यापार को सीमित करती हैं, और भारत को गुणवत्ता विनियमित करने का अधिकार है। अंतर प्रक्रिया में है — अधिसूचना, उचित संक्रमण अवधि और प्रमाणन क्षमता — और ठीक यहीं भारत के QCO आलोचना के घेरे में आए हैं।
- संक्रमण आदेश एक उपयोगी राहत-द्वार है, पर विवेकाधीन है. जब योजना-I प्रमाणन अटका हो, तब फ़र्मों को योजना-II आपूर्तिकर्ताओं से अस्थायी रूप से माल लेने देना खिलौनों, जूते-चप्पलों और एयर कंडीशनरों में वास्तविक अड़चनें दूर करता है। लेकिन यह सुविधा पात्रता मानदंडों और DPIIT की एक समिति की मंज़ूरी पर निर्भर है, और PIB विज्ञप्ति में बिना किसी चूक के लगातार तीन वर्षों तक QCO अनुपालन जैसी शर्तें गिनाई गई हैं, जो नए प्रवेशकों और सबसे छोटी इकाइयों की तुलना में स्थापित फ़र्मों के पक्ष में जाती हैं। विवेकाधीन राहत, चाहे कितनी भी सावधानी से दी जाए, पक्षपात की धारणा को भी न्योता देती है। नियम-आधारित विकल्प यह होगा: MSME के लिए स्वचालित संक्रमण अवधि, BIS के लिए प्रकाशित प्रमाणन समय-सीमाएँ, और इनपुट के लिए मान्यता प्राप्त विदेशी परीक्षण रिपोर्टों को स्वीकृति।
संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न
गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों का उद्देश्य उत्पाद मानकों को ऊँचा उठाना और घटिया आयात पर अंकुश लगाना था, फिर भी प्रमाण बताते हैं कि मध्यवर्ती इनपुट पर लगे आदेश उन्हीं निर्माताओं को नुक़सान पहुँचा सकते हैं जिनकी सहायता के लिए वे बनाए गए थे। इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए और QCO के चल रहे पुनर्मूल्यांकन के लिए सिद्धांत सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)
उत्तर की रूपरेखा
- भूमिका. QCO को BIS अधिनियम, 2016 की धारा 16 के तहत जारी ऐसे आदेश के रूप में परिभाषित कीजिए जो BIS प्रमाणन अनिवार्य बनाता है, और 2019 के 88 उत्पादों से दिसंबर 2024 तक 765 उत्पादों तक की वृद्धि बताइए, जिसके बाद 2025 में आदेश रद्द हुए और 25 जून 2026 को संक्रमण आदेश आया।
- मुख्य भाग — QCO के पक्ष में तर्क. उपभोक्ता सुरक्षा, घटिया और डंप किए गए आयात पर अंकुश, घरेलू विनिर्माण में गुणवत्ता की संस्कृति का निर्माण, और TBT समझौते द्वारा स्वास्थ्य, सुरक्षा व पर्यावरण जैसे वैध उद्देश्यों को दी गई मान्यता।
- मुख्य भाग — नुक़सान के प्रमाण. CSEP के निष्कर्षों का उपयोग कीजिए: रसायन-उपयोगकर्ता फ़र्मों का विनियमन के दायरे में आना 11.8% से बढ़कर 56.6%; बड़ी फ़र्मों में उत्पादन में 9.6% वृद्धि, पर GVA में 37% गिरावट; छोटी फ़र्मों की लाभप्रदता में 47.6% गिरावट। साथ में इनपुट की कमी, विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के प्रमाणन में देरी और जुलाई 2026 की WTO व्यापार नीति समीक्षा में हुई आलोचना जोड़िए।
- मुख्य भाग — पुनर्मूल्यांकन के सिद्धांत. 600 से अधिक उत्पादों में मध्यवर्ती इनपुट वाले उत्पादों को प्राथमिकता दीजिए; डिज़ाइन में ही आपूर्ति शृंखला पर प्रभाव का आकलन जोड़िए; MSME को छूट या लंबी संक्रमण अवधि दीजिए; प्रवर्तन से पहले प्रमाणन क्षमता विकसित कीजिए; जून 2026 के आदेश में सुधार करते हुए विवेकाधीन राहत के बजाय नियम-आधारित राहत को तरजीह दीजिए।
- निष्कर्ष. लेखकों की कसौटी पर उत्तर समाप्त कीजिए: मानकों को इस आधार पर परखा जाना चाहिए कि क्या वे पैमाने, दक्षता और प्रतिस्पर्धात्मकता को बाधित किए बिना गुणवत्ता सुधारते हैं — और विकसित भारत 2047 के लिए विनिर्माण को यही करके दिखाना होगा।
प्रशासक की दृष्टि
आप DPIIT की उस समिति के अध्यक्ष हैं जो संक्रमण आदेश के तहत आवेदनों को मंज़ूरी देती है। आप इसे निष्पक्ष और अनुचित लाभ की होड़ (rent-seeking) से मुक्त कैसे रखेंगे?
मैं पात्रता मानदंड, दस्तावेज़ों की जाँच-सूची और निर्णय की निश्चित समय-सीमा प्रकाशित करूँगा, और आवेदनों को प्राप्ति के क्रम में ऑनलाइन निपटाऊँगा। हर अस्वीकृति के साथ लिखित कारण और समीक्षा का रास्ता होगा। मैं आवेदनों, स्वीकृतियों और क्षेत्रों पर मासिक आँकड़े प्रकाशित करूँगा, ताकि पक्षपात का कोई भी ढर्रा दिखाई दे जाए। मैं यह सिफ़ारिश भी करूँगा कि सबसे आम स्वीकृतियों को MSME के लिए स्वचालित, समयबद्ध छूटों में बदल दिया जाए, जिससे विवेकाधिकार ही समाप्त हो जाए।
ज़िलाधिकारी के रूप में, आपके ज़िले की प्लास्टिक मोल्डिंग इकाइयाँ शिकायत करती हैं कि प्रमाणित कच्चा माल दुर्लभ और महँगा हो गया है। ज़िला स्तर पर आप क्या कर सकते हैं?
मानक नीति केंद्र के स्तर पर बनती है, पर ज़िला प्रमाण जुटा सकता है और स्थानीय अड़चनें कम कर सकता है। मैं ज़िला उद्योग केंद्र से कहूँगा कि वह इनपुट क़ीमतों, आपूर्ति में लगने वाले समय और प्रमाणित आपूर्तिकर्ताओं की उपलब्धता पर इकाइयों का सर्वेक्षण करे, और निष्कर्षों को पुनर्मूल्यांकन के लिए सुझाव के रूप में DPIIT और संबंधित प्रशासनिक मंत्रालय को भेजूँगा। मैं इकाइयों को BIS-मान्यता प्राप्त परीक्षण प्रयोगशालाओं से जोड़ूँगा और क्लस्टर संघ को प्रमाणित इनपुट के लिए सामूहिक ख़रीद समूह बनाने में मदद करूँगा। मैं अग्रणी बैंक से यह भी कहूँगा कि अस्थायी लागत-दबाव झेल रही इकाइयों के लिए कार्यशील पूँजी सहायता पर विचार करे, ताकि व्यवहार्य फ़र्में चूक (default) की ओर न धकेली जाएँ।
साक्षात्कार बोर्ड पूछता है: क्या ढीले ढंग से लागू कई मानकों की तुलना में कड़ाई से लागू कुछ मानक बेहतर हैं?
हाँ, अनिवार्य मानकों के मामले में। अनिवार्य मानक एक क़ानूनी निषेध है, और परीक्षण क्षमता या आपूर्तिकर्ताओं की तैयारी के बिना जारी हर ऐसा मानक कमी, नियमों से बचने की प्रवृत्ति और सीमा पर विवेकाधिकार को न्योता देता है। अधिकांश उत्पादों के लिए स्वैच्छिक मानक और उपभोक्ता सूचना पर्याप्त हो सकते हैं, जबकि अनिवार्य आदेश स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण के वास्तविक जोखिमों के लिए सुरक्षित रखे जाने चाहिए। कोई मानक व्यवस्था सम्मान तब अर्जित करती है जब वह पूर्वानुमेय हो और सचमुच लागू की जाए, न कि तब जब वह बड़ी हो।