UPSC Darpan

2. अर्थव्यवस्था (Economy)GS324 September 2026

दिल्ली के बस चालकों पर ESMA क्यों नहीं लगाया गया, उच्च न्यायालय ने पूछा; बैंक यूनियनों ने तीन दिन की हड़ताल का आह्वान किया

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ख़बर

नई दिल्ली। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, संविदा बस चालकों की हड़ताल के दूसरे सप्ताह में बुधवार, 23 सितंबर को दिल्ली परिवहन निगम (Delhi Transport Corporation — DTC) के वज़ीराबाद डिपो में कम से कम 37 चालकों को कारण बताओ नोटिस (show-cause notice) जारी किए गए; डिपो प्रबंधक के मुताबिक़ उन पर 16 से 22 सितंबर के बीच बसों के संचालन में बाधा डालने का आरोप है। कारण बताओ नोटिस में कर्मचारी से यह स्पष्ट करने को कहा जाता है कि उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों न की जाए; चालकों को 24 घंटे के भीतर जवाब देना है, अन्यथा उन्हें आंतरिक जाँच और एकपक्षीय (ex parte) निर्णय — यानी उनकी सुनवाई के बिना लिया गया फ़ैसला — झेलना होगा। आठ चालकों को काली सूची में डाल दिया गया है। हड़ताल 15 सितंबर को बेहतर वेतन, सवेतन अवकाश और सामाजिक सुरक्षा की माँग को लेकर शुरू हुई थी; ये चालक उन सात निजी कंपनियों के कर्मचारी हैं जो दिल्ली की क्लस्टर बसें चलाती हैं, और इन्हें ₹862 प्रतिदिन मिलते हैं — न सवेतन अवकाश, न सामाजिक सुरक्षा का कोई कवच। डीटीसी कर्मचारी एकता यूनियन ने 28 सितंबर को सभी संविदा कर्मचारियों की पूर्ण हड़ताल का आह्वान किया है; DTC ने उपस्थिति अनिवार्य कर दी है। कथित तोड़फोड़ को लेकर दर्ज FIR के बाद पुलिस ने सैकड़ों चालकों को हिरासत में लिया है, जबकि चालक इन आरोपों से इनकार करते हैं। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की दिल्ली उच्च न्यायालय की पीठ ने दिल्ली सरकार से जवाब माँगा है कि आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम (Essential Services Maintenance Act — ESMA), यानी वह क़ानून जो सरकार को अधिसूचित आवश्यक सेवाओं में हड़ताल पर रोक लगाने की शक्ति देता है, अब तक क्यों नहीं लागू किया गया; पीठ ने सरकार से यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि DTC की बसें चलती रहें। दिल्ली मेट्रो ने 16 से 22 सितंबर के बीच आठ से 10 अतिरिक्त ट्रेनें लगाईं और रोज़ 20 से 50 फेरे बढ़ाए। इसके अलावा, यूनाइटेड फ़ोरम ऑफ़ बैंक यूनियंस (United Forum of Bank Unions — UFBU), जो द हिंदू के अनुसार बैंकिंग कार्यबल के 90% का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है, ने मुख्यतः पाँच दिवसीय बैंकिंग सप्ताह की माँग को लेकर 28 से 30 सितंबर तक देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है; वित्त मंत्रालय ने कहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक रविवार, 27 सितंबर को सामान्य रूप से काम करेंगे, और RBI ने सभी शाखाओं, कार्यालयों और करेंसी चेस्ट को खुला रखने की मंज़ूरी दे दी है। EPFO की वेतन-सीमा ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 प्रति माह करने की ख़बर 18-19 सितंबर के अंकों में दी जा चुकी है; नया है ET में मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन और श्रुति सिंह द्वारा रखा गया तर्क। चूँकि लोग बाद में मिलने वाले बड़े लाभ की तुलना में जल्दी मिलने वाला छोटा लाभ पसंद करते हैं — जिसे ‘अतिपरवलयिक बट्टाकरण’ (hyperbolic discounting) कहते हैं — इसलिए जहाँ इच्छाशक्ति जवाब दे जाती है, वहाँ वेतन से सीधे कटने वाली बचत काम आती है। ₹22,000 कमाने वाले श्रमिक के लिए नियोक्ता का 12% अंशदान ₹2,640 प्रति माह, यानी ₹31,680 प्रति वर्ष बैठता है, और ऐसे 20 श्रमिकों के लिए ₹6,33,600; लेकिन लेखकों का तर्क है कि यह कवरेज श्रमिकों को आकर्षित करने और उन्हें टिकाए रखने में भी मदद करता है। पाठ्यक्रम से जुड़ाव: GS3 (रोज़गार) और GS2 (अधिकार)।

कड़ी — एक पंक्ति में: दिल्ली अपने बस बेड़े का एक हिस्सा निजी ऑपरेटरों के ज़रिए चलाती है, जो चालकों को संविदा पर रखते हैं → चालकों को ₹862 प्रतिदिन मिलते हैं, न सवेतन अवकाश, न सामाजिक सुरक्षा → 15 सितंबर से हड़ताल शुरू होती है; डिपो कारण बताओ नोटिस जारी करते हैं और चालकों को काली सूची में डालते हैं, पुलिस FIR दर्ज करती है → यात्री परेशान होते हैं और उच्च न्यायालय पूछता है कि ESMA क्यों नहीं लगाया गया → यह विवाद दिखाता है कि अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा, जिसका दायरा अब EPF की बढ़ी हुई सीमा से और चौड़ा हुआ है, हाशिये पर खड़े श्रमिकों के लिए सबसे अधिक मायने क्यों रखती है

स्थैतिक पाठ्यक्रम से जुड़ाव

  1. संविधान संघ बनाने के अधिकार की रक्षा करता है, हड़ताल के अधिकार की नहीं. अनुच्छेद 19(1)(c) संगम या संघ बनाने के अधिकार की गारंटी देता है, जो अनुच्छेद 19(4) के तहत युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन है। All India Bank Employees’ Association v. National Industrial Tribunal (1962) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस अधिकार के साथ हड़ताल करने या सामूहिक सौदेबाज़ी (collective bargaining) का कोई गारंटीशुदा अधिकार नहीं जुड़ा है। Kameshwar Prasad v. State of Bihar (1962) मामले में न्यायालय ने सरकारी सेवकों के प्रदर्शनों पर लगी रोक को तो रद्द कर दिया, पर हड़ताल पर लगी रोक को बरक़रार रखा। T.K. Rangarajan v. Government of Tamil Nadu (2003) मामला, जो तमिलनाडु के आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम, 2002 के तहत हड़ताली राज्य कर्मचारियों की बर्ख़ास्तगी से उपजा था, उसमें न्यायालय ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल का न कोई मूल अधिकार है, न वैधानिक और न ही साम्यिक (equitable) अधिकार।
  2. ESMA अधिसूचित सेवा में हड़ताल को अपराध बना देता है. संसद ने 1968 और 1981 में आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम बनाए; कई राज्यों के अपने ऐसे क़ानून हैं, जैसे तमिलनाडु (2002), कर्नाटक (2013) और महाराष्ट्र (2023); और आवश्यक रक्षा सेवा अधिनियम, 2021 (Essential Defence Services Act, 2021) रक्षा उत्पादन इकाइयों पर लागू होता है। इन सबकी साझा रूपरेखा यह है कि सरकार किसी सेवा को आवश्यक घोषित करती है — आम तौर पर परिवहन, बिजली, जल, स्वास्थ्य, डाक या संचार — और एक निर्दिष्ट अवधि के लिए उसमें हड़ताल पर रोक का आदेश जारी करती है। ऐसे आदेश के बाद की गई हड़ताल अवैध होती है, और उसमें भाग लेने वाले, उसे भड़काने वाले या उसके लिए धन देने वाले गिरफ़्तारी, अभियोजन और अनुशासनात्मक कार्रवाई के भागी होते हैं। चूँकि यह श्रमिकों से मोलभाव का उनका मुख्य हथियार छीन लेता है, इसलिए ESMA आदेश सामान्यतः समयबद्ध होता है और स्वयं भी न्यायिक पुनर्विलोकन (judicial review) के अधीन रहता है।
  3. औद्योगिक संबंध संहिता हड़ताल-नोटिस के नियमों को हर औद्योगिक प्रतिष्ठान तक फैलाती है. PIB की एक विज्ञप्ति के अनुसार चारों श्रम संहिताएँ — मज़दूरी पर (2019), तथा औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशाओं पर (तीनों 2020) — 21 नवंबर, 2025 से प्रभावी की गईं और इनमें 29 केंद्रीय श्रम क़ानूनों का समेकन हुआ। औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (Industrial Relations Code, 2020) के तहत कोई भी श्रमिक — हड़ताल से पहले 60 दिनों के भीतर नोटिस दिए बिना, नोटिस देने के 14 दिनों के भीतर, सुलह कार्यवाही (conciliation proceedings) के दौरान और उसके सात दिन बाद तक, या किसी अधिकरण के समक्ष कार्यवाही के दौरान और उसके 60 दिन बाद तक — हड़ताल नहीं कर सकता। संहिता ने जिस औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (Industrial Disputes Act, 1947) का स्थान लिया है, उसके तहत ऐसे नोटिस-नियम केवल लोक उपयोगी सेवाओं (public utility services) पर लागू होते थे; संहिता उन्हें सभी औद्योगिक प्रतिष्ठानों पर लागू करती है। यह किसी दिन 50% या उससे अधिक श्रमिकों द्वारा मिलकर लिए गए आकस्मिक अवकाश को भी हड़ताल मानती है।
  4. ठेका श्रमिक और EPF कवरेज अब श्रम संहिताओं के भीतर आ गए हैं. ठेका श्रम (विनियमन और उत्सादन) अधिनियम, 1970 [Contract Labour (Regulation and Abolition) Act, 1970] अब व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशा संहिता, 2020 (Occupational Safety, Health and Working Conditions Code, 2020) में समाहित हो चुका है, और PIB की एक विज्ञप्ति के अनुसार प्रधान नियोक्ता (principal employer) ठेका श्रमिकों को स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा लाभ देंगे। Steel Authority of India v. National Union Water Front Workers (2001) मामले में एक संविधान पीठ ने कहा कि ठेका श्रम के उत्सादन से ठेका श्रमिक अपने-आप प्रधान नियोक्ता के नियमित कर्मचारी नहीं बन जाते। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (Code on Social Security, 2020) नौ क़ानूनों को समाहित करती है, जिनमें कर्मचारी भविष्य निधि और प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (Employees’ Provident Funds and Miscellaneous Provisions Act, 1952) भी शामिल है, जिसके तहत कर्मचारी भविष्य निधि (EPF), कर्मचारी पेंशन योजना, 1995 और कर्मचारी निक्षेप सहबद्ध बीमा योजना, 1976 (Employees’ Deposit Linked Insurance Scheme, 1976) चलती हैं। नियोक्ता के 12% अंशदान में से, सीमा तक के वेतन का 8.33% पेंशन योजना में जाता है और शेष श्रमिक के भविष्य निधि खाते में।

UPSC इसे क्यों पूछता है

  1. हड़ताल के अधिकार पर GS2 और GS3 आपस में मिलते हैं. पाठ्यक्रम में मूल अधिकार GS2 में और रोज़गार व श्रम सुधार GS3 में आते हैं। श्रम संहिताओं पर मुख्य परीक्षा के प्रश्न प्रायः यह पूछते हैं कि क्या वे नियोक्ताओं के लिए लचीलेपन और श्रमिकों के संरक्षण के बीच संतुलन साधती हैं; दिल्ली की हड़ताल, बैंक हड़ताल का आह्वान और EPF सीमा — ये तीनों मिलकर उस संतुलन का तीन हिस्सों वाला उदाहरण बनाते हैं।
  2. आवश्यक सेवाएँ GS4 केस स्टडी का स्थायी विषय हैं. नीतिशास्त्र की केस स्टडी अक्सर अभ्यर्थी को हड़ताली श्रमिकों और उन पर निर्भर जनता के बीच खड़ा कर देती हैं। दिल्ली का विवाद — ₹862 प्रतिदिन, काली सूची, FIR और ESMA पर सवाल पूछता उच्च न्यायालय — इसका आदर्श ढाँचा है: श्रमिकों के प्रति न्याय, सेवा की निरंतरता और दमनकारी शक्ति के प्रयोग में संयम।
  3. व्यवहारवादी अर्थशास्त्र अब आधिकारिक शब्दावली का हिस्सा है. आर्थिक समीक्षा 2018-19 ने व्यवहारवादी अर्थशास्त्र (behavioural economics) और ‘नज’ (nudge) पर पूरा एक अध्याय दिया था, और मुख्य आर्थिक सलाहकार का लेख उसी तर्क को अनिवार्य बचत तक ले जाता है। अतिपरवलयिक बट्टाकरण, डिफ़ॉल्ट विकल्प (default options) और वर्तमान पूर्वाग्रह (present bias) जैसे शब्द अब GS3 के उत्तरों और निबंध प्रश्नपत्र में बेझिझक इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

प्रीलिम्स तथ्य

  • All India Bank Employees’ Association v. National Industrial Tribunal (1962) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत संघ बनाने के अधिकार में हड़ताल का कोई गारंटीशुदा अधिकार शामिल नहीं है।
  • T.K. Rangarajan v. Government of Tamil Nadu (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल का कोई मूल या वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है।
  • औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत किसी भी औद्योगिक प्रतिष्ठान का श्रमिक हड़ताल से पहले 60 दिनों के भीतर नोटिस दिए बिना, या ऐसा नोटिस देने के 14 दिनों के भीतर, हड़ताल नहीं कर सकता।
  • औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 किसी दिन 50% या उससे अधिक श्रमिकों द्वारा मिलकर लिए गए आकस्मिक अवकाश को हड़ताल मानती है।
  • चारों श्रम संहिताएँ 21 नवंबर, 2025 को लागू हुईं और इनमें 29 केंद्रीय श्रम क़ानूनों का समेकन किया गया।
  • ठेका श्रम (विनियमन और उत्सादन) अधिनियम, 1970 को व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशा संहिता, 2020 में समाहित कर दिया गया है।
  • व्यवहारवादी अर्थशास्त्र की अवधारणा ‘अतिपरवलयिक बट्टाकरण’ भविष्य के बड़े लाभ की तुलना में तात्कालिक छोटे लाभ को तरजीह देने की प्रवृत्ति को दर्शाती है, जो स्वैच्छिक बचत को कमज़ोर करती है।

विश्लेषण

  1. दिल्ली का विवाद केवल क़ानून-व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि राज्य की ही खड़ी की हुई ठेकेदारी की समस्या है. बसें सार्वजनिक हैं, सेवा आवश्यक है और मार्ग सरकार तय करती है, फिर भी चालक सात निजी कंपनियों के कर्मचारी हैं, जिन्हें बिना सवेतन अवकाश और सामाजिक सुरक्षा के ₹862 प्रतिदिन मिलते हैं। महीने में 26 कार्य-दिवस मानें तो यह लगभग ₹22,400 प्रति माह बैठता है — लगभग ठीक उतना, जितना मुख्य आर्थिक सलाहकार के उदाहरण वाले उस श्रमिक का वेतन है जिसे बढ़ी हुई सीमा ने अब अनिवार्य EPF के दायरे में ला दिया है। राज्य ने रोज़गार तो बाहर सौंप दिया है, पर ज़िम्मेदारी नहीं: श्रम संहिताओं के तहत प्रधान नियोक्ता के रूप में उसे देखना है कि ठेकेदार स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा लाभ दें। ESMA लागू करने से बसें तो लौट आएँगी, पर समस्या की जड़ जस की तस रहेगी। प्रतिपक्ष यह है कि यात्रियों — दिहाड़ी मज़दूरों, घरेलू कामगारों और विद्यार्थियों — को वेतन-विवाद की क़ीमत नहीं चुकानी चाहिए, और शिकायत चाहे जो हो, तोड़फोड़ अपराध ही है।
  2. ESMA एक भोथरा औज़ार है, और उसका प्रयोग यह संकेत देगा कि मोलभाव विफल हो चुका है. उच्च न्यायालय ने पूछा है कि ESMA क्यों नहीं लगाया गया; उसने इसे लगाने का आदेश नहीं दिया। निजी ऑपरेटरों के ठेका श्रमिकों को काम पर बाध्य करने के लिए सरकार को पहले उनके काम को आवश्यक घोषित करना होगा, और इससे उनका यह दावा ही मज़बूत होगा कि आवश्यक काम के बदले सम्मानजनक शर्तें मिलनी चाहिए। People’s Union for Democratic Rights v. Union of India (1982) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि न्यूनतम मज़दूरी से कम भुगतान पर कराया गया श्रम अनुच्छेद 23 के तहत बलात् श्रम (forced labour) है; इसलिए जो सरकार काम करने को बाध्य करे, उसे यह भी पक्का करना होगा कि भुगतान वैध हो। बेहतर क्रम यह है: पहले औद्योगिक संबंध संहिता के तहत सुलह, फिर अवकाश और सामाजिक सुरक्षा में पंजीकरण पर ऑपरेटरों के साथ अंतरिम समझौता, और ESMA केवल तब, जब हिंसा जारी रहे या सेवा पूरी तरह ठप बनी रहे।
  3. बैंक हड़ताल दिखाती है कि टकराव की जगह अब असर घटाने के उपाय ले रहे हैं. UFBU के आह्वान पर सरकार का जवाब ESMA नहीं, बल्कि एक अतिरिक्त कार्य-दिवस वाला रविवार था, जिसमें RBI ने शाखाओं, ATM से जुड़ी शाखाओं और करेंसी चेस्ट को खुला रखने की मंज़ूरी दी। डिजिटल भुगतानों ने भी बैंक हड़ताल की धार कुंद कर दी है, क्योंकि UPI, कार्ड और नेट बैंकिंग चलते रहते हैं; सबसे अधिक नुक़सान उनका होता है जो शाखाओं पर निर्भर हैं, जैसे पेंशनभोगी और नक़दी में लेन-देन करने वाले छोटे व्यापारी। यूनियन की केंद्रीय माँग, पाँच दिवसीय बैंकिंग सप्ताह, कार्य-दशाओं से जुड़ी है और ऐसा विषय है जिसे यूनियनों और भारतीय बैंक संघ (Indian Banks’ Association — IBA) के बीच उद्योग-स्तरीय वार्ता में ही सुलझाया जाना सबसे उचित है। प्रतिपक्ष यह है कि शाखा-सेवाओं के बिना तीन दिन भी सबसे अधिक ग्रामीण ग्राहकों को चोट पहुँचाते हैं, इसलिए असर घटाने के उपायों में पेंशन और लाभ-राशि की निकासी को प्राथमिकता भी शामिल होनी चाहिए।
  4. मुख्य आर्थिक सलाहकार का तर्क श्रमिकों के बारे में सही, पर नियोक्ताओं के बारे में अधूरा है. अतिपरवलयिक बट्टाकरण बताता है कि स्वैच्छिक बचत क्यों विफल होती है, और वेतन से सीधी कटौती इसका आज़माया हुआ इलाज है: जो पैसा श्रमिक के हाथ पहुँचने से पहले ही अलग रख दिया जाए, वह ख़र्च नहीं होता। नियोक्ता पर पड़ने वाला हिसाब भी वास्तविक है — ₹22,000 वाले श्रमिक के लिए ₹2,640 प्रति माह, और ऐसे 20 श्रमिकों के लिए ₹6,33,600 प्रति वर्ष — और कम मार्जिन पर चलने वाली छोटी फ़र्म के लिए यही तय कर सकता है कि कोई नौकरी औपचारिक रूप से पैदा होगी भी या नहीं। मुख्य आर्थिक सलाहकार का जवाब — कि कवरेज गुणवत्ता का संकेत देता है और श्रमिकों को टिकाए रखता है — प्रतिस्पर्धी श्रम बाज़ारों के कुशल श्रमिकों पर तो खरा उतरता है, पर कम वेतन वाले उस काम पर उतना नहीं, जहाँ मोलभाव की ताक़त नियोक्ता के हाथ में होती है। फ़र्में वेतन को भत्तों में खिसकाने की कोशिश भी कर सकती हैं; श्रम संहिताओं में मज़दूरी की एकसमान परिभाषा, जो कुल पारिश्रमिक के आधे से अधिक भत्तों को वापस मज़दूरी में जोड़ देती है, बच निकलने के इस रास्ते को सीमित करती है।
  5. ऊँची सीमा से केवल उन्हीं श्रमिकों को लाभ है जो वास्तव में किसी वेतन-पत्रक (payroll) पर दर्ज हैं. अनिवार्य कवरेज के दायरे में नए आए 51 लाख श्रमिक उन प्रतिष्ठानों के कर्मचारी हैं जो पहले से EPFO के दायरे में हैं और जिनका वेतन पुरानी सीमा से ऊपर है। दिल्ली के चालक इससे कठिन मोर्चा दिखाते हैं: निजी ऑपरेटरों के ऐसे ठेका श्रमिक, जिनके पास सामाजिक सुरक्षा का कोई कवच ही नहीं है। उनके लिए असली अड़चन सीमा नहीं, बल्कि ठेकेदारों पर क़ानून का प्रवर्तन है; भविष्य निधि क़ानून इसका समाधान यह करता है कि ठेका श्रमिकों के अंशदान के लिए प्रधान नियोक्ता को उत्तरदायी ठहराता है और उसे यह राशि ठेकेदार से वसूलने की छूट देता है। मुख्य आर्थिक सलाहकार जिस ‘ट्रैम्पोलिन’ की बात करते हैं, उसमें ऊपर के साथ-साथ नीचे भी स्प्रिंग चाहिए, इसलिए सीमा में अगली बढ़ोतरी से पहले सार्वजनिक धन से चलने वाली सेवाओं में ठेकेदारों का ऑडिट होना चाहिए।

संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

भारत में हड़ताल का अधिकार मूल अधिकार नहीं है, फिर भी आवश्यक सेवाओं के श्रमिकों के लिए हड़ताल ही मोलभाव का प्रमुख साधन बनी हुई है। हड़तालों को नियंत्रित करने वाले क़ानूनी ढाँचे का परीक्षण कीजिए तथा चर्चा कीजिए कि राज्य को श्रमिकों के दावों और आवश्यक सेवाओं तक नागरिकों की पहुँच के बीच संतुलन कैसे साधना चाहिए। (15 अंक, 250 शब्द)

उत्तर की रूपरेखा

  1. भूमिका. 15 सितंबर से चल रही दिल्ली के बस चालकों की हड़ताल से शुरुआत कीजिए — ₹862 प्रतिदिन, सवेतन अवकाश का अभाव, कारण बताओ नोटिस और ESMA पर उच्च न्यायालय का प्रश्न — और साथ ही 28 से 30 सितंबर तक बैंक हड़ताल के UFBU के आह्वान का उल्लेख कीजिए।
  2. मुख्य भाग — क़ानून. अनुच्छेद 19(1)(c) और 1962 व 2003 के निर्णय; केंद्र और राज्यों के ESMA; औद्योगिक संबंध संहिता के सभी प्रतिष्ठानों पर लागू नोटिस-नियम और 50% सामूहिक आकस्मिक अवकाश वाला नियम; 21 नवंबर, 2025 से लागू श्रम संहिताएँ।
  3. मुख्य भाग — हड़तालें फिर भी क्यों होती हैं. सार्वजनिक सेवाओं का संविदाकरण, सामाजिक सुरक्षा का अभाव और मोलभाव के कमज़ोर मंच; संविदा चालकों और अनिवार्य EPF के पक्ष में मुख्य आर्थिक सलाहकार के तर्क के सहारे दिखाइए कि कवरेज की कमियाँ किस तरह विवादों को जन्म देती हैं।
  4. मुख्य भाग — संतुलन. पहले सुलह, अंतिम उपाय के रूप में ही समयबद्ध ESMA आदेश, ठेका श्रमिकों के प्रति प्रधान नियोक्ता की ज़िम्मेदारी, रविवार को बैंक खोलने जैसे असर घटाने वाले उपाय, और यात्रियों के लिए अतिरिक्त मेट्रो सेवाओं जैसे विकल्प।
  5. निष्कर्ष. निष्कर्ष दीजिए कि आवश्यक सेवाओं को निरंतरता और सम्मानजनक शर्तें — दोनों चाहिए, और प्रधान नियोक्ता के रूप में राज्य को केवल लक्षण पर रोक लगाने के बजाय कारण को दूर करना चाहिए।

प्रशासक की दृष्टि

आप दिल्ली के परिवहन सचिव हैं। उच्च न्यायालय ने पूछा है कि ESMA क्यों नहीं लगाया गया। आप सरकार को क्या सलाह देंगे?

मेरी सलाह होगी कि ESMA को तैयार रखा जाए, पर पहले क़दम के रूप में उसका प्रयोग न किया जाए। तात्कालिक क़दम ये हैं: सुलह तंत्र के माध्यम से सरकार, सातों ऑपरेटरों और यूनियन की त्रिपक्षीय बैठक; सवेतन अवकाश और सामाजिक सुरक्षा में पंजीकरण पर अंतरिम समझौता; और पुलिस के ज़रिए तोड़फोड़ के विरुद्ध सख़्त रुख़। मैं न्यायालय को आकस्मिक उपायों की जानकारी दूँगा — मेट्रो के अतिरिक्त फेरे, DTC के अपने कर्मचारी और वार्ता की समय-सारिणी। यदि सेवाएँ पूरी तरह ठप हो जाएँ या हिंसा जारी रहे, तो केवल बस संचालन तक सीमित एक समयबद्ध आदेश उचित ठहराया जा सकेगा, क्योंकि तब तक नरम विकल्प आज़माए जा चुके होंगे।

श्रम आयुक्त के रूप में आप कैसे सुनिश्चित करेंगे कि ठेकेदारों के चालकों को वह सामाजिक सुरक्षा मिले जो क़ानून अनिवार्य करता है?

मैं सातों ऑपरेटरों के अभिलेखों की जाँच करूँगा — भविष्य निधि और कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) पंजीकरण, वेतन भुगतान और अवकाश — और EPFO व ESIC के अंशदान आँकड़ों का मिलान बसों पर वास्तव में तैनात चालकों की संख्या से करूँगा। जहाँ ठेकेदार चूक करें, वहाँ मैं प्रधान नियोक्ता के दायित्व का प्रयोग करूँगा, ताकि परिवहन प्राधिकरण भुगतान करे और ठेकेदार से वसूली करे। मैं हर ऑपरेटर की अनुपालन स्थिति अलग-अलग सार्वजनिक करूँगा। भविष्य के अनुबंधों में सामाजिक सुरक्षा अनुपालन को हर मासिक भुगतान की शर्त बनाया जाना चाहिए।

साक्षात्कार बोर्ड पूछता है: मुख्य आर्थिक सलाहकार कहते हैं कि अनिवार्यता अतिपरवलयिक बट्टाकरण का उपचार करती है। क्या यह पितृवाद (paternalism) नहीं है?

यह पितृवाद ही है, पर सीमित और न्यायोचित किस्म का। राज्य यह तय नहीं करता कि श्रमिक कैसे जिए; वह केवल यह सुनिश्चित करता है कि वेतन का एक छोटा हिस्सा बुढ़ापे, आपात स्थितियों और मृत्यु-बीमा के लिए बचाया जाए — ऐसी ज़रूरतें जिनके लिए लोग स्वयं व्यवस्थित रूप से कम प्रावधान करते हैं। विफलता की क़ीमत अंततः राज्य को ही चुकानी पड़ती है, वृद्धावस्था की ग़रीबी के रूप में। रूपरेखा ऐसी होनी चाहिए जो जहाँ तक संभव हो, स्वायत्तता का सम्मान करे — सार्वभौमिक खाता संख्या (Universal Account Number — UAN) के ज़रिए पोर्टेबिलिटी, आपात स्थिति में आसान आंशिक निकासी और पारदर्शी प्रतिफल के माध्यम से।