UPSC Darpan

8. समाज (Society)GS124 September 2026

आस्था कुंज सामूहिक बलात्कार के बाद उपराज्यपाल ने पार्कों के सुरक्षा ऑडिट का आदेश दिया; ‘DURGA’ योजना में ई-ऑटो महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए आरक्षित

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ख़बर

नई दिल्ली। उपराज्यपाल (Lieutenant-Governor, L-G) तरनजीत सिंह संधू ने बुधवार, 23 सितंबर को दिल्ली नगर निगम (MCD) और दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को राजधानी भर के सार्वजनिक पार्कों का सुरक्षा ऑडिट करने का निर्देश दिया। यह निर्देश उस घटना के बाद आया जिसमें सोमवार को दक्षिण-पूर्वी दिल्ली में कालकाजी मंदिर के पास आस्था कुंज पार्क में पुलिसकर्मी बनकर आए तीन पुरुषों ने एक 17 वर्षीय लड़की से कथित रूप से सामूहिक बलात्कार किया। तीनों को मंगलवार को गिरफ़्तार किया गया और बुधवार को दो दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया; इनमें से एक के पैर में गोली लगी, जिसे पुलिस दोनों ओर से हुई गोलीबारी बताती है। यह आदेश MCD आयुक्त, पुलिस आयुक्त और DDA उपाध्यक्ष के साथ हुई समीक्षा बैठक के बाद जारी हुआ। उपराज्यपाल के कार्यालय लोक निवास की विज्ञप्ति के अनुसार ऑडिट में प्रकाश व्यवस्था, सभी प्रवेश और निकास द्वारों पर गार्डों की तैनाती, पार्कों के भीतर गश्त — विशेषकर सूर्यास्त के बाद — और साफ़-सफ़ाई की जाँच होगी, और इस पर भी विचार होगा कि कुछ पार्कों का रखरखाव निवासी कल्याण संघों (Residents’ Welfare Associations – RWA) या निजी संस्थाओं को सौंप दिया जाए। DDA “डार्क स्पॉट” — यानी बिना रोशनी और बिना निगरानी वाले हिस्सों — की पहचान करेगा, वहाँ रोशनी और CCTV लगाएगा, कई द्वारों वाले पार्कों में देर शाम का प्रवेश कुछ चुनिंदा द्वारों तक सीमित कर सकता है, और पुलिस के साथ तालमेल रखेगा; इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार DDA और MCD को एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट देनी है। पुलिस का कहना है कि सेंट्रल रेंज में चलाए गए अभियानों में दिल्ली पुलिस अधिनियम (Delhi Police Act) की धारा 65 के तहत 379 लोगों को पकड़ा गया। सूत्रों के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस बताता है कि एक आरोपी पहले पुलिस का मुखबिर रह चुका था और एक बार छेड़छाड़ में पकड़ा भी गया था, पर कोई शिकायत दर्ज न होने के कारण छोड़ दिया गया। घटनास्थल के पास स्थित लेडी श्रीराम कॉलेज फ़ॉर विमेन (LSR) की छात्राओं ने बुधवार शाम मार्च निकाला; द हिंदू इसे LSR की सैकड़ों छात्राओं का केवल महिलाओं वाला मार्च बताता है, जबकि इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कॉलेजों के लगभग 200 विद्यार्थी शामिल थे। एक छात्रा ने कहा, “हमें बलात्कार की संस्कृति, नैतिक पुलिसिंग और पितृसत्ता से आज़ादी चाहिए।” एक ऑनलाइन बैठक में LSR की छात्राओं ने PCR वैन के न होने, पुलिस के बंद पड़े पिंक बूथ और अँधेरी सड़कों का मुद्दा उठाया था। उसी दिन दिल्ली मंत्रिमंडल ने ‘DURGA’ योजना को मंज़ूरी दी: पहले चरण में 1,300 गुलाबी इलेक्ट्रिक ऑटो, जिनमें 1,170 महिलाओं और 130 ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए होंगे, और हर राजस्व ज़िले में इनकी अधिकतम संख्या क्रमशः 90 और 10 होगी। यह योजना 20 से 40 वर्ष आयु के उन दिल्ली निवासियों के लिए है जिनके पास मतदाता पहचान पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस और सार्वजनिक सेवा वाहन (Public Service Vehicle – PSV) बैज हो; तीन से अधिक बच्चों वाली महिलाएँ इसके लिए पात्र नहीं हैं। पाठ्यक्रम से जुड़ाव: GS1 में महिलाएँ और नगरीकरण, तथा GS2 में कमज़ोर वर्गों के लिए योजनाएँ।

कड़ी — एक पंक्ति में: दिल्ली के पार्कों का रखरखाव DDA और MCD करते हैं, पर उनमें गश्त वह पुलिस बल करता है जो केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रति उत्तरदायी है → अँधेरे, कम पहरे वाले हिस्से और इलाके में जाना-पहचाना एक अपराधी, जिस पर कभी औपचारिक मामला दर्ज नहीं हुआ → पुलिसकर्मी बनकर आए पुरुष आस्था कुंज पार्क में एक किशोरी से सामूहिक बलात्कार करते हैं → LSR की छात्राएँ मार्च निकालती हैं और बंद पड़ा पिंक बूथ, नदारद PCR वैन और बिना रोशनी की सड़कें गिनाती हैं → उपराज्यपाल एक सप्ताह में रिपोर्ट के साथ पार्कों के सुरक्षा ऑडिट का आदेश देते हैं, और दिल्ली मंत्रिमंडल महिला और ट्रांसजेंडर चालकों के लिए आरक्षित DURGA ई-ऑटो को मंज़ूरी देता है

स्थैतिक पाठ्यक्रम से जुड़ाव

  1. कानून बलात्कार पीड़िता की पहचान उजागर करने से रोकता है, और नाबालिग को दोहरी सुरक्षा देता है. भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS) की धारा 72, जिसने भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) की धारा 228A का स्थान लिया है, बलात्कार और उससे जुड़े अपराधों की पीड़िता का नाम, या ऐसी कोई भी बात जिससे उसकी पहचान उजागर हो सकती हो, छापने या प्रकाशित करने पर दो वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान करती है। यदि पीड़िता 18 वर्ष से कम आयु की हो, तो लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 23 भी मीडिया को बच्चे का नाम, पता, फ़ोटो, पारिवारिक विवरण, स्कूल या पड़ोस उजागर करने से रोकती है। Nipun Saxena v. Union of India (2018) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पहचान परोक्ष रूप से, दूर के संकेत के ज़रिए भी, उजागर नहीं की जानी चाहिए। BNS की धारा 70(2) 18 वर्ष से कम आयु की महिला से सामूहिक बलात्कार के लिए व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल तक के कारावास या मृत्युदंड का प्रावधान करती है।
  2. निर्भया कोष और सुरक्षित शहर परियोजनाएँ सार्वजनिक स्थानों पर महिला सुरक्षा के लिए केंद्र का धन हैं. दिल्ली में 16 दिसंबर, 2012 के सामूहिक बलात्कार के बाद केंद्रीय बजट 2013-14 में ₹1,000 करोड़ के साथ निर्भया कोष (Nirbhaya Fund) की घोषणा की गई; उसके बाद आई न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति (Justice J.S. Verma Committee) की रिपोर्ट ने दंड विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013 (Criminal Law (Amendment) Act) को आकार दिया। यह कोष व्यपगत नहीं होता (non-lapsable) और इसका प्रशासन आर्थिक कार्य विभाग करता है, जबकि महिला एवं बाल विकास मंत्रालय वह नोडल मंत्रालय है जो परियोजनाओं का मूल्यांकन करता है। इसी कोष से केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 2018 में आठ शहरों — अहमदाबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता, लखनऊ और मुंबई — के लिए सुरक्षित शहर परियोजनाएँ (Safe City Projects) स्वीकृत कीं, जिनमें प्रकाश व्यवस्था, CCTV, महिला हेल्प डेस्क और कमांड सेंटर शामिल हैं। पीड़िताओं के लिए बने वन स्टॉप सेंटर (One Stop Centres) भी इसी कोष से धन पाते हैं।
  3. सुरक्षा ऑडिट और CPTED सार्वजनिक स्थानों की हिंसा को आंशिक रूप से डिज़ाइन की विफलता मानते हैं. महिला सुरक्षा ऑडिट (women’s safety audit) की पद्धति 1989 में टोरंटो में मेट्रोपॉलिटन एक्शन कमेटी ऑन वायलेंस अगेंस्ट विमेन एंड चिल्ड्रन (METRAC) ने विकसित की थी: महिलाएँ किसी स्थान में पैदल घूमकर रोशनी, दृश्यता (sightlines), सुनसानपन और मदद तक पहुँच को दर्ज करती हैं। दिल्ली में महिला संसाधन केंद्र जागोरी (Jagori) ने इस पद्धति को अपनाया, और 2010 में दिल्ली UN Women की सुरक्षित शहर वैश्विक पहल (Safe Cities Global Initiative) में शामिल होने वाले पहले शहरों में था; क्विटो, काहिरा, पोर्ट मोरेस्बी और किगाली भी इनमें थे। पर्यावरणीय डिज़ाइन के माध्यम से अपराध निवारण (Crime Prevention Through Environmental Design – CPTED) चार आधारों पर टिका है — स्वाभाविक निगरानी, प्रवेश नियंत्रण, क्षेत्र पर स्वामित्व-बोध का सुदृढ़ीकरण और रखरखाव — और यह जेन जैकब्स की “सड़क पर निगाहें” (eyes on the street, 1961) की अवधारणा को आगे बढ़ाता है। Why Loiter? (2011) में शिल्पा फड़के, समीरा ख़ान और शिल्पा राणाडे तर्क देती हैं कि महिलाएँ तब अधिक सुरक्षित होती हैं जब वे किसी भी कारण से सार्वजनिक स्थान पर मौजूद रह सकें, न कि केवल किसी ‘उद्देश्यपूर्ण’ कारण से। बारहवीं अनुसूची (अनुच्छेद 243W) के तहत पार्क, उद्यान और खेल के मैदान, तथा सड़कों की रोशनी नगरपालिकाओं के कार्य हैं।
  4. ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम, 2019 सरकारों को ऐसी योजनाएँ बनाने के लिए बाध्य करता है जिनमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति शामिल हों. उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 (Transgender Persons (Protection of Rights) Act) ट्रांसजेंडर व्यक्ति को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है जिसका लिंग जन्म के समय निर्धारित लिंग से मेल नहीं खाता; इसमें ट्रांस पुरुष, ट्रांस महिलाएँ, अंतरलिंगी भिन्नताओं (intersex variations) वाले व्यक्ति और किन्नर तथा हिजड़ा जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले लोग शामिल हैं। धारा 3 शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य सेवा, सार्वजनिक सुविधाओं तक पहुँच और आवागमन के अधिकार में भेदभाव का निषेध करती है। पहचान प्रमाणपत्र ज़िला मजिस्ट्रेट जारी करता है, और राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद (National Council for Transgender Persons) की अध्यक्षता केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री करते हैं। यह अधिनियम National Legal Services Authority v. Union of India (2014) मामले की नींव पर खड़ा है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने अपना लिंग स्वयं निर्धारित करने के अधिकार को मान्यता दी और निर्देश दिया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के रूप में माना जाए।

UPSC इसे क्यों पूछता है

  1. GS1 बार-बार महिलाओं और शहर के संबंध पर पूछता है, केवल महिलाओं और कानून पर नहीं. GS1 के पाठ्यक्रम में “महिलाओं और महिला संगठनों की भूमिका” तथा “नगरीकरण, उनकी समस्याएँ और उनके समाधान” शामिल हैं। 2019 में UPSC ने पूछा था, “समय और स्थान के विरुद्ध भारत में महिलाओं के लिए निरंतर चुनौतियाँ क्या हैं?” — यह खबर सीधे इसी प्रश्न का उत्तर देती है। जो उत्तर डिज़ाइन, प्रकाश व्यवस्था, परिवहन और सार्वजनिक स्थान पर मौजूद रहने के अधिकार का हवाला देते हैं, वे दंडात्मक धाराओं की सूची गिनाने वाले उत्तरों से अधिक अंक पाते हैं।
  2. GS2 कमज़ोर वर्गों के लिए संस्थाओं और योजनाओं को, और दिल्ली के बँटे हुए शासन को परखता है. GS2 के पाठ्यक्रम में “कमज़ोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ” और उनकी सुरक्षा के लिए गठित “तंत्र, कानून, संस्थाएँ और निकाय” शामिल हैं। निर्भया कोष का प्रशासन करने वाला मंत्रालय, ट्रांसजेंडर अधिनियम के तहत पहचान प्रमाणपत्र और NALSA निर्णय — यही वे प्रावधान-स्तर के तथ्य हैं जिन पर प्रारंभिक परीक्षा के प्रश्न बनते हैं। GS2 में बार-बार आने वाला अनुच्छेद 239AA बताता है कि पार्कों के ऑडिट का आदेश लोक निवास से क्यों आया और ई-ऑटो योजना दिल्ली मंत्रिमंडल से क्यों।
  3. नीतिशास्त्र के प्रश्नपत्र ऐसे मामलों से निजता, गरिमा और संयम की परीक्षा लेते हैं. GS4 के केस स्टडी अक्सर अभ्यर्थी को किसी यौन हमले के बाद मीडिया के दबाव में काम कर रहे अधिकारी की भूमिका में रखते हैं; पहचान उजागर करने पर रोक और कथित मुठभेड़ — दोनों गरिमा, पारदर्शिता और बल प्रयोग में संयम की कसौटी बनते हैं।

प्रीलिम्स तथ्य

  • भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 72, जिसने भारतीय दंड संहिता की धारा 228A का स्थान लिया, बलात्कार और संबंधित अपराधों की पीड़िता की पहचान उजागर करने पर दो वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान करती है।
  • POCSO अधिनियम, 2012 की धारा 23 मीडिया को पीड़ित बच्चे की पहचान उजागर करने से रोकती है, जिसमें नाम, पता, फ़ोटो, पारिवारिक विवरण, स्कूल और पड़ोस शामिल हैं।
  • केंद्रीय बजट 2013-14 में घोषित निर्भया कोष एक व्यपगत न होने वाला (non-lapsable) कोष है जिसका प्रशासन आर्थिक कार्य विभाग करता है; महिला एवं बाल विकास मंत्रालय इसका नोडल मंत्रालय है।
  • निर्भया कोष के अंतर्गत सुरक्षित शहर परियोजनाएँ गृह मंत्रालय ने आठ शहरों के लिए स्वीकृत कीं: अहमदाबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता, लखनऊ और मुंबई।
  • उभयलिंगी व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत पहचान प्रमाणपत्र ज़िला मजिस्ट्रेट जारी करता है, और राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद की अध्यक्षता केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री करते हैं।
  • अनुच्छेद 239AA(3)(a) के तहत लोक व्यवस्था, पुलिस और भूमि (राज्य सूची की प्रविष्टियाँ 1, 2 और 18) दिल्ली विधानसभा की विधि-निर्माण शक्ति से बाहर हैं।
  • बारहवीं अनुसूची (अनुच्छेद 243W) में पार्क, उद्यान और खेल के मैदान, तथा सड़कों की रोशनी सहित सार्वजनिक सुविधाएँ उन कार्यों में सूचीबद्ध हैं जो नगरपालिकाओं को सौंपे जा सकते हैं।

विश्लेषण

  1. बत्तियों और गार्डों का ऑडिट उस अपराधी को नहीं खोज पाएगा जिसे सब पहले से जानते थे. ऑडिट की जाँच-सूची समझदारी भरी है, पर खबरें किसी दूसरी विफलता की ओर इशारा करती हैं। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार एक आरोपी छेड़छाड़ में पकड़ा गया था और शिकायत दर्ज न होने के कारण छोड़ दिया गया था, पार्क के गार्ड उसे इलाके का दबंग बताते थे, और DCP (दक्षिण-पूर्व) विनीत कुमार ने कहा कि पुलिसकर्मियों के पास “सभी स्थानीय बदमाशों का ब्योरा” है, जिनमें वह भी शामिल था। जानकारी मौजूद थी; पर औपचारिक शिकायत के बिना व्यवस्था कार्रवाई नहीं कर सकी, और उत्पीड़न झेलने वाली महिलाएँ ऐसी शिकायत शायद ही दर्ज कराती हैं। जो ऑडिट बल्ब तो गिनता है पर अनौपचारिक शिकायतों के लिए कोई रास्ता नहीं बनाता — जैसे ऐसा हेल्प डेस्क जो FIR से इतर शिकायतें भी दर्ज करे — वह दिखाई देने वाली कमी को भरता है और असली कमी को जस का तस छोड़ देता है। विरोधी मत भी उचित है: साख के आधार पर की गई पुलिसिंग मनमाने उत्पीड़न में बदल सकती है, इसलिए ऐसे किसी भी माध्यम का परिणाम लिखित रूप में दर्ज चेतावनियाँ होनी चाहिए, न कि कानून से परे दंड।
  2. पुलिस बनकर आए पुरुष इसलिए सफल हुए क्योंकि नैतिक पुलिसिंग ने युवाओं को वर्दी से डरना सिखा दिया है. अख़बारों के अनुसार आरोपी पुलिसकर्मी बनकर आए और पुलिस की शब्दावली का प्रयोग किया, और इंडियन एक्सप्रेस सूत्रों के हवाले से बताता है कि उन्होंने POCSO के तहत मामला दर्ज कराने की धमकी दी। पार्क में ‘पुलिस’ द्वारा रोके गए किशोर मदद के लिए पुकारने के बजाय बात मान लेते हैं, क्योंकि उन्होंने सीख लिया है कि पार्कों में अधिकार का प्रयोग करने वाले युवाओं को परेशान करते हैं; “नैतिक पुलिसिंग” (moral policing) के विरुद्ध LSR का नारा ठीक इसी संबंध को पहचानता है। 22वें विधि आयोग ने 2023 में सहमति की आयु को 18 वर्ष से कम न करने की सलाह दी, जिससे किशोरों का आपसी साथ कानूनी रूप से जोखिम भरा बना रहता है और ऐसी ब्लैकमेलिंग का रास्ता खुला रहता है। इसलिए पार्कों में नैतिकता के नाम पर होने वाली गश्त पुलिस का वेश धरकर अपराध करना कठिन नहीं, बल्कि आसान बना सकती है। विरोधी मत यह है कि दिखाई देने वाली पुलिस यौन अपराधियों को रोकती है — यह सच है, पर तभी जब पार्क में आने वाले लोग भरोसा करें कि वर्दी उनसे सवाल-जवाब करने के लिए नहीं, उनकी रक्षा करने के लिए है।
  3. अँधेरा होने पर द्वार बंद करना और पार्क RWA को सौंपना महिलाओं की उपस्थिति को ही समस्या मान लेता है. DDA कई द्वारों वाले पार्कों में देर शाम का प्रवेश सीमित कर सकता है, और अधिकारियों से कुछ पार्क RWA या निजी संस्थाओं को सौंपने पर विचार करने को कहा गया है। दोनों उपाय उपयोग घटाकर जोखिम घटाते हैं, जबकि जेन जैकब्स और Why Loiter? का तर्क यह है कि चहल-पहल वाले, खुले स्थान ही अधिक सुरक्षित होते हैं। RWA प्रबंधन का अर्थ अक्सर ताले लगे द्वार और घरेलू कामगारों, रेहड़ी-पटरी वालों तथा गरीबों का चुपचाप बहिष्कार होता है — यह उस सार्वजनिक वस्तु का निजीकरण है जिसे बारहवीं अनुसूची नगरपालिकाओं को सौंपती है। इसी तरह दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 के तहत 379 लोगों का पकड़ा जाना सक्रियता को मापता है, सुरक्षा को नहीं। विरोधी मत यह है कि मौजूदा कर्मचारियों के बल पर कुछ पार्कों को रात में सँभालना संभव नहीं, और RWA सचमुच रखरखाव सुधारते हैं; उचित कसौटी यह है कि ऑडिट का अंत अधिक रोशनी और अधिक आवाजाही में होता है या अधिक तालों में।
  4. दिल्ली की सुरक्षा संविधान ने बाँट रखी है, और समन्वय जवाबदेही की जगह ले रहा है. अनुच्छेद 239AA के तहत पुलिस और भूमि उपराज्यपाल के माध्यम से केंद्र के पास हैं, और उपराज्यपाल ही DDA के अध्यक्ष भी हैं; MCD अपने निर्वाचित सदन के प्रति उत्तरदायी है; परिवहन और महिला कल्याण निर्वाचित दिल्ली सरकार के पास हैं। एक ही दिन उपराज्यपाल के ऑडिट और मंत्रिमंडल की DURGA योजना सामने आईं — दो समानांतर पटरियाँ, जिनका कोई साझा स्वामी नहीं है। दो एजेंसियों से एक सप्ताह में रिपोर्ट माँगना खानापूर्ति को न्योता देना है; बेहतर व्यवस्था यह होगी कि हर पार्क के लिए एक जवाबदेह एजेंसी हो, नामित अधिकारी के साथ ऑडिट प्रकाशित हो, और जागोरी मॉडल पर महिला उपयोगकर्ता बार-बार ऑडिट करें। विरोधी मत यह है कि पुलिस और DDA पर उपराज्यपाल के सीधे नियंत्रण के कारण 48 घंटों के भीतर कार्रवाई हो सकी, जो पूरी तरह विकेंद्रीकृत शहर शायद न कर पाता।
  5. DURGA सुरक्षा योजना के रूप में प्रस्तुत आजीविका योजना है, और इसकी पात्रता शर्तें तय करेंगी कि यह इन दोनों में से कुछ बन भी पाती है या नहीं. मुख्यमंत्री कार्यालय DURGA को “सम्मानजनक स्वरोज़गार” और महिला सुरक्षा — दोनों के रूप में प्रस्तुत करता है। इसकी पात्रता — 20 से 40 वर्ष की आयु, ड्राइविंग लाइसेंस और PSV बैज — उन्हीं महिलाओं को चुनती है जो पहले से परिवहन के काम में हैं, जहाँ महिलाएँ बहुत कम हैं; इसलिए प्रशिक्षण की व्यवस्था के बिना 1,300 ऑटो के लिए चालक ही न मिलें, ऐसा हो सकता है। तीन से अधिक बच्चों वाली महिलाओं पर रोक कानूनी रूप से बचाव योग्य है, क्योंकि Javed v. State of Haryana (2003) में सर्वोच्च न्यायालय ने पंचायत उम्मीदवारों के लिए दो-संतान मानदंड को वैध ठहराया था, पर आजीविका योजना में यह शर्त बेमेल लगती है। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए 130 ऑटो उस समावेशन की दिशा में वास्तविक कदम हैं जिसकी माँग 2019 का अधिनियम करता है। विरोधी मत मज़बूत है: महिला चालक रात में महिला यात्रियों को अधिक सुरक्षित महसूस कराती हैं, और चालक की सीट पर बैठी महिलाएँ सार्वजनिक स्थान पर महिलाओं की उपस्थिति को सामान्य बनाती हैं — जो किसी भी पार्क ऑडिट से गहरा इलाज है।

संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“भारतीय शहरों में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा पर प्रतिक्रियाएँ मुख्यतः निगरानी और पुलिसिंग पर निर्भर रहती हैं, जबकि सार्वजनिक स्थानों के डिज़ाइन और उपयोग पर कम ध्यान दिया जाता है।” दिल्ली में हाल में उठाए गए कदमों के आलोक में इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। सुरक्षित सार्वजनिक स्थानों के लिए एक लैंगिक रूप से संवेदनशील ढाँचे में क्या-क्या शामिल होना चाहिए? (15 अंक, 250 शब्द)

उत्तर की रूपरेखा

  1. भूमिका. आस्था कुंज पार्क के सामूहिक बलात्कार और 23 सितंबर को उपराज्यपाल द्वारा सार्वजनिक पार्कों के सुरक्षा ऑडिट के आदेश से शुरुआत कीजिए, जिसकी रिपोर्ट एक सप्ताह में देनी है — यह अपराध हो जाने के बाद बनी नीति का उदाहरण है।
  2. मुख्य भाग — निगरानी और पुलिसिंग की राह. CCTV, डार्क स्पॉट पर रोशनी, बीट गश्त और क्षेत्र-प्रभुत्व (area domination) अभियानों का वर्णन कीजिए, जिनमें दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 के तहत 379 लोगों को पकड़ा गया, और इन्हें निर्भया कोष तथा सुरक्षित शहर परियोजनाओं से जोड़िए। सीमाएँ भी बताइए: शिकायत के अभाव में छोड़ा गया एक जाना-पहचाना अपराधी, बंद पड़ा पिंक बूथ, और ऐसे अभियान जो सुरक्षा नहीं, केवल सक्रियता मापते हैं।
  3. मुख्य भाग — डिज़ाइन और उपयोग की राह. महिला सुरक्षा ऑडिट (METRAC, जागोरी, UN Women की सुरक्षित शहर पहल), CPTED और सार्वजनिक स्थान के अधिकार के पक्ष में Why Loiter? के तर्क को समझाइए। द्वार बंद करने और पार्क RWA को सौंपने की तुलना उन उपायों से कीजिए जो आवाजाही बढ़ाते हैं, जैसे DURGA की महिला और ट्रांसजेंडर चालक, और साथ ही इसकी पात्रता की सीमाओं का भी उल्लेख कीजिए।
  4. मुख्य भाग — शासन-स्तर का समाधान. अनुच्छेद 239AA के तहत दिल्ली के बँटे हुए शासन और पार्कों तथा सड़क-रोशनी से जुड़े बारहवीं अनुसूची के कार्यों की ओर ध्यान दिलाइए। हर पार्क के लिए एक जवाबदेह एजेंसी, महिला उपयोगकर्ताओं द्वारा किए गए ऑडिट का प्रकाशन, FIR से इतर शिकायतों के लिए एक माध्यम, परिसरों के लिए सुरक्षा-परामर्श प्रोटोकॉल, और BNS की धारा 72 तथा POCSO की धारा 23 के तहत पहचान की कठोर सुरक्षा का प्रस्ताव कीजिए।
  5. निष्कर्ष. निष्कर्ष दीजिए कि पुलिसिंग अपराध हो जाने के बाद अपराधियों को पकड़ती है, जबकि डिज़ाइन और उपयोग अपराध के अवसर ही रोकते हैं, और कोई शहर महिलाओं के लिए तभी सुरक्षित है जब वे उसके स्थानों का किसी भी समय, किसी भी कारण से उपयोग कर सकें।

प्रशासक की दृष्टि

आप दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के ज़िला मजिस्ट्रेट हैं। ऑडिट रिपोर्ट एक सप्ताह में देनी है। आप क्या करेंगे?

मैं ऑडिट को दो इंजीनियरिंग विभागों की मेज़ पर बैठकर की गई कवायद नहीं बनने दूँगा। हर पार्क का सूर्यास्त के बाद पैदल निरीक्षण ऐसी टीम करेगी जिसमें आस-पड़ोस की महिलाएँ, LSR की छात्राएँ और पार्क कर्मचारी हों; वे एक सरल सुरक्षा-ऑडिट पत्रक भरेंगे और डार्क स्पॉट का नक्शा बनाएँगे। तुरंत हो सकने वाले सुधार — बत्तियाँ, छँटी हुई झाड़ियाँ, ठीक से काम करते द्वार, चालू पिंक बूथ — नामित अधिकारियों की देखरेख में सप्ताह भर के भीतर पूरे किए जाएँगे। हर द्वार पर लिखा एक शिकायत नंबर यह सुनिश्चित करेगा कि जो उत्पीड़न कभी FIR नहीं बनता, वह भी दर्ज हो और उस पर आगे कार्रवाई हो।

पुलिस उपायुक्त (DCP) के रूप में आपसे एक टेलीविज़न चैनल खबर को ‘मानवीय’ रंग देने के लिए पीड़िता और उसके परिवार का ब्योरा माँगता है। आप क्या उत्तर देंगे?

मैं मना कर दूँगा और कारण भी बताऊँगा: BNS की धारा 72 बलात्कार पीड़िता की पहचान उजागर करने को अपराध बनाती है, और चूँकि वह नाबालिग है, POCSO अधिनियम की धारा 23 मीडिया को उसका नाम, स्कूल, पड़ोस या परिवार उजागर करने से रोकती है। गिरफ़्तारियों, जाँच और सुरक्षा उपायों के बारे में जानने की जनता की माँग जायज़ है, और यह जानकारी मैं नियमित ब्रीफ़िंग के ज़रिए दूँगा; साथ ही अपने कर्मचारियों को चेतावनी दूँगा कि जानकारी लीक करना दंडनीय है। मामले के बारे में पारदर्शिता और पीड़िता के बारे में चुप्पी — इन दोनों में कोई टकराव नहीं है।

साक्षात्कार बोर्ड पूछता है: क्या DURGA जैसी आजीविका योजना से तीन से अधिक बच्चों वाली महिलाओं को बाहर रखा जाना चाहिए?

मेरा उत्तर होगा कि यह शर्त योजना के उद्देश्य के ही विरुद्ध जाती है। जिन महिलाओं को स्वरोज़गार की सबसे अधिक ज़रूरत है, वे अक्सर बड़े परिवारों वाली होती हैं और संतान से जुड़े फ़ैसलों में उनकी बात कम चलती है; इसलिए यह रोक किसी फ़ैसले को प्रभावित किए बिना महिला को ही दंडित करती है। न्यायालयों ने निर्वाचित पदों के लिए ऐसे मानदंडों को वैध ठहराया है, पर आजीविका योजना का उद्देश्य अवसरों का विस्तार करना है। यदि लक्ष्य छोटे परिवार हैं, तो महिलाओं के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ पात्रता पर रोक की तुलना में यह लक्ष्य कहीं बेहतर ढंग से हासिल करती हैं।