UPSC Darpan

2. अर्थव्यवस्था (Economy)GS325 September 2026

संशोधित खान अधिनियम की धारा 9D से ओडिशा को कितना नुक़सान होगा, राज्य ने अब तक इसका आकलन नहीं किया

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ख़बर

भुवनेश्वर। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार गुरुवार, 24 सितंबर को सभी दलों के विधायकों ने खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 [Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Act, 2026] पर ओडिशा सरकार से कुल 13 लिखित प्रश्न पूछे। संसद द्वारा हाल में किए गए संशोधन खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर, उपकर और अन्य शुल्क लगाने की राज्य सरकारों की शक्ति को सीमित करते हैं। बहस के केंद्र में धारा 9D रही, जो राज्यों को केंद्र सरकार की स्वीकृति के बिना खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर स्वतंत्र कर या उपकर लगाने से रोकती है। उपकर (Cess) किसी निर्दिष्ट उद्देश्य के लिए वसूला जाने वाला कर है, और ‘खनिज अधिकार’ (Mineral Right) ज़मीन से खनिज निकालने का वैधानिक अधिकार है, जो सामान्यतः खनन पट्टे के माध्यम से प्राप्त होता है। इस्पात एवं खान मंत्री बिभूति भूषण जेना ने कहा कि राज्य ने धारा 9D के अपने राजस्व पर पड़ने वाले प्रभाव का अभी तक कोई मात्रात्मक आकलन नहीं किया है। उन्होंने कहा, “संशोधित प्रावधानों के संबंध में इस चरण पर वित्तीय लाभ या हानि का कोई विशिष्ट अनुमान नहीं लगाया गया है,” और जोड़ा कि केंद्र द्वारा आवश्यक नियम और विनियम बनाए जाने के बाद राज्य प्रभाव का आकलन करेगा। विपक्ष ने ध्यान दिलाया कि ओडिशा के महाधिवक्ता ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष खनिज-युक्त भूमि पर शुल्क का बचाव किया था। मंत्री ने उत्तर दिया कि सरकारी प्रकाशन ‘ओडिशा रिव्यू’ में छपे या सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रखे गए आँकड़ों और पक्षों को धारा 9D के वर्तमान प्रभाव का विभागीय आकलन नहीं माना जा रहा है। उन्होंने कहा, “ऐसी कोई भी तुलना संशोधित प्रावधान के विधिक और परिचालन निहितार्थ पूरी तरह स्पष्ट हो जाने के बाद ही की जाएगी।” मुख्यमंत्री मोहन माझी और पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पहले ही राजकोष को नुक़सान की आशंकाओं को ख़ारिज कर चुके हैं। बीजू जनता दल (BJD) और INDIA गठबंधन के दलों ने क्रमशः 28 और 29 सितंबर को विधानसभा के सामने प्रदर्शन का आह्वान किया है; उनका आरोप है कि संशोधित अधिनियम के चलते राज्य को ₹1 लाख करोड़ से अधिक के कर बकाया और ₹12,000 करोड़ के वार्षिक राजस्व का नुक़सान होगा। BJD ने कहा कि अधिनियम को निरस्त करने की माँग वाली रैली का नेतृत्व पार्टी अध्यक्ष नवीन पटनायक करेंगे और आंदोलन को पूरे राज्य में फैलाया जाएगा। पार्टी ने कहा, “चूँकि देश में उपलब्ध कुल खनिज संसाधनों का 44% ओडिशा के पास है, इसलिए सबसे अधिक नुक़सान इसी राज्य को होगा।” नुक़सान के ये आँकड़े विपक्ष के हैं; सरकार ने अपना कोई आँकड़ा सामने नहीं रखा है। पाठ्यक्रम से जुड़ाव: GS2 में केंद्र–राज्य वित्तीय संबंध और GS3 में संसाधन जुटाना तथा खनन।

कड़ी — एक पंक्ति में: सातवीं अनुसूची खनन को संघ के विनियमन (सूची I की प्रविष्टि 54) और राज्य के कराधान (सूची II की प्रविष्टियाँ 49 और 50) में बाँटती है → जुलाई 2024 में सर्वोच्च न्यायालय निर्णय देता है कि रॉयल्टी कर नहीं है और राज्य खनिज अधिकारों तथा खनिज-युक्त भूमि पर कर लगा सकते हैं → राज्यों को नए शुल्कों और पुराने बकाये की संभावना दिखती है, जबकि उद्योग के सामने अनिश्चित लागत खड़ी होती है → संसद MMDR संशोधन अधिनियम, 2026 के ज़रिए प्रविष्टि 50 के परिसीमन खंड का उपयोग करती है और धारा 9D के तहत राज्य के शुल्कों को संघ की स्वीकृति के अधीन कर देती है → ओडिशा विधानसभा पूछती है कि राज्य ने क्या खोया, और सरकार कहती है कि वह केंद्र के नियम बनने के बाद ही गिनती करेगी

स्थैतिक पाठ्यक्रम से जुड़ाव

  1. संविधान खनन को संघ के विनियमन और राज्य के कराधान के बीच बाँटता है. संघ सूची की प्रविष्टि 54 संसद को खानों के विनियमन और खनिज विकास पर उस सीमा तक शक्ति देती है जिस सीमा तक संसद विधि द्वारा घोषित करे कि लोकहित में संघ का नियंत्रण समीचीन है। राज्य सूची की प्रविष्टि 23 राज्यों को खानों और खनिज विकास पर शक्ति देती है, किंतु प्रविष्टि 54 के अधीन। राज्य सूची की प्रविष्टि 50 राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की अनुमति देती है, बशर्ते संसद ने खनिज विकास से संबंधित विधि द्वारा कोई परिसीमा न लगाई हो। राज्य सूची की प्रविष्टि 49 भूमि और भवनों पर करों से संबंधित है। खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 [Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957] प्रविष्टि 54 के अधीन की गई वही घोषणा है, इसलिए यही वह विधि है जिसके माध्यम से संसद राज्यों की प्रविष्टि 50 वाली शक्ति को सीमित कर सकती है।
  2. Mineral Area Development Authority v. Steel Authority of India (2024) ने राज्यों को वह शक्ति दी जिसे अब धारा 9D सीमित करती है. 25 जुलाई, 2024 को सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने 8:1 के बहुमत से निर्णय दिया कि MMDR अधिनियम की धारा 9 के तहत दी जाने वाली रॉयल्टी (Royalty) कर नहीं, बल्कि खनिज निकालने के अधिकार के बदले पट्टादाता को किया गया संविदात्मक भुगतान है। बहुमत का निर्णय मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने लिखा, जबकि न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने असहमति जताई। न्यायालय ने माना कि राज्यों को राज्य सूची की प्रविष्टि 50 के अंतर्गत खनिज अधिकारों पर और प्रविष्टि 49 के अंतर्गत खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने की विधायी क्षमता है। न्यायालय ने यह भी पाया कि MMDR अधिनियम, अपने तत्कालीन रूप में, इस कराधान शक्ति को सीमित नहीं करता था। अगस्त 2024 के अनुवर्ती आदेश में न्यायालय ने राज्यों को 1 अप्रैल, 2005 से पिछला बकाया वसूलने की अनुमति दी, जिसका भुगतान बारह वर्षों में किस्तों में होना था, और 25 जुलाई, 2024 से पहले की अवधि की माँगों पर ब्याज और दंड माफ़ कर दिया। ओडिशा में विपक्ष बकाये का जो आँकड़ा आज दे रहा है, उसकी पृष्ठभूमि यही है।
  3. 2015 के संशोधन ने खनिज रियायतों को नीलामी पर ला दिया और ज़िला खनिज प्रतिष्ठान बनाए. MMDR संशोधन अधिनियम, 2015 ने प्रमुख खनिजों के लिए खनन पट्टे और संयुक्त लाइसेंस देने का एकमात्र तरीक़ा नीलामी बना दिया। उद्देश्य था विवेकाधीन आवंटन को समाप्त करना और खनिज मूल्य का बड़ा हिस्सा राज्य के लिए हासिल करना। धारा 9B ने हर खनन-प्रभावित ज़िले में ज़िला खनिज प्रतिष्ठान (District Mineral Foundation — DMF) की स्थापना की। पट्टाधारक DMF को रॉयल्टी से जुड़ी एक राशि देते हैं, जो रॉयल्टी के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती; 12 जनवरी, 2015 से पहले दिए गए पट्टों के लिए यह रॉयल्टी का 30% और नीलामी से मिले पट्टों के लिए 10% तय है। धारा 9C ने राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण न्यास (National Mineral Exploration Trust) बनाया, जिसे रॉयल्टी के 2% से धन मिलता है। DMF का व्यय प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (PMKKKY) के दिशानिर्देशों से संचालित होता है।
  4. रॉयल्टी और कर अलग-अलग साधन हैं और उनके स्वामी भी अलग हैं. प्रमुख खनिजों की रॉयल्टी दरें MMDR अधिनियम की दूसरी अनुसूची में निर्धारित हैं, और केंद्र उन्हें तीन वर्ष में एक से अधिक बार संशोधित नहीं कर सकता। दरें भले केंद्र तय करता हो, रॉयल्टी राज्य सरकार वसूलती है और वह उसी की होती है, क्योंकि खनिज भूमि का हिस्सा हैं। खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर कर एक अलग संप्रभु शुल्क है, जिसके लिए अनुच्छेद 265 के तहत विधि का प्राधिकार आवश्यक है। द हिंदू के विवरण के अनुसार धारा 9D रॉयल्टी को नहीं छूती। वह इस दूसरी, अलग राजस्व धारा को छूती है, जिसे 2024 के निर्णय ने राज्यों के लिए खोला था।

UPSC इसे क्यों पूछता है

  1. GS2 ठोस विवादों के ज़रिए राजकोषीय संघवाद पर प्रश्न पूछता है. मुख्य परीक्षा में केंद्र–राज्य वित्तीय संबंधों की कार्यप्रणाली, GST क्षतिपूर्ति विवाद और वित्त आयोग की भूमिका पर बार-बार प्रश्न आए हैं। खनिज कराधान विवाद इसका नया और अधिक धारदार उदाहरण है। सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय ने राज्यों की कराधान शक्ति बढ़ाई, और फिर संसद ने उसी परिसीमा के ज़रिए उसे संकुचित कर दिया जिसका प्रावधान स्वयं संविधान करता है। जो उत्तर प्रविष्टि 50 के सटीक शब्दों को उद्धृत करेगा, वह अलग दिखेगा।
  2. प्रारंभिक परीक्षा सातवीं अनुसूची की प्रविष्टियों और रॉयल्टी के प्रश्न को परखती है. UPSC पूछ चुका है कि कौन-से विषय संघ, राज्य और समवर्ती सूची में आते हैं, और कोई विशेष शुल्क कर है या फ़ीस। 2024 के निर्णय के बाद ‘रॉयल्टी एक कर है’ एक स्पष्ट जाल-कथन बन गया है। DMF, उसका वित्तपोषण और PMKKKY खनन तथा जनजातीय कल्याण से जुड़ी प्रारंभिक परीक्षा की नियमित सामग्री हैं।
  3. GS3 खनिज नीति को निवेश और क्षेत्रीय विकास से जोड़ता है. GS3 में खनन से जुड़े प्रश्न नीलामी व्यवस्था, महत्त्वपूर्ण खनिजों और पूर्वी भारत में ‘संसाधन अभिशाप’ पर आ चुके हैं। ओडिशा की बहस अभ्यर्थी को दोनों पक्ष दिखाने का अवसर देती है। निवेशक पूर्वानुमेय लागत चाहते हैं, जबकि खनिज-समृद्ध पर अपेक्षाकृत ग़रीब राज्य अपनी भूमि से निकाले गए मूल्य में न्यायसंगत हिस्सा चाहते हैं।

प्रीलिम्स तथ्य

  • राज्य सूची की प्रविष्टि 50 राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति देती है, किंतु यह शक्ति खनिज विकास से संबंधित विधि द्वारा संसद की लगाई गई किसी भी परिसीमा के अधीन है।
  • संघ सूची की प्रविष्टि 54 खानों के विनियमन और खनिज विकास को उस सीमा तक शामिल करती है जिस सीमा तक संसद लोकहित में संघ का नियंत्रण समीचीन घोषित करे; MMDR अधिनियम, 1957 ऐसी ही एक घोषणा है।
  • Mineral Area Development Authority v. Steel Authority of India (2024) में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने 8:1 से निर्णय दिया कि MMDR अधिनियम के अंतर्गत रॉयल्टी कर नहीं है।
  • इसी निर्णय में कहा गया कि राज्य सूची की प्रविष्टि 49 (भूमि और भवनों पर कर) के अंतर्गत राज्य खनिज-युक्त भूमि पर कर लगा सकते हैं।
  • ज़िला खनिज प्रतिष्ठान 2015 के संशोधन द्वारा MMDR अधिनियम की धारा 9B के अंतर्गत बनाए गए और इन्हें खनन पट्टाधारकों के रॉयल्टी से जुड़े अंशदान से धन मिलता है।
  • MMDR संशोधन अधिनियम, 2015 ने प्रमुख खनिजों के खनन पट्टे देने के लिए नीलामी को तरीक़ा बनाया।
  • MMDR अधिनियम के अंतर्गत प्रमुख खनिजों की रॉयल्टी दरें दूसरी अनुसूची में निर्दिष्ट हैं, और केंद्र उन्हें तीन वर्ष में एक से अधिक बार संशोधित नहीं कर सकता।

विश्लेषण

  1. धारा 9D संवैधानिक रूप से सुरक्षित है, पर उसका समय उसे न्यायालय के निर्णय को पलटने जैसा दिखाता है. प्रविष्टि 50 स्पष्ट रूप से राज्य की शक्ति को ‘खनिज विकास से संबंधित विधि द्वारा संसद की लगाई गई किसी भी परिसीमा के अधीन’ रखती है। अतः नए शुल्कों के लिए केंद्रीय स्वीकृति अनिवार्य करने वाला संघीय कानून ठीक वही है जिसकी कल्पना संविधान करता है। 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने केवल इतना कहा था कि MMDR अधिनियम, जैसा वह तब लिखा था, उसमें ऐसी कोई परिसीमा नहीं थी। उसने यह नहीं कहा कि संसद ऐसी परिसीमा जोड़ नहीं सकती। राजनीतिक लागत घटनाक्रम से पैदा होती है: पहले राज्यों के पक्ष में निर्णय, फिर ऐसा संशोधन जो उनकी जीत को संकुचित कर दे। तरीक़ा विधिसम्मत होने के बावजूद राज्य इसे ऐसे देखेंगे मानो संघ ने अदालत में हारा हुआ नतीजा पलट दिया हो।
  2. अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न बकाये का है, और उपलब्ध रिपोर्टें उसका निपटारा नहीं करतीं. विपक्ष के ₹1 लाख करोड़ के आँकड़े को कर बकाया बताया गया है, जो उन देय राशियों की ओर संकेत करता है जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों को 2005 से वसूलने की अनुमति दी थी। रिपोर्ट यह नहीं बताती कि धारा 9D केवल भावी शुल्कों पर लागू होती है या पिछली माँगों की वसूली पर भी असर डालती है। यदि यह केवल नए करों के लिए स्वीकृति माँगती है, तो बकाये का दावा बढ़ा-चढ़ाकर किया गया हो सकता है। यदि नियम पिछली माँगों तक पहुँचते हैं, तो एक राज्य के लिए यह नुक़सान वास्तविक और बहुत बड़ा है। इसीलिए मंत्री का यह उत्तर कि केंद्र के नियम बनने तक कुछ आँका नहीं जा सकता, सच तो है, पर यह स्वीकारोक्ति भी है कि राज्य का सबसे बड़ा राजकोषीय प्रश्न अब नई दिल्ली पर निर्भर है।
  3. लागत का आकलन न करना अपने आप में शासन की विफलता है. BJD के आँकड़े के अनुसार जिस राज्य के पास देश के 44% खनिज संसाधन हैं, उसके पास खनन कानून में किसी बड़े बदलाव के राजकोषीय प्रभाव का एक कामचलाऊ अनुमान होना चाहिए। भले ही वह घोषित मान्यताओं के साथ केवल एक दायरा हो, अनुमान होना चाहिए। सरकार ने विधानसभा को बताया कि उसने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष जो आँकड़े रखे, वे विभागीय आकलन नहीं माने जाते। यह वकील का भेद है, विश्लेषक का नहीं। विपरीत पक्ष भी उचित है: जब तक नियम यह न बताएँ कि किन शुल्कों के लिए और किन मानदंडों पर स्वीकृति चाहिए, तब तक कोई भी आँकड़ा अनुमान भर है, और अनुमान प्रकाशित करना केंद्र के साथ राज्य की मोलभाव की स्थिति को कमज़ोर कर सकता है।
  4. निवेशकों को पूर्वानुमेयता मिलती है, पर उसकी क़ीमत खनन वाले ज़िले चुकाते हैं. 2024 के बाद उद्योग की चिंता यह थी कि हर खनिज-संपन्न राज्य रॉयल्टी, DMF और राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण न्यास के अंशदान के ऊपर अपना उपकर जोड़ देगा, जिससे भारतीय खनिज और उनसे बनने वाला इस्पात तथा बिजली महँगे हो जाएँगे। स्वीकृति का एक ही द्वार इस जोखिम को घटाता है और राज्यों के बीच नीलामी बोलियों को तुलनीय बनाए रखता है। लेकिन जो लोग खनन की धूल, जल-संकट और विस्थापन के साथ जीते हैं, वे उन्हीं ज़िलों में रहते हैं जिनकी सरकारें अब राजस्व का एक स्वतंत्र साधन खो रही हैं। DMF का उद्देश्य उन्हें मूल्य लौटाना था। यदि राज्य के शुल्कों पर अंकुश लगता है, तो खनन-सौदे की न्यायसंगतता और भी अधिक इस पर टिक जाती है कि DMF का पैसा वास्तव में अच्छी तरह ख़र्च होता है या नहीं।
  5. ओडिशा की आंतरिक राजनीति दिखाती है कि संघीय प्रश्न दलगत प्रश्न क्यों बन जाते हैं. ओडिशा में BJP की सरकार है, और मुख्यमंत्री तथा BJP के एक वरिष्ठ नेता नुक़सान की आशंकाओं को ख़ारिज कर चुके हैं, जबकि BJD और INDIA गठबंधन सड़क पर लामबंदी कर रहे हैं। जब भुवनेश्वर और नई दिल्ली दोनों में एक ही दल सत्ता में हो, तो किसी संघीय प्रश्न पर केंद्र से लड़ने की राज्य सरकार की गुंजाइश कम रह जाती है। रिपोर्ट के अनुसार सत्तारूढ़ दल के विधायक भी प्रश्न पूछने वालों में शामिल थे, जो संकेत देता है कि राजकोषीय चिंता दलगत सीमाओं के पार जाती है, भले ही सार्वजनिक रुख़ ऐसा न दिखाते हों। संघवाद तब सबसे अच्छा काम करता है जब राज्य, सत्ता में चाहे कोई भी दल हो, अपने राजकोषीय आधार की रक्षा करें — और यह प्रकरण उसी की परीक्षा है।

संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“संविधान संसद को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की राज्यों की शक्ति सीमित करने की अनुमति देता है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राज्यों की कराधान शक्ति को बरक़रार रखे जाने के तुरंत बाद इस शक्ति का प्रयोग सहकारी संघवाद पर प्रश्न खड़े करता है।” MMDR संशोधन अधिनियम, 2026 और ओडिशा में उठाई गई चिंताओं के आलोक में इस कथन का परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

उत्तर की रूपरेखा

  1. भूमिका. शुरुआत MMDR संशोधन अधिनियम, 2026 की धारा 9D पर ओडिशा विधानसभा के 13 प्रश्नों से कीजिए — यह धारा राज्यों के लिए खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर कर या उपकर लगाने से पहले संघ की स्वीकृति अनिवार्य करती है — और राज्य के मंत्री की इस स्वीकारोक्ति का उल्लेख कीजिए कि कोई अनुमान नहीं लगाया गया है।
  2. मुख्य भाग — संवैधानिक योजना. सूची I की प्रविष्टि 54, सूची II की प्रविष्टियाँ 23, 49 और 50, तथा प्रविष्टि 50 के परिसीमन खंड को समझाइए। Mineral Area Development Authority v. SAIL में 2024 के नौ-न्यायाधीशीय निर्णय का सार दीजिए: रॉयल्टी कर नहीं है, राज्य खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर लगा सकते हैं, और 2005 से पिछला बकाया किस्तों में वसूला जा सकता है।
  3. मुख्य भाग — धारा 9D के पक्ष में तर्क. तर्क दीजिए कि यह राज्यों के उपकरों के बेमेल जाल को रोकती है, इस्पात, बिजली और विनिर्माण के लिए खनिज लागत को पूर्वानुमेय रखती है, नीलामी व्यवस्था की रक्षा करती है, और ठीक वही परिसीमा है जिसकी परिकल्पना संविधान ने की थी।
  4. मुख्य भाग — संघीय चिंताएँ. विपक्ष के ₹1 लाख करोड़ के बकाये और ₹12,000 करोड़ वार्षिक नुक़सान के दावे, अपेक्षाकृत ग़रीब पूर्वी राज्यों में खनिज संपदा के संकेंद्रण, GST के बाद स्वयं के राजस्व स्रोत के कमज़ोर होने, और न्यायिक जीत को कानून द्वारा संकुचित किए जाने से भरोसे पर पड़ने वाले जोखिम का उल्लेख कीजिए। राजस्व-साझेदारी का सूत्र, नियमों में स्वीकृति के पारदर्शी मानदंड और DMF व्यय को सुदृढ़ करने का सुझाव दीजिए।
  5. निष्कर्ष. निष्कर्ष दीजिए कि संशोधन विधिसम्मत है, किंतु सहकारी संघवाद की माँग है कि नियम खनिज-संपन्न राज्यों के परामर्श से बनें और पिछले बकाये के संबंध में स्पष्ट व्यवस्था हो।

प्रशासक की दृष्टि

आप ओडिशा में इस्पात एवं खान विभाग के सचिव हैं। विधानसभा धारा 9D का राजस्व प्रभाव जानना चाहती है। केंद्रीय नियम आने से पहले आप क्या करेंगे?

मैं प्रतीक्षा करने के बजाय परिदृश्य-आधारित आकलन तैयार कराऊँगा। एक परिदृश्य यह मानेगा कि केवल भावी शुल्कों के लिए स्वीकृति चाहिए, और दूसरा यह कि पिछली माँगें भी प्रभावित होंगी; दोनों में खनिज उत्पादन और क़ीमतों से जुड़ी मान्यताएँ स्पष्ट लिखी होंगी। मैं यह पद्धति वित्त विभाग के साथ साझा करूँगा और मसौदा नियमों पर केंद्रीय खान मंत्रालय के साथ परामर्श में इस अनुमान का उपयोग करूँगा। कोई आँकड़ा न होने की तुलना में एक पारदर्शी दायरा विधायिका के लिए कहीं अधिक उपयोगी है।

खनन वाले ज़िले के कलेक्टर के रूप में आप कैसे सुनिश्चित करेंगे कि राज्य की कराधान शक्ति सीमित होने पर भी स्थानीय लोगों को लाभ मिले?

ज़िला खनिज प्रतिष्ठान मेरे सबसे निकट का साधन है, इसलिए मैं उसकी प्राप्तियाँ और परियोजनाओं की सूची सार्वजनिक करूँगा और प्रभावित गाँवों में ग्राम सभा परामर्श करूँगा। सामान्य अवसंरचना पर ख़र्च से पहले मैं सीधे प्रभावित लोगों के लिए पेयजल, स्वास्थ्य और आजीविका में पैसा लगाऊँगा। मैं यह भी जाँचूँगा कि पट्टाधारक अपना DMF अंशदान पूरा और समय पर दे रहे हैं। दिखाई देने वाला और लेखा-परीक्षित व्यय ही खनन क्षेत्रों में भरोसा बनाता है।

साक्षात्कार बोर्ड पूछता है: खनिजों को राष्ट्रीय संसाधन माना जाए या किसी राज्य की अपनी संपदा?

दोनों दृष्टिकोणों में दम है। खनिज राष्ट्रीय उद्योग और सुरक्षा का आधार हैं, जो रियायतों और मूल्य-निर्धारण पर एकसमान राष्ट्रीय नियमों को उचित ठहराता है। साथ ही वे विशेष राज्यों और समुदायों की ज़मीन के नीचे हैं, जो पर्यावरणीय और सामाजिक लागत वहन करते हैं। संतुलित उत्तर है — राष्ट्रीय विनियमन, और साथ में राज्यों तथा खनन ज़िलों के लिए खनिज मूल्य में सुनिश्चित और पूर्वानुमेय हिस्सा, जो एकतरफ़ा बदलाव से नहीं बल्कि परामर्श से तय हो।