UPSC Darpan

2. अर्थव्यवस्था (Economy)GS325 September 2026

मेक इन इंडिया के बारह वर्ष: GVA में विनिर्माण का हिस्सा लगभग 15%, स्मार्ट मीटरों में स्वदेशी चिप अनिवार्य

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ख़बर

नई दिल्ली। 25 सितंबर, 2014 को मेक इन इंडिया की शुरुआत के बारह वर्ष बाद, वृद्धि, निवेश, रोज़गार और निर्यात से जुड़े 12 मानकों पर द हिंदू का एक विश्लेषण बताता है कि विनिर्माण ने भारत की वृद्धि, रोज़गार या वैश्विक निर्यात में अपनी हिस्सेदारी में कोई उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं की है, और प्रोत्साहन योजनाओं के लाभ कुछ गिने-चुने क्षेत्रों तक सीमित रहे हैं। पुरानी आँकड़ा शृंखला के अनुसार 12 में से केवल आधे वर्षों में विनिर्माण समग्र अर्थव्यवस्था से तेज़ बढ़ा; नई शृंखला में 2023-24 से 2025-26 तक ऐसा हुआ, पर यह अंतर तेज़ी से घट रहा है। पुराने औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (Index of Industrial Production — IIP), यानी कारखाना उत्पादन के मासिक माप, पर विनिर्माण 12 में से केवल तीन वर्षों में समग्र सूचकांक से आगे रहा। सकल मूल्य वर्धन (Gross Value Added — GVA) उत्पादन में से उसे बनाने में लगे आगतों को घटाकर मिलता है; नई शृंखला में विनिर्माण का हिस्सा 2022-23 के 14.6% से बढ़कर 2025-26 में केवल 15.6% हुआ। ग़ैर-पेट्रोलियम वस्तु निर्यात 53% बढ़कर $253.5 अरब से 2025-26 में $388.3 अरब हो गया। UNCTAD के आँकड़ों के अनुसार विश्व वाणिज्यिक निर्यात में भारत का हिस्सा 2002 में लगभग 0.8% और 2013 में 1.7% था, और 2025-26 में भी वहीं टिका रहा। निजी सकल स्थिर पूँजी निर्माण (Gross Fixed Capital Formation — GFCF), यानी मशीनरी, भवनों और अन्य स्थिर परिसंपत्तियों पर व्यय, 2022-23 से GDP के अनुपात के रूप में घट रहा है। 12 में से 7 वर्षों में विनिर्माण में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) कुल FDI से धीमी गति से बढ़ा, हालाँकि उसका हिस्सा लगभग 48% से बढ़कर 55% हो गया। RBI के आँकड़े बताते हैं कि क्षमता उपयोग उस 80% के स्तर से नीचे है जिसके ऊपर फ़र्में आम तौर पर नई क्षमता जोड़ती हैं, और छोटी फ़र्मों को मिल रहा तेज़ ऋण नए निवेश के बजाय कार्यशील पूँजी में जाता दिखता है। 2020 और 2021 की 14 उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (Production-Linked Incentive — PLI) योजनाओं ने मार्च 2026 तक ₹2.4 लाख करोड़ का निवेश आकर्षित किया, जिसका लगभग 83% पाँच क्षेत्रों में गया: सौर मॉड्यूल, औषधियाँ, ऑटोमोबाइल और कलपुर्ज़े, विशेष इस्पात, और बड़े पैमाने के इलेक्ट्रॉनिक्स। इंडियन एक्सप्रेस ने नई दिल्ली से बताया कि विद्युत सचिव पंकज अग्रवाल ने FICCI के दूसरे भारतीय विद्युत क्षेत्र सम्मेलन में कहा कि साइबर सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सरकार मध्य-2028 तक स्मार्ट मीटरों में देश में डिज़ाइन की गई चिप अनिवार्य करने की योजना बना रही है। एक चिप की क़ीमत अभी $8 से $10 है, और उन्होंने कहा कि किसी अलग प्रोत्साहन की ज़रूरत नहीं, क्योंकि सरकारी ख़रीद बाज़ार सुनिश्चित करती है। संशोधित वितरण क्षेत्र योजना के तहत 20.33 करोड़ स्मार्ट मीटर स्वीकृत हैं और 5.73 करोड़ लग चुके हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने अलग से ऐसे स्वदेशीकरण का आग्रह किया जो निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाए रखे, न कि अलग-थलग संरक्षणवाद का। पाठ्यक्रम से जुड़ाव: GS3 में औद्योगिक नीति और रोज़गार।

कड़ी — एक पंक्ति में: 2011 की राष्ट्रीय विनिर्माण नीति GDP में 25% हिस्से का लक्ष्य तय करती है → मेक इन इंडिया (2014) कारोबारी सुगमता के सुधार और FDI का खुलापन जोड़ता है, पर निजी निवेश कमज़ोर बना रहता है → PLI योजनाएँ (2020-21) चुने हुए क्षेत्रों में अतिरिक्त उत्पादन के लिए फ़र्मों को भुगतान करती हैं → निवेश आता है पर पाँच क्षेत्रों में सिमट जाता है, जबकि विनिर्माण का हिस्सा लगभग 15% और वैश्विक निर्यात हिस्सा लगभग 1.7% पर अटका रहता है → अब राज्य सार्वजनिक ख़रीद का उपयोग करके सीधे माँग पैदा कर रहा है, जैसे 20 करोड़ स्मार्ट मीटरों के लिए भारत में डिज़ाइन की गई चिप

स्थैतिक पाठ्यक्रम से जुड़ाव

  1. मेक इन इंडिया को 25% का लक्ष्य 2011 की विनिर्माण नीति से विरासत में मिला. राष्ट्रीय विनिर्माण नीति, 2011 (National Manufacturing Policy, 2011) का लक्ष्य एक दशक में GDP में विनिर्माण का हिस्सा 25% तक पहुँचाना और विनिर्माण में 10 करोड़ रोज़गार सृजित करना था। इसने राष्ट्रीय निवेश एवं विनिर्माण क्षेत्र (NIMZ) का प्रस्ताव भी रखा। 25 सितंबर, 2014 को शुरू हुए और आज के उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के नेतृत्व में चल रहे मेक इन इंडिया ने ये लक्ष्य बनाए रखे और विनिर्माण वृद्धि के लिए 12-14% वार्षिक का लक्ष्य तय किया। इसका ध्यान 25 क्षेत्रों, Invest India के माध्यम से निवेशक सुविधा, और कारोबारी सुगमता के सुधारों पर था। 2025-26 में 15.6% हिस्से वाले द हिंदू के निष्कर्ष को उसी 25% लक्ष्य की कसौटी पर पढ़ा जाना चाहिए।
  2. PLI केवल निवेश का नहीं, अतिरिक्त उत्पादन का भुगतान करता है. 2020 से शुरू हुई उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ पात्र फ़र्मों को भारत में बनी वस्तुओं की आधार वर्ष की तुलना में अतिरिक्त बिक्री के एक प्रतिशत के रूप में, एक निश्चित वर्षों तक, नक़द प्रोत्साहन देती हैं। केंद्रीय बजट 2021-22 में 13 प्रमुख क्षेत्रों की PLI योजनाओं के लिए लगभग ₹1.97 लाख करोड़ के परिव्यय की घोषणा हुई, और अब इस कार्यक्रम में 14 योजनाएँ हैं। चूँकि भुगतान उत्पादन पर निर्भर है, यह ढाँचा पैमाने को पुरस्कृत करता है और उन क्षेत्रों के अनुकूल है जहाँ बड़ी फ़र्में तेज़ी से बढ़ सकती हैं। इससे समझ आता है कि निवेश इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर मॉड्यूल और औषधि जैसे कुछ क्षेत्रों में ही क्यों सिमट गया।
  3. सार्वजनिक ख़रीद स्थानीय वरीयता का एक वैधानिक साधन है. सार्वजनिक ख़रीद (मेक इन इंडिया को वरीयता) आदेश, 2017 [Public Procurement (Preference to Make in India) Order, 2017] तत्कालीन औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग ने सामान्य वित्तीय नियम, 2017 के नियम 153(iii) के तहत जारी किया था। 2020 के संशोधित रूप में यह आपूर्तिकर्ताओं को स्थानीय सामग्री के आधार पर वर्गीकृत करता है: श्रेणी-I स्थानीय आपूर्तिकर्ता में कम से कम 50% स्थानीय सामग्री होती है, और श्रेणी-II स्थानीय आपूर्तिकर्ता में 20% से अधिक पर 50% से कम। श्रेणी-I आपूर्तिकर्ताओं को ख़रीद में वरीयता मिलती है, और नोडल मंत्रालय विशिष्ट वस्तुओं के लिए अधिक स्थानीय सामग्री की शर्त अधिसूचित कर सकते हैं। किसी सरकारी योजना के तहत ख़रीदे जाने वाले स्मार्ट मीटरों में भारत में डिज़ाइन की गई चिप अनिवार्य करना इसी प्रकार की शक्ति का उपयोग है। सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम (दिसंबर 2021, ₹76,000 करोड़) ने इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन भारत सेमीकंडक्टर मिशन की स्थापना की, जिसकी डिज़ाइन-संबद्ध प्रोत्साहन योजना चिप डिज़ाइनरों को सहायता देती है; ख़रीद की अनिवार्यता ऐसे डिज़ाइनरों को वह देती है जो अकेला प्रोत्साहन नहीं दे सकता — एक सुनिश्चित पहला ग्राहक।
  4. संशोधित वितरण क्षेत्र योजना प्रीपेड स्मार्ट मीटरों पर टिकी है. संशोधित वितरण क्षेत्र योजना (Revamped Distribution Sector Scheme — RDSS) को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2021 में लगभग ₹3.04 लाख करोड़ के परिव्यय के साथ मंज़ूरी दी, जिसमें लगभग ₹97,631 करोड़ की सकल बजटीय सहायता शामिल है। इसका उद्देश्य वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को वित्तीय रूप से व्यवहार्य बनाना है — राष्ट्रीय स्तर पर समग्र तकनीकी और वाणिज्यिक (AT&C) हानियों को 12-15% तक लाकर, और आपूर्ति की औसत लागत तथा प्राप्त औसत राजस्व के बीच का अंतर पाटकर। अनुदान सुधार के पड़ावों से जुड़े हैं, और पावर फ़ाइनेंस कॉरपोरेशन तथा REC Ltd नोडल एजेंसियाँ हैं। उपभोक्ता, ट्रांसफ़ॉर्मर और फ़ीडर स्तर पर लगे स्मार्ट मीटर डिस्कॉम को यह मापने देते हैं कि बिजली कहाँ बर्बाद या चोरी हो रही है। इसीलिए उनकी चिपें महत्त्वपूर्ण अवसंरचना हैं।

UPSC इसे क्यों पूछता है

  1. GS3 सीधे पूछ चुका है कि विनिर्माण ने गति क्यों नहीं पकड़ी. मुख्य परीक्षा में भारत के कमज़ोर विनिर्माण हिस्से के कारणों, मेक इन इंडिया कार्यक्रम, और इस पर प्रश्न आए हैं कि क्या भारत वैश्विक विनिर्माण केंद्र बन सकता है। द हिंदू का 12-मानकों वाला आकलन अभ्यर्थी को GVA हिस्से, निर्यात हिस्से, निजी GFCF, FDI, क्षमता उपयोग और PLI के संकेंद्रण से जुड़े आँकड़े देता है। इनका उपयोग किसी राय जैसे लगने वाले उत्तर को साक्ष्य-आधारित उत्तर में बदल देता है।
  2. प्रारंभिक परीक्षा औद्योगिक सांख्यिकी की शब्दावली परखती है. UPSC ने IIP, उसके आधार वर्ष और भारांक, प्रमुख उद्योगों, तथा GDP और GVA के अंतर पर प्रश्न पूछे हैं। सकल स्थिर पूँजी निर्माण और क्षमता उपयोग इसके स्वाभाविक अगले प्रश्न हैं। PLI योजना और सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम पर प्रश्न इलेक्ट्रॉनिक्स में आत्मनिर्भरता के संदर्भ में आ चुके हैं।
  3. ऊर्जा सुरक्षा और साइबर सुरक्षा अब पाठ्यक्रम में एक-दूसरे से मिलती हैं. GS3 में अवसंरचना (ऊर्जा) और संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियाँ, जिनमें साइबर सुरक्षा भी शामिल है, दोनों आते हैं। स्मार्ट मीटर इन दोनों को जोड़ते हैं। करोड़ों मीटरों में लगी एक असुरक्षित चिप ग्रिड-सुरक्षा का जोखिम है, और महत्त्वपूर्ण सूचना अवसंरचना पर प्रश्नों में यह उदाहरण काम आ सकता है।

प्रीलिम्स तथ्य

  • मेक इन इंडिया पहल 25 सितंबर, 2014 को शुरू की गई थी, और अब इसका नोडल विभाग उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) है।
  • राष्ट्रीय विनिर्माण नीति, 2011 ने GDP में विनिर्माण का हिस्सा 25% तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा और राष्ट्रीय निवेश एवं विनिर्माण क्षेत्रों का प्रस्ताव किया।
  • सकल मूल्य वर्धन = उत्पादन का मूल्य − मध्यवर्ती उपभोग; GDP = GVA + उत्पाद कर − उत्पाद सब्सिडी।
  • उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन योजनाएँ फ़र्मों को भारत में निर्मित वस्तुओं की आधार वर्ष की तुलना में अतिरिक्त बिक्री से जुड़ा प्रोत्साहन देती हैं।
  • सार्वजनिक ख़रीद (मेक इन इंडिया को वरीयता) आदेश के अंतर्गत श्रेणी-I स्थानीय आपूर्तिकर्ता में कम से कम 50% स्थानीय सामग्री होनी चाहिए।
  • संशोधित वितरण क्षेत्र योजना का लक्ष्य वितरण कंपनियों की AT&C हानियों को राष्ट्रीय स्तर पर 12-15% तक लाना है, और पावर फ़ाइनेंस कॉरपोरेशन तथा REC Ltd इसकी नोडल एजेंसियाँ हैं।
  • भारत सेमीकंडक्टर मिशन सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम के अंग के रूप में इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।

विश्लेषण

  1. कमज़ोर कड़ी प्रोत्साहन नहीं, निजी निवेश है. 12 में से कई मानक एक ही कारण की ओर इशारा करते हैं। GDP के अनुपात में निजी GFCF घट रहा है, क्षमता उपयोग उस 80% के स्तर से नीचे है जो सामान्यतः नए निर्माण को प्रेरित करता है, और औद्योगिक ऋण कार्यशील पूँजी का भुगतान कर रहा है। जब मौजूदा संयंत्र पूरी क्षमता से नहीं चल रहे, तब कोई भी प्रोत्साहन दिया जाए, फ़र्में क्षमता नहीं बढ़ातीं। इसका अर्थ है कि निर्णायक बाधा माँग है, स्थापना की लागत नहीं। इसलिए समाधान आंशिक रूप से औद्योगिक नीति के बाहर है: परिवारों की आय, उपभोग और निर्यात बाज़ारों में। PLI यह तय करने में मदद कर सकता है कि कारख़ाना कहाँ लगे, पर वह माँग पैदा नहीं कर सकता जो कारख़ाना लगाने को उचित ठहराए।
  2. पाँच क्षेत्रों में संकेंद्रण PLI के ढाँचे में ही निहित था. PLI निवेश का लगभग 83% पाँच क्षेत्रों में होना संयोग नहीं है। अतिरिक्त बिक्री पर भुगतान करने वाली योजना उन क्षेत्रों को पुरस्कृत करती है जिनके बाज़ार बड़े और तेज़ी से बढ़ते हैं और जहाँ कुछ बड़ी फ़र्में पैमाना बढ़ा सकती हैं — जैसे फ़ोन, सौर मॉड्यूल और दवाएँ। वस्त्र, जूते और फ़र्नीचर जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में अनेक छोटी फ़र्में और कम मार्जिन हैं, और ऐसे ढाँचे से उन्हें बहुत कम लाभ मिलता है। यही वे क्षेत्र हैं जो रोज़गार की तस्वीर बदल सकते हैं। उचित विपरीत पक्ष यह है कि संकेंद्रण कुशल भी हो सकता है, क्योंकि कुछ विश्व-स्तर पर प्रतिस्पर्धी क्लस्टर खड़े करके ही पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं ने शुरुआत की थी। असली प्रश्न यह है कि क्या समय के साथ ये क्लस्टर स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं तक फैलते हैं।
  3. निर्यात हिस्सा सबसे अर्थपूर्ण माप है, और वह हिला तक नहीं. प्रतिस्पर्धी विनिर्माण विश्व बाज़ारों में दिखाई देता है। वैश्विक वाणिज्यिक निर्यात में भारत का हिस्सा 2014 से पहले के दशक में 0.8% से बढ़कर 1.7% हुआ और तब से 1.7% पर ही टिका है। ग़ैर-पेट्रोलियम निर्यात में 53% की वृद्धि वास्तविक है, पर विश्व व्यापार भी बढ़ा, इसलिए भारत ने बस अपनी जगह बनाए रखी। यह उसी दिन मुख्य आर्थिक सलाहकार की उस चेतावनी से मेल खाता है कि स्वदेशीकरण को भारत को निर्यात में प्रतिस्पर्धी बनाए रखना चाहिए, न कि अलग-थलग संरक्षणवाद में बदल जाना चाहिए। 2018 से आगतों पर बढ़ाए गए प्रशुल्कों ने कुछ अंतिम वस्तु निर्माताओं को संरक्षण तो दिया होगा, पर भारतीय उत्पादों का निर्यात महँगा भी कर दिया होगा।
  4. स्मार्ट-मीटर की अनिवार्यता ठोस रणनीति है, पर लागत और समय-सीमा के जोखिम वास्तविक हैं. स्मार्ट मीटर करोड़ों घरों में ग्रिड से जुड़े हैं, इसलिए उनकी चिपें एक ऐसे नेटवर्क का हिस्सा हैं जिसे कोई शत्रुतापूर्ण तत्व बाधित कर सकता है। इससे भरोसेमंद डिज़ाइन के पक्ष में सुरक्षा का तर्क मज़बूत होता है। बाज़ार सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक ख़रीद का उपयोग सही साधन है, क्योंकि चिप डिज़ाइनर को मात्रा चाहिए, और 20.33 करोड़ स्वीकृत मीटर वह मात्रा देते हैं। जोखिम लागत और देरी में हैं: शुरुआत में घरेलू चिप मौजूदा $8 से $10 से महँगी पड़ सकती है, और ऐसी चिप के लिए मध्य-2028 की अनिवार्यता, जो अभी प्रमाणित नहीं हुई, उस योजना को धीमा कर सकती है जिसमें अब तक केवल 5.73 करोड़ मीटर लगे हैं। स्वतंत्र सुरक्षा प्रमाणन के साथ चरणबद्ध अनिवार्यता दोनों जोखिमों को सीमित करेगी।
  5. आँकड़ों के संशोधन दोनों ओर सावधानी की माँग करते हैं. रिपोर्ट GVA और IIP की पुरानी और नई दोनों शृंखलाओं का उपयोग करती है, और वे कुछ अलग-अलग कहानियाँ कहती हैं। नई शृंखला में विनिर्माण तीन वर्षों तक समग्र वृद्धि से आगे रहा, और उसका हिस्सा एक प्रतिशत अंक बढ़ा। मेक इन इंडिया के आलोचकों को इस सुधार की अनदेखी नहीं करनी चाहिए, और समर्थकों को इस पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। नई शृंखला के तीन वर्ष कम हैं, और रिपोर्ट बताती है कि यह अंतर तेज़ी से घट रहा है। पाठक भरोसे के साथ इतना कह सकता है कि कोई भी शृंखला वह बड़ा संरचनात्मक परिवर्तन नहीं दिखाती जिसकी कल्पना 25% के लक्ष्य ने की थी।

संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“अपनी शुरुआत के बारह वर्ष बाद मेक इन इंडिया ने कुछ क्षेत्रों में निवेश की संरचना तो सुधारी है, पर भारत की अर्थव्यवस्था में विनिर्माण का स्थान नहीं बदला है।” वृद्धि, निवेश, निर्यात और उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन योजनाओं के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। विनिर्माण-आधारित रोज़गार को व्यापक बनाने के उपाय सुझाइए। (15 अंक, 250 शब्द)

उत्तर की रूपरेखा

  1. भूमिका. 25 सितंबर, 2014 की शुरुआत और राष्ट्रीय विनिर्माण नीति, 2011 से विरासत में मिले 25% विनिर्माण हिस्से के लक्ष्य का उल्लेख कीजिए। इसकी तुलना नई शृंखला में 2025-26 के 15.6% हिस्से से कीजिए, जो 2022-23 में 14.6% था।
  2. मुख्य भाग — जहाँ सफलता मिली. ग़ैर-पेट्रोलियम निर्यात 53% बढ़कर $388.3 अरब; FDI में विनिर्माण का हिस्सा लगभग 48% से बढ़कर 55%; मार्च 2026 तक ₹2.4 लाख करोड़ का PLI निवेश; इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर मॉड्यूल और औषधियों में मज़बूत परिणाम; नई शृंखला में तीन वर्षों तक विनिर्माण समग्र वृद्धि से आगे।
  3. मुख्य भाग — जहाँ सफलता नहीं मिली. वैश्विक निर्यात हिस्सा 2013 से 1.7% पर स्थिर; पुरानी शृंखला में 12 में से केवल 3 वर्षों में विनिर्माण IIP से आगे; GDP के अनुपात में निजी GFCF में गिरावट; क्षमता उपयोग 80% से नीचे; औद्योगिक ऋण कार्यशील पूँजी में; PLI निवेश का 83% पाँच क्षेत्रों में, श्रम-प्रधान उद्योगों में बहुत कम।
  4. मुख्य भाग — उपाय. मुख्य आर्थिक सलाहकार के आग्रह के अनुरूप आगतों पर प्रशुल्क कम रखकर निर्यात के माध्यम से माँग को सहारा दें; प्रोत्साहनों को श्रम-प्रधान क्षेत्रों तक बढ़ाएँ; पूँजीगत वस्तुओं के लिए MSME ऋण सुधारें; RDSS के तहत स्मार्ट-मीटर चिप अनिवार्यता की तरह सार्वजनिक ख़रीद का रणनीतिक उपयोग करें; और लॉजिस्टिक्स, भूमि तथा श्रम कानूनों के क्रियान्वयन की समस्याएँ सुलझाएँ।
  5. निष्कर्ष. निष्कर्ष दीजिए कि औद्योगिक नीति के अगले चरण का ध्यान क्षमता से जुड़े और प्रोत्साहनों की घोषणा भर पर नहीं, बल्कि माँग, निर्यात और रोज़गार पर होना चाहिए।

प्रशासक की दृष्टि

आप विद्युत मंत्रालय में संयुक्त सचिव हैं। डिस्कॉम शिकायत करते हैं कि भारत में डिज़ाइन की गई चिप की अनिवार्यता से स्मार्ट मीटर लगाने में देरी होगी। आप कैसे जवाब देंगे?

मैं परीक्षण और प्रमाणन प्रोटोकॉल के साथ एक चरणबद्ध रोडमैप प्रकाशित करूँगा, ताकि निर्माताओं को पता हो कि घरेलू चिप कब से इस्तेमाल करनी है और उसका सत्यापन कैसे होगा। जहाँ समय पर प्रमाणित घरेलू चिप उपलब्ध न हो, वहाँ आयातित चिपों की कड़ी सुरक्षा जाँच के साथ समयबद्ध छूट दूँगा। मैं 20.33 करोड़ स्वीकृत मीटरों के मुक़ाबले हर महीने स्थापना की दर पर नज़र रखूँगा। उद्देश्य ग्रिड को सुरक्षित करना है, पर अनिवार्यता को योजना के लक्ष्य चूकने का बहाना नहीं बनने देना है।

किसी औद्योगिक ज़िले के ज़िलाधिकारी के रूप में, जब कारख़ाने क्षमता से कम चल रहे हों, तब आप निजी निवेश कैसे बढ़ाएँगे?

निवेश माँग और संचालन की सुगमता के पीछे चलता है, इसलिए पहले मैं अपने नियंत्रण वाली स्थानीय बाधाएँ दूर करूँगा: भूमि अभिलेख, एकल-खिड़की मंज़ूरी, बिजली की विश्वसनीयता और स्वीकृति की समय-सीमा। मैं ज़िला निर्यात संवर्धन समिति और एक ज़िला एक उत्पाद ढाँचे के साथ मिलकर MSME को निर्यात ख़रीदारों और सरकारी ई-मार्केटप्लेस से जोड़ूँगा। मैं बैंकों के साथ ऋण शिविर भी लगाऊँगा, ताकि व्यवहार्य इकाइयाँ केवल कार्यशील पूँजी नहीं, मशीनरी के लिए सावधि ऋण भी पा सकें। सफलता का माप चालू हुई नई इकाइयाँ और सृजित रोज़गार होंगे।

साक्षात्कार बोर्ड पूछता है: क्या सरकारी ख़रीद का उपयोग घरेलू उत्पादकों को तरजीह देने के लिए करना अच्छा विचार है?

हो सकता है, जब कोई रणनीतिक कारण हो और घरेलू उद्योग को शुरुआती पैमाने की ज़रूरत हो, जैसे सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील चिपों के मामले में। जोखिम यह है कि संरक्षण स्थायी बन जाए, करदाताओं पर लागत बढ़ाए और संरक्षित फ़र्मों को विदेश में अप्रतिस्पर्धी बना दे। अच्छी प्रथा है — स्थानीय सामग्री और प्रदर्शन के स्पष्ट मानक तय करना, उनकी तय समय पर समीक्षा करना, और उन्हें निर्यात लक्ष्यों से जोड़ना। सार्वजनिक ख़रीद किसी उद्योग को शुरू करने में मदद करे, उसे हमेशा के लिए आरामदायक बाज़ार की गारंटी न दे।