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5. पर्यावरण एवं परिस्थितिकी (Environment & Ecology)GS326 September 2026

केरलम ने केंद्र से पश्चिमी घाट के पारिस्थितिकी-संवेदी क्षेत्र को घटाकर केवल 8,590.69 वर्ग किमी वनक्षेत्र तक सीमित करने का आग्रह किया

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ख़बर

तिरुवनंतपुरम। पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी-संवेदी क्षेत्र (Ecologically Sensitive Area — ESA) के मुसौदे के विरुद्ध कर्नाटक द्वारा बुलाए गए विधानसभा के विशेष सत्र, जिस पर हमने 21 सितंबर को कार्ड दिया था, के बाद केरलम सरकार ने अपना औपचारिक क़दम उठाया है: द हिंदू के अनुसार उसने केंद्र से आग्रह किया है कि घाट के अपने हिस्से में ESA को केवल 8,590.69 वर्ग किमी वनक्षेत्र तक सीमित रखा जाए। ESA वह क्षेत्र है जिसे केंद्र पर्यावरण कानून के अंतर्गत अधिसूचित करता है और जिसमें खनन, उत्खनन और बड़े निर्माण जैसी गतिविधियाँ इस आधार पर प्रतिबंधित या विनियमित की जाती हैं कि वहाँ का परिस्थितिकी-तंत्र नाज़ुक है। पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विशेष सचिव एम.जी. राजामणिक्कम ने गुरुवार को राज्य की सिफ़ारिशें और सुझाव औपचारिक रूप से केंद्र के सामने रखे, यह बात विद्युत एवं पर्यावरण मंत्री सन्नी जोसेफ़ ने शुक्रवार को तिरुवनंतपुरम में बताई। श्री जोसेफ़ ने कहा, “हमारा रुख़ यह है कि आबादी वाले क्षेत्र, कृषि भूमि और बाग़ान बाहर रखे जाएँ और ESA केवल वन क्षेत्रों तक सीमित हो।” उन्होंने पूरी पृष्ठभूमि बताई: 2013 में के. कस्तूरीरंगन समिति ने राज्य के 123 गाँवों को समेटे हुए 13,108 वर्ग किमी का ESA प्रस्तावित किया था, जिसके विरुद्ध बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए; एक अध्ययन के बाद केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने एक मुसौदा अधिसूचना जारी की जिसमें क्षेत्रफल घटाकर 9,993.7 वर्ग किमी कर दिया गया। केरलम अब इसे घटाकर 8,590.69 वर्ग किमी और गाँवों की संख्या 98 करना चाहता है। वह अंतिम अधिसूचना की भी माँग कर रहा है, क्योंकि 2014 से जुलाई 2026 तक जारी हुई हर अधिसूचना केवल मुसौदा रही है। मंत्री ने केरलम की स्थिति को “अनूठी” बताया, क्योंकि राज्य आकार में छोटा है, घनी आबादी वाला है और वहाँ वनक्षेत्र (कुल क्षेत्रफल का 29.15%) भी बड़ा है; उन्होंने कहा कि वन, पर्यावरण, धान के खेतों और आर्द्रभूमियों की सुरक्षा करने वाले मौजूदा सख़्त कानूनों के ऊपर एक और कानून जोड़ने से विकास, कृषि और रोज़मर्रा का जीवन प्रभावित हो सकता है। यदि आवश्यक हुआ तो मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन नई दिल्ली में एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करेंगे। उसी दिन द हिंदू के संपादकीय (“Narrowed posture”) ने व्यापक तस्वीर प्रस्तुत की: 2026 के मध्य तक गुजरात केंद्र के साथ सहमति के लगभग निकट था, तमिलनाडु को कोई बड़ी असहमति नहीं थी, केरल अपने ज़मीनी-सत्यापित 9,993 वर्ग किमी को घटाकर 8,805 वर्ग किमी करना चाहता था — जो आज की 8,590.69 वर्ग किमी की माँग से छोटी कटौती है — और महाराष्ट्र तथा गोवा क्रमशः 378 और 21 गाँवों को बाहर रखना चाहते थे। केंद्र के 2024 के इस निर्णय का हवाला देते हुए कि ESA को राज्य-दर-राज्य अधिसूचित किया जाएगा, संपादकीय का तर्क है कि कर्नाटक, जिसके पास प्रस्तावित ESA में क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ा हिस्सा है, बिना किसी समान रूप से सोचे-समझे वैकल्पिक नक़्शे के इस ढाँचे को खारिज़ करता नहीं रह सकता। पाठ्यक्रम से जुड़ाव: सामान्य अध्ययन-3 में संरक्षण और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, और सामान्य अध्ययन-2 में केंद्र-राज्य संबंध।

कड़ी — एक पंक्ति में: गाडगिल समिति (2011) पश्चिमी घाट की लगभग पूर्ण सुरक्षा का प्रस्ताव देती है और उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है → कस्तूरीरंगन समिति (2013) उपग्रह आँकड़ों और 20% गाँव-नियम का उपयोग करते हुए ESA को घाट के लगभग 37% तक सीमित करती है → केरलम और कर्नाटक में विरोध के कारण ज़मीनी सत्यापन होता है और केरलम के लिए छोटा 9,993.7 वर्ग किमी का मुसौदा बनता है → एक दशक तक मुसौदे विफल होते रहते हैं और 2024 में केंद्र राज्य-दर-राज्य अधिसूचना का निर्णय लेता है → केरलम अब केवल 8,590.69 वर्ग किमी वनक्षेत्र की माँग करता है, जबकि कर्नाटक पूरे ढाँचे को ही खारिज़ करता है

स्थैतिक पाठ्यक्रम से जुड़ाव

  1. ESA का विधिक आधार पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 है, कोई अलग वन-कानून नहीं. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 [Environment (Protection) Act, 1986] की धारा 3 केंद्र सरकार को पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार के लिए वे सभी उपाय करने की शक्ति देती है जो वह आवश्यक समझे, और धारा 3(2)(v) विशेष रूप से उन क्षेत्रों को प्रतिबंधित करने की बात करती है जिनमें उद्योग, प्रचालन या प्रक्रियाएँ नहीं चलाई जा सकेंगी, या केवल सुरक्षा-उपायों के अधीन चलाई जा सकेंगी। पर्यावरण (संरक्षण) नियम, 1986 [Environment (Protection) Rules, 1986] का नियम 5 उन कारकों को सूचीबद्ध करता है जिन पर केंद्र को ऐसे प्रतिबंध लगाते समय विचार करना होता है, जिनमें क्षेत्र की जैव-विविधता और संरक्षित क्षेत्रों से उसकी निकटता शामिल है। यही नियम केंद्र को अंतिम अधिसूचना से पहले अपने इरादे को मुसौदे के रूप में प्रकाशित करने और आपत्तियाँ आमंत्रित करने की अपेक्षा रखता है, जिस कारण पश्चिमी घाट की प्रक्रिया में मुसौदों की एक श्रृंखला बनती रही है। क्योंकि यह अधिनियम केंद्रीय कानून है, अंतिम अधिसूचना केंद्र का निर्णय होती है, हालाँकि व्यवहार में उसने राज्य की सहमति चाही है।
  2. गाडगिल और कस्तूरीरंगन असहमत थे कि घाट के कितने हिस्से को सुरक्षा चाहिए और यह तय कैसे हो. परिस्थितिविद माधव गाडगिल की अध्यक्षता वाले पश्चिमी घाट परिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल ने 2011 में अपनी रिपोर्ट दी और पूरे पश्चिमी घाट को पारिस्थितिकी-संवेदी माना, उसे तीन क्षेत्रों में बाँटकर क्रमिक प्रतिबंध सुझाए और ग्राम सभाओं की मज़बूत भूमिका तथा एक वैधानिक पश्चिमी घाट परिस्थितिकी प्राधिकरण की सिफ़ारिश की। राज्यों के विरोध के बाद बनाए गए के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाले उच्च-स्तरीय कार्य-समूह ने 2013 में रिपोर्ट दी। इसने घाट को बसावटों, खेतों और बाग़ानों वाले ‘सांस्कृतिक भूदृश्य’ और ‘प्राकृतिक भूदृश्य’ में बाँटा, और प्रस्ताव दिया कि घाट के लगभग 37%, यानी लगभग 59,940 वर्ग किमी को ESA के रूप में अधिसूचित किया जाए। ESA के भीतर इसने खनन, उत्खनन, रेत-खनन, लाल-श्रेणी के उद्योगों और बड़ी टाउनशिप पर प्रतिबंध की सिफ़ारिश की; इसका रिमोट-सेंसिंग आँकड़ों का उपयोग और यह नियम कि किसी गाँव का 20% क्षेत्र संवेदी होने पर पूरे गाँव को शामिल कर लिया जाए, वही बातें हैं जिन पर कर्नाटक अब आपत्ति जताता है।
  3. पश्चिमी घाट एक वैश्विक जैव-विविधता हॉटस्पॉट और यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है. पश्चिमी घाट पश्चिमी तट के समांतर लगभग 1,600 किमी तक फैला है और छह राज्यों — गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु — से गुज़रता है। श्रीलंका के साथ मिलकर यह विश्व के जैव-विविधता हॉटस्पॉटों में से एक बनता है, जहाँ उभयचरों, रेप्टाइलों, मछलियों और फूल वाले पौधों में स्थानिकता (endemism) बहुत अधिक है। यूनेस्को ने 2012 में पश्चिमी घाट को एक शृंखलाबद्ध प्राकृतिक विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) के रूप में सूचीबद्ध किया, जिसमें केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र के घटक स्थल शामिल हैं। यह शृंखला प्रायद्वीपीय भारत का जल-मीनार (water tower) भी है: गोदावरी, कृष्णा और कावेरी इसकी ढलानों से निकलती हैं।
  4. ESA किसी अभयारण्य के चारों ओर बने पारिस्थितिकी-संवेदी क्षेत्र के समान नहीं है. पारिस्थितिकी-संवेदी क्षेत्र (eco-sensitive zones) भी पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम के अंतर्गत ही राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के चारों ओर बफ़र क्षेत्रों के रूप में अधिसूचित किए जाते हैं, जो 2011 की राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य-योजना और मंत्रालय के मार्गदर्शी सिद्धांतों पर आधारित होते हैं; वे किसी संरक्षित क्षेत्र के चारों ओर आघात-अवशोषक (shock absorber) की तरह काम करते हैं। पश्चिमी घाट का ESA एक भूदृश्य-स्तरीय अधिसूचना है जो उन गाँवों को भी शामिल करती है जो किसी संरक्षित क्षेत्र से सटे नहीं हैं। केरलम में पहले से ही कई ओवरलैप करती सुरक्षाएँ हैं, जिनमें केरल धान भूमि एवं आर्द्रभूमि संरक्षण अधिनियम, 2008 [Kerala Conservation of Paddy Land and Wetland Act, 2008] और वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 शामिल हैं, जो मंत्री के ‘एक और कानून’ वाले तर्क का आधार है। जुलाई 2024 में वायनाड में हुए भूस्खलनों, जिनमें मुंडक्कई और चूरलमाला में 200 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी, ने वर्षा से भीगी खड़ी ढलानों पर निर्माण और उत्खनन को लेकर बहस को और तेज़ कर दिया।

UPSC इसे क्यों पूछता है

  1. सामान्य अध्ययन-3 के संरक्षण प्रश्न बार-बार पश्चिमी घाट पर लौटते हैं. पाठ्यक्रम संरक्षण, पर्यावरणीय प्रदूषण एवं अवक्रमण, और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन का नाम लेता है। मुख्य परीक्षा में अभ्यर्थियों से गाडगिल और कस्तूरीरंगन के दृष्टिकोणों की तुलना करने और यह आकलन करने को कहा गया है कि घाट में भूस्खलन और बाढ़ें क्यों तीव्र हुई हैं। केरलम का यह प्रस्तुतिकरण दिखाता है कि अंतिम नक़्शा वास्तव में कैसे मोल-भाव से तय होता है।
  2. प्रारंभिक परीक्षा विधिक स्रोत और भूगोल दोनों की परीक्षा लेती है. UPSC ने पूछा है कि पश्चिमी घाट किन राज्यों से गुज़रता है, वहाँ से कौन-सी नदियाँ निकलती हैं, और किस अधिनियम के अंतर्गत पारिस्थितिकी-संवेदी क्षेत्र अधिसूचित होते हैं। ESA, पारिस्थितिकी-संवेदी क्षेत्र और वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत संरक्षित क्षेत्र के बीच का अंतर ठीक वैसा ही कथन-आधारित जाल है जो परीक्षा में सेट किया जाता है।
  3. पर्यावरणीय संघवाद सामान्य अध्ययन-3 के विषय के भीतर छिपा एक सामान्य अध्ययन-2 विषय है. द हिंदू का संपादकीय ESA को एक सामूहिक-कार्रवाई समस्या के रूप में प्रस्तुत करता है: लागत राज्यों पर पड़ती है, लाभ राष्ट्र को मिलता है। यह तर्क सहकारी संघवाद और समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाने की केंद्र की शक्ति संबंधी सामान्य अध्ययन-2 के प्रश्नों में फ़िट होता है, जहाँ ‘वन’ और ‘वन्य पशुओं तथा पक्षियों का संरक्षण’ को 42वें संशोधन द्वारा स्थानांतरित किया गया था।

प्रीलिम्स तथ्य

  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3(2)(v) केंद्र सरकार को उन क्षेत्रों को प्रतिबंधित करने की शक्ति देती है जिनमें कोई उद्योग, प्रचालन या प्रक्रिया नहीं चलाई जा सकेगी, या केवल सुरक्षा-उपायों के अधीन चलाई जा सकेगी।
  • पर्यावरण (संरक्षण) नियम, 1986 का नियम 5 उन कारकों को निर्धारित करता है जिन पर केंद्र सरकार को किसी क्षेत्र में उद्योगों और प्रक्रियाओं पर प्रतिबंध लगाने या रोकने से पहले विचार करना चाहिए, और आपत्तियाँ आमंत्रित करने वाली मुसौदा अधिसूचना की अपेक्षा रखता है।
  • पश्चिमी घाट परिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल की अध्यक्षता माधव गाडगिल ने की थी, और पश्चिमी घाट पर उच्च-स्तरीय कार्य-समूह की अध्यक्षता के. कस्तूरीरंगन ने की थी।
  • कस्तूरीरंगन उच्च-स्तरीय कार्य-समूह ने पश्चिमी घाट को सांस्कृतिक भूदृश्य और प्राकृतिक भूदृश्य में बाँटा और प्रस्ताव दिया कि घाट के लगभग 37% को पारिस्थितिकी-संवेदी क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया जाए।
  • पश्चिमी घाट छह राज्यों — गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु — से गुज़रता है।
  • पश्चिमी घाट को 2012 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में एक शृंखलाबद्ध प्राकृतिक स्थल के रूप में शामिल किया गया।
  • 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने ‘वन’ और ‘वन्य पशुओं तथा पक्षियों का संरक्षण’ को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर दिया था।

विश्लेषण

  1. केरलम ऐसी भूमि को ESA में शामिल करने की माँग कर रहा है जो पहले से ही संरक्षित है, जिससे अधिसूचना काफ़ी हद तक निरर्थक हो जाएगी. ESA को वनक्षेत्रों तक सीमित करना उदार सुनाई देता है, पर वन तो वैसे भी वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, वन्यजीव कानूनों और राज्य के वन-नियमों से पहले से ही शासित हैं। भूदृश्य-स्तरीय ESA का उद्देश्य यह है कि किनारों पर होने वाली गतिविधियाँ नियंत्रित हों — गाँवों के ऊपर ढलानों पर उत्खनन, धाराओं के किनारे रिज़ॉर्ट, अस्थिर पहाड़ियों में काटी गई सड़कें — क्योंकि वायनाड जैसी आपदाएँ यहीं से शुरू होती हैं। बाग़ानों और बसावटों को बाहर रखने से ठीक यही किनारे हटा दिए जाते हैं। दूसरा पक्ष भी गंभीर है: जिस राज्य में खेत और वन एक-दूसरे में गुँथे हुए हैं, वहाँ घरों और खेत-मार्गों पर लगे व्यापक प्रतिबंध खनन-मालिकों की तुलना में गरीब बसासतों को कहीं अधिक चोट पहुँचाते हैं, और जिस अधिसूचना को राज्य लागू नहीं करेगा, वह किसी की रक्षा नहीं करती।
  2. संपादकीय की सबसे मज़बूत दलील यह है कि ESA एक पाठ्यपुस्तक-जैसा सार्वजनिक हित (public good) है, इसलिए राज्य इसे हमेशा घटाने का मोल-भाव करेंगे. जो राज्य खनन की रॉयल्टी और निर्माण-गतिविधि छोड़ता है, वह लागत अकेला वहन करता है, जबकि लाभ — वर्षा का नियमन, दूसरे राज्यों को नदी-जल प्रवाह, जैव-विविधता — पूरे प्रायद्वीप को साझे में मिलते हैं। इसलिए हर राज्य के पास अपना हिस्सा घटाने का प्रोत्साहन है, और केरलम की माँग वास्तव में 13,108 से 9,993.7 से 8,805 और अब 8,590.69 वर्ग किमी तक खिसकती आई है। केंद्र का 2024 का राज्य-दर-राज्य अधिसूचना का निर्णय सहमति को तेज़ करता है, पर एक निरंतर शृंखला के तर्क को कमज़ोर करता है, क्योंकि एक राज्य में टूटा हुआ गलियारा अगले राज्य में अपना मूल्य खो देता है। एक न्यायसंगत हल यह होगा कि संरक्षण करने वाले राज्यों को मुआवज़ा दिया जाए, जैसे वित्त आयोग के हस्तांतरणों में वनावरण को भार देकर, न कि केवल मनाने पर निर्भर रहा जाए।
  3. बारह वर्षों के मुसौदे स्वयं एक नीतिगत परिणाम हैं, और उन्होंने निष्कर्षणकारी लॉबी का पक्ष लिया है. केरलम की यह शिकायत कि 2014 से जुलाई 2026 तक जारी हुई हर अधिसूचना मुसौदा ही रही है, दोनों तरफ़ काटती है। अनिश्चितता वैध कृषि और आवासीय निवेश को हतोत्साहित करती है, जैसा संपादकीय कहता है, पर इसका यह भी अर्थ है कि सबसे संवेदनशील गाँवों में खनन पर कोई अंतिम, लागू करने योग्य प्रतिबंध कभी लागू ही नहीं हुआ। 2013 के अंतरिम निर्देश कुछ सुरक्षा बनाए रखते हैं, फिर भी बार-बार मुसौदों का ऐसा शासन हर दौर में मुकदमेबाज़ी और लॉबीइंग को आमंत्रित करता है। एक अंतिम अधिसूचना, चाहे छोटी ही हो, ज़मीन पर अनदेखी की जा रही अनिश्चित मुसौदे से बेहतर होगी।
  4. ‘20% नियम’ का विवाद दिखाता है कि असली झगड़ा मानचित्रण की इकाई का है, सिद्धांत का नहीं. कस्तूरीरंगन ने राजस्व गाँव को इकाई के रूप में उपयोग किया और यदि उसका पाँचवाँ हिस्सा पारिस्थितिकी-संवेदी था तो पूरे गाँव को शामिल कर लिया। यह एक प्रशासनिक सुविधा थी, क्योंकि भूमि-अभिलेख और अनुमतियाँ गाँव-वार जारी होती हैं, पर इससे अनिवार्यतः कृषि भूमि भी ESA में समा गई। भूखंड या सर्वेक्षण-संख्या स्तर पर ज़मीनी सत्यापन कई शिकायतों को सुलझा सकता है, और केरलम का 123 से 98 गाँवों तक घटाना बताता है कि ऐसा मानचित्रण संभव है। नीति के लिए सीख यह है कि वैज्ञानिक रूप से ठोस सीमा को यदि खुरदुरे ढंग से खींचा जाए, तो वह राजनीतिक प्रतिरोध पैदा करती है जो अंततः विज्ञान को ही कमज़ोर कर देता है।
  5. केरलम का ‘अनूठा’ दावा आंशिक रूप से सच है और आंशिक रूप से एक ऐसा ढाँचा है जिसे अन्य राज्य नक़ल करेंगे. केरलम छोटा है, घनी आबादी वाला है और घाट के किनारे बाग़ानों पर बहुत अधिक निर्भर है, इसलिए एक दी गई ESA मात्रा वहाँ गुजरात या तमिलनाडु की तुलना में अधिक परिवारों को छूती है। पर कर्नाटक, महाराष्ट्र और गोवा ने भी भिन्न शब्दों में इसी तरह की माँगें की हैं, और यदि हर राज्य की विशिष्टता स्वीकार कर ली जाए, तो निरंतर शृंखला एक टुकड़ों में बँटी पट्टी बनकर रह जाएगी। विशिष्टता की तुलना में बेहतर कसौटी जोख़िम है: ढाल, वर्षा और भूस्खलन का पुराना इतिहास यह तय करे कि प्रतिबंध कहाँ सबसे कठोर हो, राज्य की सीमा जो भी हो।

संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

“पश्चिमी घाट का पारिस्थितिकी-संवेदी क्षेत्र एक दशक से अधिक समय से राज्य-दर-राज्य घटाया जाता रहा है, बिना कभी अंतिम रूप से अधिसूचित हुए।” इस गतिरोध के कारणों की परीक्षा कीजिए और सुझाव दीजिए कि पश्चिमी घाट के संरक्षण को वहाँ रहने वाले लोगों की जीविका के साथ किस प्रकार सामंजस्य में लाया जा सकता है। (15 अंक, 250 शब्द)

उत्तर की रूपरेखा

  1. भूमिका. केरलम के सितंबर 2026 के उस प्रस्तुतिकरण से शुरुआत करें जिसमें केंद्र से अपने ESA को 98 गाँवों में फैले केवल 8,590.69 वर्ग किमी वनक्षेत्र तक सीमित करने का आग्रह किया गया है, और इसकी तुलना कस्तूरीरंगन समिति के 13,108 वर्ग किमी और 123 गाँवों से करें; साथ ही यह भी बताएँ कि 2014 से हर अधिसूचना मुसौदा ही रही है।
  2. मुख्य भाग — विधिक एवं वैज्ञानिक ढाँचा. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 3 और उसके नियमों के नियम 5 को समझाएँ, फिर गाडगिल और कस्तूरीरंगन के दृष्टिकोणों की तुलना करें, जिसमें 37% का आँकड़ा, सांस्कृतिक व प्राकृतिक भूदृश्य का विभाजन और 20% गाँव-नियम शामिल हो।
  3. मुख्य भाग — गतिरोध के कारण. किसानों और बाग़ान-श्रमिकों के जीविका-संबंधी डर, 2012 के विवादित उपग्रह आँकड़े, मानचित्रण की इकाई के रूप में गाँव, वह सार्वजनिक-हित समस्या जो राज्यों को क्षेत्रफल घटाने पर मजबूर करती है, खनन एवं निर्माण हितों की लॉबीइंग, और केंद्र के 2024 के राज्य-दर-राज्य अधिसूचना के निर्णय को शामिल करें।
  4. मुख्य भाग — आगे की राह. भूखंड-स्तरीय ज़मीनी सत्यापन, ढाल, वर्षा और भूस्खलन-इतिहास पर आधारित जोख़िम-आधारित क्षेत्रीकरण, गाडगिल द्वारा प्रस्तावित ग्राम सभा की भागीदारी, संरक्षण करने वाले राज्यों को वित्तीय मुआवज़ा, और अंतिम अधिसूचना के लिए एक निश्चित तिथि का सुझाव दें। विलंब की कीमत के प्रमाण के रूप में 2024 के वायनाड भूस्खलनों का उपयोग करें।
  5. निष्कर्ष. यह निष्कर्ष दें कि एक छोटा पर अंतिम और लागू किया जाने वाला ESA उस बड़े मुसौदे से बेहतर है जिसका पालन कोई नहीं करता, और संरक्षण तभी टिकेगा जब जो इसकी कीमत चुकाते हैं उन्हें मुआवज़ा दिया जाए।

प्रशासक की दृष्टि

आप कोट्टयम के ज़िला कलेक्टर हैं। कूट्टिक्कल के ग्रामवासियों को डर है कि ESA अधिसूचित होने के बाद वे अपने घरों की मरम्मत नहीं कर सकेंगे। आप क्या करेंगे?

मैं पहले मुसौदा हाथ में लेकर स्पष्ट करूँगा कि ESA वास्तव में क्या प्रतिबंधित करता है: खनन, उत्खनन, बड़ा निर्माण और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग, न कि मौजूदा घरों की मरम्मत या सामान्य खेती। मैं पंचायत और राजस्व अधिकारियों के साथ वार्ड-स्तरीय बैठकें करूँगा और यह बताने वाली एक सरल सूची प्रकाशित करूँगा कि क्या-क्या अनुमत रहेगा। जहाँ किसी विशेष भूखंड को गलत ढंग से वर्गीकृत किया गया है, वहाँ मैं उन्हें राज्य के ज़मीनी-सत्यापन प्रस्तुतिकरण के लिए दर्ज करूँगा। अफ़वाह अधिसूचना से भी ज़्यादा नुकसान करती है, इसलिए स्पष्ट सूचना ही मेरा पहला दायित्व है।

भारत सरकार के पर्यावरण सचिव के रूप में, क्या आप ESA से सभी बाग़ानों को बाहर रखने की केरलम की माँग स्वीकार करेंगे?

मैं व्यापक अपवाद को स्वीकार नहीं करूँगा, क्योंकि कुछ बाग़ान खड़ी, भूस्खलन-प्रवण ढलानों पर स्थित हैं जहाँ नियमन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। मैं राज्य से भूखंड-स्तरीय नक़्शे माँगूँगा और बसावटों तथा समतल खेती-भूमि को बाहर रखने के लिए सहमत होऊँगा, जबकि उच्च-जोख़िम वाली ढलानें, उनका मौजूदा उपयोग जो भी हो, भीतर ही रखी जाएँगी। मैं अंतिम अधिसूचना के लिए एक निश्चित समय-सीमा भी दूँगा ताकि राज्य को इसके बदले में निश्चितता मिले। मोल-भाव से बना, जोख़िम-आधारित नक़्शा अदालत में और ज़मीन पर, दोनों जगह टिकता है; राजनीतिक नक़्शा नहीं टिकता।

इंटरव्यू बोर्ड पूछता है: क्या केंद्र को राज्यों की आपत्तियों के बावजूद सीधे पश्चिमी घाट ESA अधिसूचित कर देना चाहिए?

विधिक रूप से वह ऐसा कर सकता है, क्योंकि यह शक्ति एक केंद्रीय अधिनियम में निहित है, पर जिस अधिसूचना को राज्य लागू नहीं करेंगे वह केवल काग़ज़ पर ही रहेगी। भूमि-अभिलेख, निर्माण-अनुमतियाँ और पुलिसिंग सभी राज्य के विषय हैं। बेहतर रास्ता यह है कि केंद्र अपनी विधिक शक्ति का उपयोग एक समय-सीमा वाले समझौते के लिए दबाव के रूप में करे, जिसे संरक्षण करने वाले राज्यों के लिए वित्तीय प्रोत्साहनों का समर्थन मिले। यदि कोई राज्य अनिश्चित काल तक मनाही करता रहे, तो केंद्र को कम-से-कम वैज्ञानिक रूप से निर्विवाद मूल क्षेत्र को अधिसूचित कर देना चाहिए, ताकि सबसे संवेदनशील क्षेत्र असुरक्षित न रह जाएँ।