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6. स्वास्थ्य एवं जीव विज्ञान (Health & Life Sciences)GS2 · GS329 September 2026

सर्वोच्च न्यायालय ने FSSAI की फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी की समय-सीमा ठुकराई; मद्रास उच्च न्यायालय ने माइक्रो/नैनो-प्लास्टिक की चेतावनी बरकरार रखी

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ख़बर

नई दिल्ली और चेन्नई। सोमवार, 28 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) से चीनी, नमक और संतृप्त वसा की अधिकता वाले डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल की उसकी समय-सारणी पर सवाल किए और यह कहते हुए अपना आदेश सुरक्षित रख लिया कि वह स्वयं एक “उचित समय-सीमा” तय करेगा। यह 24 सितंबर के उस कार्ड की अगली कड़ी है जो FSSAI की लाल षट्भुज योजना पर था; नई बात यह है कि अदालत ने उसकी गति को अस्वीकार कर दिया है। फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग में पैकेट के अगले हिस्से पर पोषण का एक सरल संकेत छापा जाता है, ताकि उपभोक्ता को पीछे छपी तालिका न पढ़नी पड़े। अदालत के 10 सितंबर के आदेश के जवाब में FSSAI ने अपने हलफ़नामे में कहा कि मसौदा विनियमों के लिए चार महीने का परामर्श और अंतिम रूप देना ज़रूरी है, अगले वर्ष 1 जुलाई तक मानदंड अधिसूचित करने का प्रस्ताव रखा और उसके बाद खाद्य कारोबारियों को बदलाव के लिए 365 दिन दिए, द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार। अख़बार इसी प्रस्ताव को अलग-अलग ढंग से बताते हैं: द हिंदू इसे “लगभग दो वर्ष” की समय-सीमा कहता है, क्योंकि वह आज से संक्रमण-काल के अंत तक गिनता है, जबकि द इकोनॉमिक टाइम्स इस पर केंद्रित है कि FSSAI को “एक साल” क्यों चाहिए था, यानी अधिसूचना के बाद का संक्रमण-काल, और बताता है कि पीठ ने इस समय-सीमा को “अनुचित” कहा। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पूछा: “एक साल तक स्वैच्छिक अनुपालन क्यों? ... आपने 2022 में शुरुआत की थी। पिछले चार वर्षों में आपने क्या किया?” अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ब्रिजेंद्र चाहर ने उत्तर दिया कि 2022 की कवायद इंडियन न्यूट्रिशन रेटिंग की थी, जो एक स्टार-रेटिंग प्रणाली है और चेतावनी लेबल से भिन्न पैमाना है। अदालत ने कहा कि उसके निर्देश बाध्यकारी होंगे और अनुपालन की निगरानी के लिए मामला लंबित रखा। याचिकाकर्ता 3S एंड अवर हेल्थ सोसाइटी ने, अधिवक्ता राजीव शंकर द्विवेदी के माध्यम से, जोड़ी गई चीनी और कुल चीनी के भेद पर आपत्ति की और तर्क दिया कि लेबलों को अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की परिभाषा तय होने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। अधीनस्थ विधान संबंधी संसदीय समिति के अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा ने ET से कहा कि छह महीने से एक साल “उचित” है, पर पोषण संबंधी जानकारी “अभी” आगे लाई जानी चाहिए। अलग से, रेड बुल ने FSSAI के जुलाई के उस आदेश के विरुद्ध दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया, जो ‘एनर्जी ड्रिंक’ श्रेणी को मान्यता नहीं देता और कंपनियों को यह शब्द हटाने के लिए 90 दिन, यानी 30 सितंबर तक, का समय देता है; रेड बुल का कहना है कि उसे न कारण बताओ नोटिस मिला, न सुनवाई। चेन्नई में न्यायमूर्ति एन. सतीश कुमार और न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती की विशेष खंडपीठ ने FSSAI की वह याचिका खारिज कर दी जिसमें 6 फ़रवरी 2026 के उस आदेश की समीक्षा माँगी गई थी, जिसके अनुसार प्लास्टिक पैक में बिकने वाले पानी, चीनी और नमक पर मोटे लाल अक्षरों में लिखना होगा: “इस पानी/चीनी/नमक में माइक्रो/नैनो प्लास्टिक हो सकता है।” FSSAI का तर्क था कि शोध अनिर्णायक है और चेतावनी से “जनता में घबराहट” फैल सकती है; अदालत ने कहा कि उसने उत्पादों को असुरक्षित नहीं पाया है, पर चाहती है कि उपभोक्ता स्वयं निर्णय करें। सर्वोच्च न्यायालय 18 मई को FSSAI की अपील खारिज कर चुका था। पाठ्यक्रम से संबंध: GS2 (स्वास्थ्य) तथा GS3 (खाद्य प्रसंस्करण और उपभोक्ता संरक्षण)।

कड़ी — एक पंक्ति में: चीनी, नमक और वसा से भरपूर डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत भारत में गैर-संचारी रोगों का बोझ बढ़ाती है → FSSAI 2022 में स्टार रेटिंग पर केंद्रित फ्रंट-ऑफ-पैक कवायद शुरू करता है, जो अटक जाती है → एक जनहित याचिका चेतावनी लेबल माँगती है और सर्वोच्च न्यायालय 10 सितंबर को प्रगति का आदेश देता है → FSSAI अगले वर्ष 1 जुलाई तक अधिसूचना और 365 दिन के संक्रमण-काल का प्रस्ताव रखता है → पीठ समय-सीमा को अनुचित बताती है और ऐसा आदेश सुरक्षित रखती है जो नियामक पर बाध्यकारी होगा

स्थैतिक पाठ्यक्रम से जुड़ाव

  1. FSSAI एक सांविधिक नियामक है, जिसकी लेबलिंग की शक्ति 2006 के अधिनियम से आती है. खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 (Food Safety and Standards Act) ने खाद्य पदार्थ अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 सहित पहले के खाद्य कानूनों को समेकित किया और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की स्थापना की। अधिनियम की धारा 23 ऐसे डिब्बाबंद खाद्य की बिक्री को प्रतिबंधित करती है जिसके लेबल पर विनियमों द्वारा अपेक्षित जानकारी न हो, और प्राधिकरण ये विनियम केंद्र की पूर्व स्वीकृति से बनाता है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक (लेबलिंग और प्रदर्शन) विनियम, 2020 अब यह निर्धारित करते हैं कि पैकेटों पर क्या छापना अनिवार्य है, जिसमें पोषण जानकारी की तालिका भी शामिल है। ये विनियम हैं, यानी प्रत्यायोजित विधान (Delegated Legislation), इसलिए संसद में इनकी जाँच अधीनस्थ विधान संबंधी समितियाँ करती हैं।
  2. चेतावनी लेबल और रेटिंग लेबल दो अलग-अलग दर्शन हैं. HFSS खाद्य पदार्थ वे हैं जिनमें वसा, नमक और चीनी अधिक होती है और जो मोटापे, मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा हृदय रोग से जुड़े हैं। चेतावनी लेबल, जैसे चिली और कुछ अन्य लैटिन अमेरिकी देशों में इस्तेमाल होने वाले काले अष्टभुज, केवल उसी पोषक तत्व को चिह्नित करता है जो सीमा पार कर जाए, और उपभोक्ता को बताता है कि किससे बचना है। सारांश रेटिंग, जैसे इंडियन न्यूट्रिशन रेटिंग जिसका प्रस्ताव FSSAI ने 2022 में हेल्थ स्टार प्रणालियों की तर्ज़ पर रखा था, पूरे उत्पाद को एक अंक देती है, जिससे अधिक चीनी वाला उत्पाद भी अतिरिक्त रेशे या प्रोटीन के कारण ठीक-ठाक रेटिंग पा सकता है। जन-स्वास्थ्य समूह चेतावनियों को इसलिए पसंद करते हैं कि उनके साथ हेरफेर करना कठिन है; उद्योग सामान्यतः रेटिंग को तरजीह देता रहा है। FSSAI का लाल षट्भुज चेतावनी-शैली का डिज़ाइन है।
  3. स्वास्थ्य का अधिकार और पोषण संबंधी निदेशक तत्व अदालतों को आधार देते हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक बार स्वास्थ्य के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का हिस्सा माना है। अनुच्छेद 47, जो एक निदेशक तत्व है, पोषाहार स्तर को ऊँचा उठाना और लोक स्वास्थ्य का सुधार करना राज्य का प्राथमिक कर्तव्य बनाता है। जो कुछ हम खाते हैं उसके बारे में जानने का अधिकार भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के अंतर्गत उपभोक्ता अधिकारों का अंग माना जाता है। अदालतें इनके सहारे सतत परमादेश (continuing mandamus) के ज़रिए नियामकों पर नज़र रखती हैं, यानी मामला लंबित रखती हैं ताकि अनुपालन की रिपोर्ट आती रहे, जैसा कि यहाँ पीठ ने किया है।
  4. एहतियाती सिद्धांत मद्रास उच्च न्यायालय के प्लास्टिक संबंधी रुख़ को समझाता है. वेल्लोर सिटीज़न्स वेलफ़ेयर फ़ोरम बनाम भारत संघ (1996) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एहतियाती सिद्धांत (Precautionary Principle) और प्रदूषक भुगतान सिद्धांत भारतीय पर्यावरण कानून का हिस्सा हैं, और वैज्ञानिक निश्चितता का अभाव गंभीर क्षति के विरुद्ध उपायों को टालने का कारण नहीं है। माइक्रोप्लास्टिक 5 मिमी से छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, और नैनोप्लास्टिक उनसे कहीं छोटे, इतने छोटे कि जैविक अवरोधों को पार कर सकें; मानव स्वास्थ्य पर इनके दीर्घकालिक प्रभावों का अध्ययन अभी जारी है। प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 प्लास्टिक पैकेजिंग और अपशिष्ट को विनियमित करते हैं, पर खाद्य पदार्थ में घुल जाने वाले कणों से नहीं निपटते। अनिश्चितता को ईमानदारी से बताने वाली चेतावनी एक हल्के-फुल्के एहतियाती उपाय के समान है।

UPSC इसे क्यों पूछता है

  1. GS2 (स्वास्थ्य) और GS3 (खाद्य प्रसंस्करण) दोनों में खाद्य विनियमन आता है. मुख्य परीक्षा में भारत में खाद्य सुरक्षा विनियमन की चुनौतियों तथा गैर-संचारी रोगों के बढ़ने पर प्रश्न पूछे जा चुके हैं। फ्रंट-ऑफ-पैक की बहस इसका साफ़ उदाहरण है कि नियामक, उद्योग और अदालत तीन अलग दिशाओं में खिंच रहे हैं, और लेबल की बहस उपभोक्ता संरक्षण से जुड़े प्रश्नों में भी बैठती है।
  2. प्रारंभिक परीक्षा में अधिनियम, निकाय और सिद्धांत परखे जाते हैं. UPSC FSSAI के मूल मंत्रालय और पर्यावरण कानून के सिद्धांतों पर प्रश्न पूछ चुका है। खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006, 2020 के लेबलिंग विनियम, एहतियाती सिद्धांत और माइक्रो तथा नैनोप्लास्टिक का अंतर सहज ही प्रश्न बन सकते हैं।
  3. शासन और नीतिशास्त्र के प्रश्नों में नियामकीय विलंब एक केस के रूप में आता है. अदालत का प्रश्न, कि चार वर्षों में आपने क्या किया, नियामकीय अभिग्रहण (regulatory capture) की ओर संकेत करता है, यानी विनियमित उद्योग का नियामक पर प्रभाव। एनर्जी ड्रिंक का आदेश, जिसे सुनवाई न मिलने के आधार पर चुनौती दी गई है, दूसरा पहलू दिखाता है: जल्दबाज़ी में कार्रवाई करने वाले नियामक पर प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का आरोप लग सकता है।

प्रीलिम्स तथ्य

  • भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण एक सांविधिक निकाय है, जिसकी स्थापना खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के अंतर्गत हुई है और जो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
  • खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 23 खाद्य की पैकेजिंग और लेबलिंग से संबंधित है।
  • खाद्य सुरक्षा एवं मानक (लेबलिंग और प्रदर्शन) विनियम 2020 में अधिसूचित किए गए थे।
  • HFSS खाद्य पदार्थ वे हैं जिनमें वसा, नमक और चीनी अधिक होती है।
  • संविधान का अनुच्छेद 47 राज्य को निर्देश देता है कि वह पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में माने।
  • वेल्लोर सिटीज़न्स वेलफ़ेयर फ़ोरम बनाम भारत संघ (1996) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एहतियाती सिद्धांत और प्रदूषक भुगतान सिद्धांत देश के कानून का हिस्सा हैं।
  • माइक्रोप्लास्टिक को सामान्यतः 5 मिलीमीटर से छोटे आकार के प्लास्टिक कणों के रूप में परिभाषित किया जाता है।

विश्लेषण

  1. दोनों अख़बारों की समय-सारणियाँ तथ्य में नहीं, प्रस्तुति में भिन्न हैं, और प्रस्तुति मायने रखती है. FSSAI ने नियम अंतिम करने के लिए लगभग चार महीने, अगले वर्ष 1 जुलाई तक अधिसूचना और 365 दिन के संक्रमण-काल का प्रस्ताव रखा। द इकोनॉमिक टाइम्स एक वर्ष के संक्रमण पर अदालत की आपत्ति बताता है; द हिंदू पूरे रास्ते को गिनकर इसे लगभग दो वर्ष कहता है। दोनों सही हैं, और साथ मिलकर दिखाते हैं कि अदालत अधीर क्यों थी: 2022 में शुरू हुई प्रक्रिया FSSAI की योजना पर उपभोक्ता तक केवल 2028 के मध्य में पहुँचती। विद्यार्थी के लिए सीख यह है कि समय-सीमा को अधिसूचना से नहीं, प्रक्रिया की शुरुआत से उस दिन तक गिनना चाहिए जब उपभोक्ता लेबल देखता है।
  2. स्टार-रेटिंग का भटकाव चार खोए हुए वर्षों की व्याख्या करता है. अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल का यह उत्तर कि 2022 की कवायद इंडियन न्यूट्रिशन रेटिंग की थी, एक बचाव है, पर साथ ही इस बात की स्वीकृति भी कि नियामक ने वर्षों उस डिज़ाइन पर लगाए जिसका जन-स्वास्थ्य निकाय विरोध कर रहे थे। रेटिंग प्रणाली अच्छे और बुरे पोषक तत्वों का औसत निकालती है, जबकि चेतावनी हानिकारक तत्व को अलग करके दिखाती है; लाल षट्भुज पर आने का अर्थ है कि पहले हुए परामर्श का उपयोग सीमित रह जाता है। नए सिरे से शुरू करने पर अदालत का संशय इसलिए समझ में आता है। प्रतिपक्ष यह है कि नई कानूनी व्यवस्था के लिए वास्तव में परामर्श की आवश्यकता होती है, और उसे छोड़ने पर विनियमन उद्योग की चुनौती के आगे कमज़ोर पड़ेगा, जैसा रेड बुल का मामला दिखाता है।
  3. देवड़ा का बीच का रास्ता मेज़ पर रखे सुझावों में सबसे व्यावहारिक है. पीछे छपे मौजूदा पोषण-आँकड़ों को तुरंत सामने लाने में लागत बहुत कम है, क्योंकि कंपनियों के पास आँकड़े पहले से हैं, और उपभोक्ता को कुछ जानकारी अभी मिल जाती है। संक्रमण-काल के भीतर उचित चेतावनी डिज़ाइन बाद में आ सकता है। इससे प्रकटीकरण, जो प्रतीक्षा नहीं कर सकता, और डिज़ाइन, जिसे परिष्कृत किया जा सकता है, अलग-अलग हो जाते हैं। याचिकाकर्ता का यह तर्क कि चेतावनियों को अति-प्रसंस्कृत खाद्य की परिभाषा की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, इसी तर्क पर चलता है: चीनी और नमक की सीमाओं पर आधारित लेबल को उस परिभाषा की आवश्यकता नहीं है।
  4. प्लास्टिक की चेतावनी असहज इसलिए है कि उसमें ‘हो सकता है’ लिखा है. FSSAI का तर्क है कि हानि के प्रमाण के बिना दी गई चेतावनी घबराहट फैलाएगी, और जिस अध्ययन का सहारा लिया गया वह केवल अन्य शोध-पत्रों की समीक्षा थी। अदालत का उत्तर है कि उसने उत्पादों को असुरक्षित घोषित नहीं किया है; उसने केवल उपभोक्ताओं को बताया है कि यह प्रश्न मौजूद है। एहतियाती सिद्धांत ठीक यही अनुमति देता है: अनिश्चितता की स्थिति में ईमानदार प्रकटीकरण। जोखिम है चेतावनी-थकान का, क्योंकि यदि हर उत्पाद पर एक सुरक्षात्मक हिदायत हो तो उपभोक्ता सारी चेतावनियाँ अनदेखी कर देते हैं, उन्हें भी जो मायने रखती हैं। नियामक की बेहतर प्रतिक्रिया यह होगी कि FSSAI भारतीय डिब्बाबंद पानी, चीनी और नमक की जाँच में धन लगाए, ताकि लेबल जल्दी ही कुछ अधिक ठोस, किसी भी दिशा में, कह सके।
  5. एनर्जी ड्रिंक का आदेश दिखाता है कि प्रक्रिया के बिना गति भी विफलता है. FSSAI के जुलाई के आदेश में कहा गया है कि इस श्रेणी के कोई मानक नहीं हैं और ‘तन-मन को स्फूर्ति देने’ जैसे दावे उपभोक्ताओं को भ्रमित करते हैं, जो सारतः उचित है। परंतु रेड बुल की शिकायत कि उसे न कारण बताओ नोटिस मिला और न सुनवाई, ऑडी अल्टरम पार्टेम (audi alteram partem) तक जाती है, यानी यह नियम कि किसी को बिना सुने दंडित नहीं किया जाना चाहिए। प्रभावित कंपनियों में से एक के वरिष्ठ अधिकारी ने ET को बताया कि FSSAI ने स्वयं 2024 में एनर्जी ड्रिंक की अनुमति दी थी। जो नियामक सबके लिए लेबल पर धीमा और एक श्रेणी पर अचानक कठोर हो, उस पर असंगति का आरोप लगता है, जिससे दोनों जगह उसका अधिकार कमज़ोर होता है।

संभावित मुख्य परीक्षा प्रश्न

भारत में डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल 2022 से विचाराधीन हैं। चर्चा कीजिए कि नियामकीय प्रक्रिया इतनी धीमी क्यों रही और खाद्य विनियमन को आगे बढ़ाने में न्यायपालिका की भूमिका का परीक्षण कीजिए। भारतीय उपभोक्ताओं के लिए कौन-सा डिज़ाइन सबसे उपयुक्त होगा? (15 अंक, 250 शब्द)

उत्तर की रूपरेखा

  1. प्रस्तावना. बताइए कि 28 सितंबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने FSSAI की समय-सीमा को, यानी अगले वर्ष 1 जुलाई तक अधिसूचना और उसके बाद 365 दिन का संक्रमण, अनुचित कहा और ऐसा आदेश सुरक्षित रखा जो नियामक पर बाध्यकारी होगा।
  2. मुख्य भाग: प्रक्रिया धीमी क्यों रही. इंडियन न्यूट्रिशन रेटिंग (2022) से लाल षट्भुज चेतावनियों की ओर बदलाव, स्टॉक और आपूर्ति शृंखला को लेकर उद्योग की चिंताएँ, जोड़ी गई बनाम कुल चीनी की बहस और अति-प्रसंस्कृत खाद्य की लंबित परिभाषा की व्याख्या कीजिए।
  3. मुख्य भाग: अदालतों की भूमिका. अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 47 और सतत परमादेश का प्रयोग कीजिए। मद्रास उच्च न्यायालय की माइक्रो/नैनो-प्लास्टिक चेतावनी और वेल्लोर सिटीज़न्स (1996) का एहतियाती सिद्धांत जोड़िए। अदालतों द्वारा नीति गढ़ने के जोखिम और एनर्जी ड्रिंक मामले में प्राकृतिक न्याय के प्रश्न का उल्लेख कीजिए।
  4. मुख्य भाग: सर्वश्रेष्ठ डिज़ाइन. चीनी, नमक और संतृप्त वसा की सीमाओं पर आधारित पोषक-तत्व-विशिष्ट चेतावनी लेबल, श्री देवड़ा के सुझाव के अनुसार फ्रंट-ऑफ-पैक पर तत्काल प्रकटीकरण, विज्ञापन-सीमाओं द्वारा बच्चों की सुरक्षा और किसी भी संदूषक-चेतावनी के समर्थन में जाँच के पक्ष में तर्क दीजिए।
  5. निष्कर्ष. निष्कर्ष में कहिए कि स्पष्ट लेबल जन-स्वास्थ्य का कम लागत वाला उपकरण हैं, और जो नियामक अपनी समय-सीमाएँ स्वयं तय करके पूरी करता है उसे अदालतों से समय-सीमा तय करवाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

प्रशासक की दृष्टि

सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों के बाद आप FSSAI के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। अगले 30 दिनों में आप क्या करेंगे?

मैं सीमाओं सहित चेतावनी-लेबल विनियम का मसौदा तुरंत प्रकाशित करूँगा, और मौजूदा परामर्शों को आधार बनाऊँगा, ताकि अदालत को वादे नहीं, प्रगति दिखे। साथ ही अंतरिम कदम के रूप में मौजूदा पोषण-जानकारी को पैक के अगले हिस्से पर दिखाना अनिवार्य करूँगा। स्टॉक के संक्रमण पर उद्योग से मिलूँगा, पर तारीख़ अटल रखूँगा। अदालत और जनता को मासिक सार्वजनिक अद्यतन देने से विश्वसनीयता फिर बनेगी।

ज़िले के खाद्य सुरक्षा हेतु नामित अधिकारी के रूप में आप स्थानीय पैकेज्ड पेयजल इकाइयों पर माइक्रो/नैनो-प्लास्टिक की चेतावनी को कैसे संभालेंगे?

मैं ज़िले की सभी लाइसेंस-प्राप्त पैकेज्ड पेयजल इकाइयों को उच्च न्यायालय के आदेश और उसमें अपेक्षित सटीक शब्दावली तथा रंग की सूचना दूँगा। निरीक्षणों में अनुपालन जाँचूँगा, पहले सलाह से शुरू करके बार-बार उल्लंघन पर दंड की ओर बढ़ूँगा। जहाँ प्रयोगशाला-क्षमता हो, वहाँ जाँच के लिए नमूने भी एकत्र करूँगा, ताकि ज़िले के पास केवल चेतावनियाँ नहीं, आँकड़े भी हों। छोटी इकाइयों को तुरंत अभियोजन नहीं, समय और मार्गदर्शन दिया जाएगा।

साक्षात्कार बोर्ड पूछता है: क्या अदालतों द्वारा नियामकों के लिए समय-सीमा तय करना उचित है?

सामान्यतः विनियमन का डिज़ाइन कार्यपालिका का काम है, जिसके पास विशेषज्ञता है और जिसे हितधारकों से परामर्श करना होता है। किंतु जब कोई नियामक अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले मामले में वर्षों तक विलंब करे, तो अदालत कारण पूछने और उचित समय तय करने की अधिकारी है। यहाँ अदालत समय-सीमा तय कर रही है, लेबल नहीं लिख रही, जो शक्तियों के पृथक्करण का सम्मान करता है। अधिक स्वस्थ परिणाम वह होगा जब नियामक अपनी समय-सीमाओं का स्वयं पालन करें और ऐसे आदेशों की आवश्यकता ही न पड़े।